नरसिंह वीर साधना: एक सच्चा अनुभव और उसकी अद्भुत शक्ति

प्रस्तावना

आज के इस लेख में हम बात करेंगे नरसिंह वीर साधना की, जिसके बारे में सागरनाथ जी ने अपना एक निजी और वास्तविक अनुभव साझा किया है। यह कोई साधारण या छोटा-मोटा अनुभव नहीं है, बल्कि एक बहुत उग्र और गहरा अनुभव है, जिसमें उन्होंने बताया कि यह मंत्र उन्हें कैसे प्राप्त हुआ, किन परिस्थितियों में उन्हें इसकी आवश्यकता पड़ी, और इस साधना के माध्यम से उन्होंने किस तरह की शक्तियों का सामना किया और उन पर विजय पाई। इस लेख में हम पूरी घटना को, जैसा सागरनाथ जी ने बताया, क्रमबद्ध रूप में समझने का प्रयास करेंगे।

सागरनाथ जी ने अपनी बात की शुरुआत राम-राम, जय माता की और “ओम नमो ते वासुदेवाय, ओम नमो भगवते वासुदेवाय” के उच्चारण से की।

एक अहंकारी साधक से टकराव

घटना की शुरुआत तब हुई जब सागरनाथ जी की मुलाकात एक ऐसे साधक से हुई, जो स्वयं को बहुत बड़ा “चैंपियन” मानता था। दोनों के बीच हनुमान जी के विषय में बातचीत चल रही थी। बातचीत के दौरान वह साधक अहंकार में आकर सागरनाथ जी को धमकाने लगा और बोला कि वह उनका “यह” कर देगा और “वो” कर देगा। इस तरह दोनों के बीच बहस छिड़ गई।

सागरनाथ जी ने उस समय शांति से कहा कि तू जो करना है कर, लेकिन आज मैं तेरा जो करूंगा, वह मुझे मालूम है। फोन रखने के बाद, शाम के समय सागरनाथ जी अपनी गद्दी पर, अपने आसन पर बैठ गए और ध्यानमग्न होकर अपनी विधि-विधान की क्रिया शुरू की।

गुरु की आत्मा का आह्वान

सबसे पहले सागरनाथ जी ने उस साधक के गुरु को बुलाया, जो पहले ही स्वर्गवासी हो चुके थे। उन्होंने उस गुरु की आत्मा को खींचकर बुलाया। पता चला कि वह गुरु स्वयं एक उच्च स्तर के अघोरी साधक थे। यही गुरु थे जिन्होंने अपने शिष्य के माध्यम से सागरनाथ जी पर नरसिंह का प्रयोग करवाया था, ताकि उन्हें जड़ से उखाड़ा जा सके। यह बात सागरनाथ जी को बातचीत के बीच में ही पता चली।

जब उस गुरु की आत्मा को बुलाया गया, तो उसने पहले राम-राम किया और कहा कि “मैं तो अघोरी हूं, तू मुझे जानता है।” इस पर सागरनाथ जी ने कड़े स्वर में पूछा कि उसने अपने शिष्यों को क्या विद्या दी है, जिसके बल पर उसके शिष्य ने यह प्रयोग किया।

गुरु ने बताया कि उसने अपने शिष्य को सभी मंत्र दिए थे, लेकिन शिष्य ने उन्हें विधिवत सिद्ध नहीं किया था। वह अपनी सारी विद्या केवल वचनों के माध्यम से चलाता है। जब गुरु संसार छोड़ने वाला था, तब उसने अपनी अंतिम “चुलियां” (जल अर्पण की क्रिया) के समय अपने शिष्य को ये सभी मंत्र लिखवा दिए थे, ताकि उसकी विद्या का कोई मूल आधार आगे बना रहे।

यह सुनकर सागरनाथ जी ने कहा कि अब वे उस तंत्र को काट देंगे, जो उस गुरु के शिष्य ने उन पर छोड़ा है। जब उन्होंने पूछा कि अब उस शिष्य का क्या किया जाए, तो गुरु ने खुद ही खुली छूट दे दी और कहा कि जैसा चाहे वैसा हाल करो, क्योंकि अब वह सागरनाथ जी के बंधन में आ चुका है।

