21 वीरों का तंत्र: नाथपंथ की एक शक्तिशाली और लुप्त होती विद्या
परिचय
Mythologynath.com पर गुरु सागरनाथ जी की इस चर्चा में आज विषय है — 21 वीरों का तंत्र। यह जानना ज़रूरी है कि 21 वीरों का तंत्र क्या है, इन्हें कैसे सिद्ध और नियंत्रित (चलाया) किया जाता है, ये कौन-कौन से कार्य करते हैं, और तंत्र क्षेत्र में इनका क्या महत्व है। सागरनाथ जी बताते हैं कि यह ज्ञान आज लगभग पूर्णतः लुप्त हो चुका है। वे यह ज्ञान अपने कुछ विशेष शिष्यों को ही देते हैं, जो साधना में एक टॉप स्तर तक पहुंच चुके होते हैं।
यह साधना दो तरीकों से की जा सकती है — राजसिक तरीके से या सात्विक (राशन) तरीके से। दोनों में से किसी भी तरीके को अपनाने में कोई समस्या नहीं है।
21 वीरों की शक्ति और श्रेणी
सागरनाथ जी स्पष्ट करते हैं कि ये वीर बहुत ही बलवान होते हैं और किसी के “दास” नहीं हैं। इंटरनेट और YouTube पर अक्सर यह भ्रामक बात कही जाती है कि ये भैरव या माता काली के “गण” होते हैं — सागरनाथ जी इसे स्पष्ट रूप से नकारते हैं।
तंत्र में अधिकतम 52 वीर होते हैं। 21 वीर इनकी एक प्रारंभिक श्रेणी है — यानी पहला पड़ाव 21 वीरों का होता है, और इससे ऊपर का सबसे उच्च पड़ाव 52 वीरों का माना जाता है। 52 वीरों के साथ 64 योगिनियां चलती हैं, जबकि 21 वीरों के साथ 36 योगिनियां चलती हैं।
इन्हें साधक अलग-अलग तरीके से भी सिद्ध कर सकता है, या एक साथ भी सिद्ध कर सकता है — दोनों ही तरीके मान्य हैं। कुछ साधक एक-एक वीर को अलग-अलग चिल्ला निकालकर सिद्ध करना पसंद करते हैं।
52 वीरों का कड़ा — एक साक्षात प्रमाण
सागरनाथ जी अपने पास मौजूद 52 वीरों के मूल कड़े को दिखाते हुए बताते हैं कि यह उन्होंने स्वयं सिद्ध किया हुआ है। इस कड़े पर वीरों का क्रम इस प्रकार दिखाया गया:
गणपति वीर, चंद्रमा वीर, सूर्य वीर, शेषनाग वीर, नंदी वीर, त्रिशूल वीर, गरुड़ वीर — इसके बाद पुनः गणपति वीर, हनुमान वीर, श्याम वीर, घंटाकरण वीर, और धीरे-धीरे अष्ट भैरव भी इसमें आते हैं।
कड़े की उत्पत्ति
यह कड़ा बंगाल से मंगवाया गया था, जिसे वहां के एक साधक ने पहले ही सिद्ध कर रखा था। वह साधक बजरंग बली (परंपरा) से जुड़े थे। सागरनाथ जी ने उनसे अपनी कुछ विद्याएं साझा कीं और बदले में उनकी कुछ लुप्त होती जा रही विद्याएं प्राप्त कीं। यह कड़ा उस समय अत्यंत मूल्यवान — यानी काफी महंगे दाम में — प्राप्त हुआ था। सागरनाथ जी बताते हैं कि जिन साधकों को वे यह कड़ा सिद्ध करवाकर देते हैं, उनके लिए यह बहुत ही कम कीमत (चीप एंड बेस्ट) में उपलब्ध कराया जाता है।
उन्होंने यह भी सचेत किया कि YouTube और इंटरनेट पर इस कड़े के कई डुप्लीकेट संस्करण मिल जाएंगे, जबकि उनके पास मूल (ओरिजिनल) कड़ा है, जो अष्ट धातु से बना है।
21 वीरों के नाम
सागरनाथ जी ने 21 वीरों के नामों की एक सूची इस प्रकार साझा की:
गगना वीर, सगना वीर, चौधरी वीर, जयतमल वीर, ताट्या वीर, गरुण वीर, अष्टभैरव वीर, गणपति वीर, घंटाकरण वीर, चंद्रमा वीर, सूर्य वीर, धनवंतरी वीर, मसानिया वीर, बाकू वीर, कालिया वीर, मसान वीर।
उन्होंने बताया कि इनके अतिरिक्त भी कई और नाम हैं, परंतु सभी का उल्लेख करने पर वीडियो बहुत लंबी हो जाएगी, इसलिए मोटा-मोटा परिचय ही दिया गया है। इन वीरों के साथ योगिनियां भी स्वतः (ऑटोमेटिक) साथ चलती हैं।
भोग और पूजन विधि
भोग की विधि