गुरु को दंड

इसके बाद सागरनाथ जी ने उस गुरु की आत्मा को मंत्रों के माध्यम से बांधकर सजा दी। वह आत्मा दर्द से चीखने लगी और छोड़ने की गुहार लगाने लगी, यहां तक कहा कि उसके सारे मंत्र, गुरु, पीर सब साथ छोड़ चुके हैं। उसने कई कसमें भी दीं ताकि उसे छोड़ दिया जाए, लेकिन सागरनाथ जी ने स्पष्ट कर दिया कि वे कोई जिन-भूत नहीं हैं जिन्हें कसमों से डराया जा सके, बल्कि वे साक्षात शिव-स्वरूप में बैठे हैं।

इसी समय भगवान शंकर की वहां हाजिरी हो गई। उन्होंने पूछा कि क्या हो रहा है, और सागरनाथ जी ने पूरी बात बताई। भगवान शंकर ने कहा कि उसे मत छोड़ो। सागरनाथ जी के पास उस समय एक त्रिशूल था, जिसे उन्होंने अभिमंत्रित करके प्रयोग में लाया। इस क्रिया में गुरु की आत्मा को गहरी पीड़ा हुई, और उसने स्वयं ही अपने शिष्य द्वारा किए गए प्रयोग के बारे में बताना शुरू किया।

गुरु ने बताया कि उसने अपने शिष्य को नरसिंह सिद्ध करने की विधि बताई थी। यह विधि इस प्रकार थी — मछली का भोग देना होता है, उपले के ऊपर मंत्र पढ़कर वह भोग चढ़ाया जाता है, और इस विधि से नरसिंह, जिन्हें चौदह भुवनों का स्वामी बताया गया, जो कार्य कहा जाए वह कर देते हैं।

शिष्य पर क्रिया

गुरु का काम निपटाने के बाद, सागरनाथ जी ने उस शिष्य को भी पकड़ा। उन्होंने उसकी आत्मा (जिसे “अक्स” कहा गया) को भी खींच लिया। त्रिशूल और चिमटा दोनों तैयार रखे गए थे।

कुछ समय बाद जब वह साधक स्वयं फोन पर आया और बोला कि उसने भी सागरनाथ जी पर प्रयोग कर दिया है और अब उसकी बारी है, तो सागरनाथ जी ने उसे खुली चुनौती दे दी कि जो करना है कर ले। उस साधक ने मंत्र पढ़े, माता काली का आह्वान किया, अपने “ग्यारहवीं वाले देवता” को बुलाया, लेकिन अंततः उसने हार मान ली और कहा कि उसका गुरु समाप्त हो चुका है और अब उसके पीछे कुछ नहीं बचा।

इसके बाद सागरनाथ जी ने आटे का एक पुतला तैयार करके रखा था। उन्होंने उस पुतले पर, त्रिशूल पर पहले से चढ़े गुरु के नींबू के ऊपर, अब उस शिष्य का नींबू भी चढ़ा दिया और क्रिया संपन्न की। भगवान शंकर स्वयं उन्हें मार्गदर्शन दे रहे थे। इस क्रिया के परिणामस्वरूप भगवान शंकर ने कहा कि उस साधक को कीड़े पड़ेंगे और वह छह महीने के भीतर मृत्यु को प्राप्त होगा। बाद में उस साधक ने स्वयं फोन करके बताया कि उसकी हालत बहुत बिगड़ गई है और उसे कहीं भी कोई सुनवाई नहीं मिल रही।

भगवान शंकर द्वारा नरसिंह मंत्र की प्राप्ति

इस पूरी घटना के बाद सागरनाथ जी ने भगवान शंकर से पूछा कि आगे क्या करना है, क्योंकि यह साधक तो “थर्ड क्लास” निकला और उनका समय व्यर्थ गया। भगवान शंकर ने आश्वासन दिया कि चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है, कोई भी उन पर हाथ नहीं डाल सकता। उन्होंने बताया कि जिस मंत्र से उस साधक ने प्रयोग सिद्ध किया था, वही मंत्र वे सागरनाथ जी को भी सिद्ध करवाएंगे।