सागरनाथ जी स्पष्ट करते हैं कि प्रत्येक वीर को अलग-अलग प्रकार का भोग देने की आवश्यकता नहीं है — सभी को एक ही प्रकार का भोग दिया जा सकता है, और उसी भोग से साधक अपना इच्छित कार्य करवा सकता है।
पूजन का समय और विधि
इस साधना का पूजन पूर्णिमा और अमावस्या के दिन किया जाता है — इसे कंगन का पूजन कहा जाता है। यह जागृत कंगन/कड़ा है, और इसका पूजन बहुत सरल है:
– सिंदूर के साथ पूजन किया जाता है।
– इत्र में केवड़े का इत्र या गुलाब का इत्र प्रयोग किया जा सकता है।
– सिंदूर लगाया जाता है और इसे बाजोड़ (एक ओर) रखकर पूजा की जाती है।
इस विधि से वीर जागृत हो जाते हैं।
वीरों के जागृत होने के तरीके
सागरनाथ जी बताते हैं कि वीरों के जागृत होने की प्रक्रिया साधक की ऊर्जा पर निर्भर करती है। यह जागरण निम्न रूपों में हो सकता है:
– साधक को स्वप्न के माध्यम से इनका आभास हो सकता है।
– वीर साधक के सामने साक्षात खड़े होकर, आंखों में आंखें डालकर बात कर सकते हैं।
– साधक के सामने एक साया (परछाई) खड़ा हो सकता है, जो कार्य के बारे में बताता है।
– जब साधक बैठकर मंत्र का जाप करता है, तो वीर उसके मन और मस्तिष्क में विचार डालना शुरू कर सकते हैं।
यह मंत्र मराठी और बंगाली भाषाओं का मिश्रण है।
साधना का स्थान और भोग का प्रकार
इस साधना को साधक घर में बैठकर आराम से कर सकता है, या बाहर भी कर सकता है। श्मशान में जाना है या नहीं, यह पूर्णतः साधक की अपनी इच्छा पर निर्भर करता है — सागरनाथ जी स्वयं इसे नदी के किनारे या घर पर करते हैं।
भोग के विषय में भी साधक को स्वतंत्रता है — वह चाहे तो सात्विक भोग दे सकता है, या तामसी भोग भी दे सकता है।
एक महत्वपूर्ण बात यह भी बताई गई कि इसमें यह जरूरी नहीं कि किसी निश्चित संख्या के दिनों का अनुष्ठान करने पर ही कार्य सिद्ध होगा। पहले वीरों को भोग दिया जाता है, फिर मंत्र को सिद्ध किया जाता है, उन्हें सामने लाकर खड़ा किया जाता है, और उसके बाद वे स्वयं कार्य मांगते हैं — यह प्रक्रिया हर बार दोहराई जाती है जब उन्हें सिद्ध किया जाता है।
साधना से प्राप्त होने वाले लाभ
सागरनाथ जी के अनुसार, यदि साधक गरीबी में जीवन जी रहा है तो यह साधना उसकी धन संबंधी समस्या को समाप्त कर सकती है। यदि साधक के शत्रु हैं, तो ये वीर उन्हें बेधड़क समाप्त कर देंगे — 21 के 21 वीर मिलकर शत्रु के घर जाकर उस पर प्रहार करेंगे। ये किसी भी गद्दी के मालिक को भी निष्प्रभावी कर सकते हैं।
सागरनाथ जी विशेष रूप से यह चेतावनी देते हैं कि ये 21 वीर आसानी से काबू में नहीं आते — ये बहुत बड़े और प्रबल वीर हैं। इनमें हनुमान वीर स्वयं ईश्वर स्वरूप हैं, और अष्टभैरव वीर भगवान रुद्र का ही स्वरूप माने जाते हैं।
नाथपंथ और मराठी विद्या से संबंध
यह स्पष्ट किया गया है कि ये वीर किसी शमशानी या अन्य गद्दी परंपरा से संबंधित नहीं हैं, बल्कि यह पूर्णतः नाथपंथ की विद्या है। यह मराठी विद्या है, और यह ब्राटी कंगन (कड़ा) है, जिसमें ब्राटी विद्या के मंत्र सिद्ध किए जाते हैं। इस विद्या का संबंध कामाख्या पीठ से भी बताया गया है।
## षट्कर्म करने की क्षमता
21 वीर और 52 वीर दोनों शतकर्म करने की क्षमता रखते हैं, जिनमें शामिल हैं — मारण, उच्चाटन, वशीकरण, और मोहन। ये वीर इतने प्रबल होते हैं कि यदि साधक इनमें से एक भी वीर को सिद्ध कर लेता है, तो उसका जीवन पूरी तरह बदल जाता है और वह तंत्र क्षेत्र में एक एडवांस स्तर पर पहुंच जाता है।
सागरनाथ जी स्पष्ट करते हैं कि यह मंत्र YouTube पर उपलब्ध नहीं है।
जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में सहायता
यह साधना मल्टीपर्पस (बहुउद्देश्यीय) कार्य करने में सक्षम है:
– नया व्यवसाय शुरू करना हो या उसे बढ़ाना (एनहांस करना) हो, इस साधना से यह संभव हो सकता है।
– प्रेम विवाह में रुकावट आ रही हो, तो यह साधना उसमें भी सहायक सिद्ध होती है।
– शादी न हो रही हो, बार-बार अड़चन आ रही हो, रिश्ता ठुकराया जा रहा हो या टूट जाता हो — इस साधना से इन समस्याओं का भी समाधान संभव है।
साधक को बस यह तय करना है कि उसे कौन सा कार्य करवाना है, ये वीर वह कार्य पूर्ण कर सकते हैं।
साधना के प्रभाव — स्वभाव में परिवर्तन
सागरनाथ जी एक महत्वपूर्ण बात बताते हैं कि वीरों की साधना करने के बाद साधक का स्वभाव भी वीरों जैसा हो जाता है — उसका स्वभाव उग्र हो जाता है। साथ ही, साधक के मन से डर और भय पूर्ण रूप से समाप्त हो जाता है।
दीक्षा और मार्गदर्शन
सागरनाथ जी अपनी देखरेख में इस साधना को करवाने की बात करते हैं। जो साधक घर पर बैठकर स्वयं यह साधना करना चाहते हैं, उन्हें इसके साथ गुरु मंत्र, कील (कीलन) मंत्र, और आसन मंत्र भी प्रदान किया जाता है।
सागरनाथ जी बताते हैं कि उन्हें वीरों की विद्या के संबंध में बहुत सारे मेल, संदेश और कॉल प्राप्त होते हैं, जिसमें लोग वीर विद्या के ऊपर विशेष रूप से चर्चा करने का अनुरोध करते हैं, क्योंकि उनके पास वीर कंगन की यह विद्या उपलब्ध है।
दीक्षा कैसे मिलती है
सागरनाथ जी स्पष्ट करते हैं कि उनके पास साधकों की भारी मांग है, परंतु यह विद्या केवल उन्हीं शिष्यों को दी जाती है जो योग्य होते हैं — जो साधक केवल समय बिताने (टाइम पास) के उद्देश्य से आते हैं, वे इसे सिद्ध नहीं कर पाते।
## मुस्लिम परंपरा से तुलना
सागरनाथ जी बताते हैं कि इसी प्रकार का कड़ा मुस्लिम परंपरा में भी पाया जाता है, परंतु वे स्वयं वह कड़ा सिद्ध नहीं करवाते, क्योंकि उनके अधिकतर शिष्य नाथपंथ परंपरा से ही इसे सिद्ध करना पसंद करते हैं। हालांकि उनके पास वह कड़ा उपलब्ध है और उसे सिद्ध करने की विधि की भी जानकारी है — इस पर मलंग परंपरा से जुड़े कई तत्व कार्य करते हैं। परंतु अधिकतर साधक नाथपंथ से जुड़ने के बाद यही मांग करते हैं कि उन्हें नाथपंथ की ही साधनाएं करवाई जाएं, क्योंकि ये साधनाएं बहुत प्रबल होती हैं और शीघ्र कार्य सिद्ध करती हैं।
निष्कर्ष
21 वीरों का तंत्र नाथपंथ की एक अत्यंत प्रबल और आज लगभग लुप्त हो चुकी विद्या है। इस चर्चा से हमें निम्न महत्वपूर्ण बातें ज्ञात होती हैं:
– 21 वीर तंत्र में एक प्रारंभिक श्रेणी हैं, जबकि 52 वीर इससे ऊपर का सबसे उच्च पड़ाव माने जाते हैं।
– ये वीर षट्कर्म — मारण, उच्चाटन, वशीकरण और मोहन — करने की क्षमता रखते हैं।
– साधना पूर्णिमा और अमावस्या के दिन सरल विधि से — सिंदूर और इत्र के माध्यम से — की जा सकती है।
– यह साधना धन, व्यवसाय, विवाह, और शत्रु-निवारण जैसे बहुउद्देश्यीय कार्यों में सहायक मानी जाती है।
– यह विद्या नाथपंथ और मराठी परंपरा से जुड़ी है, और इसका संबंध कामाख्या पीठ से भी है।
– यह विद्या केवल योग्य और गंभीर साधकों को ही गुरु की देखरेख में प्रदान की जाती है।
अंततः यह संदेश स्पष्ट है — यह लुप्त होती जा रही वीर विद्या जन-कल्याण की भावना से सामने रखी जा रही है, ताकि सच्चे साधक इसका सही उपयोग कर अपने जीवन को संवार सकें।
राम राम। जय माता की। आपका दिन शुभ और मंगलमय हो।