स्वप्न में मंत्र की प्राप्ति

लगभग एक सप्ताह बाद, वर्ष 2014 में, जब सागरनाथ जी योग निद्रा में थे, तब भगवान शंकर जटाधारी रूप में उनके पास आए और बोले कि अब मंत्र लिखने का समय आ गया है। उन्होंने बताया कि घर पर एक डायरी पड़ी है, जिस पर यह मंत्र लिखा हुआ मिलेगा। इसके बाद भगवान शंकर ने स्वयं मंत्र का उच्चारण किया, और सागरनाथ जी उसे स्वप्न में ही लिखते गए। सुबह उठने पर उन्हें पूरी विधि याद थी कि इस मंत्र को कैसे सिद्ध और प्रयोग में लाना है।

भगवान शंकर ने यह भी बताया कि यह नरसिंह वीर हर प्रकार का कार्य सिद्ध करता है — मारण हो, उच्चाटन हो, या कोई भी अटका हुआ कार्य — यह सब पूर्ण कर सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि दुनिया में चाहे किसी भी मत या धर्म का तंत्र क्यों न हो — मुस्लिम, अंग्रेज, ईसाई, बौद्ध, कोई भी — यह मंत्र उन सभी की काट करने में सक्षम है।

नरसिंह वीर मंत्र (शाबरी विद्या)

भगवान शंकर द्वारा दिया गया यह मंत्र इस प्रकार है, जिसे “वीर कंगन में चलाने” का मंत्र भी कहा जाता है:

“ओम नमो आधे श्री गुरु जी को नरसिंह वीर महाबलवीर मारे वैरी पकड़ के सिर मेरा भेजा जाए। कहां काम करके आए ना आए तो द्वादश ज्योतिर्लिंग तोड़ के आए। मेरा भेजा पीछे मुड़े तो मुड़ मेरा काम सवारे। बिना काम किया आए तो भक्त प्रह्लाद का कलेजा खाए। मेरा बुलाया ना आए। शिव जी का तीजा नेत्र फोड़ के आए। शीघ्र नरसिंह महाराज ना हो तो सर्वेश्वर देव की लाज। चले मंत्र फेरे वाचा देखा नरसिंह देव तेरे इल्म का तमाशा दुहाई गुरु गोरखनाथ की।”

यह गुरु गोरखनाथ की शाबरी विद्या का मंत्र बताया गया है।

साधना की विधि

भगवान शंकर द्वारा बताई गई विधि इस प्रकार है:

– एक अंगियारी (गांव के उपले की) तैयार करनी होती है।
– मछली को साफ नहीं करवाना, बल्कि सबूत (पूरी) कटवा लेनी होती है — दो मछलियां लेनी होती हैं, जिन्हें छोटे-छोटे टुकड़ों में कटवाया जाता है, ताकि उनकी आहुतियां दी जा सकें।
– साथ में थोड़ा-सा घी भी लिया जाता है।
– एक पानी वाला नारियल पास रखा जाता है।

भगवान शंकर के अनुसार, यह साधना 1 से 41 दिनों में सिद्ध होती है, और प्रतिदिन इसकी आहुति दी जाती है। सागरनाथ जी ने बताया कि उन्होंने स्वयं यह साधना 41 दिनों में इसी विधि से सिद्ध की थी।

नरसिंह देव के उग्र स्वरूप का दर्शन

साधना के प्रारंभिक सप्ताह के भीतर ही सागरनाथ जी को योग निद्रा में नरसिंह भगवान का दर्शन हुआ। यह स्वरूप अत्यंत विशाल और नारायण स्वरूप था — सोने की जूती पहने हुए, पीले रंग का पीतांबर धारण किए हुए। उनका शरीर इतना विशाल था कि वह आसमान छू रहा था, और सागरनाथ जी उनके सामने एक जुगनू के समान प्रतीत हो रहे थे।

नरसिंह भगवान का मुख अत्यंत विशाल था — आंखों से ज्वाला निकल रही थी, दाढ़ें शस्त्र के समान तीक्ष्ण थीं, और हाथों के नाखून वज्र के समान थे। वे दहाड़ रहे थे। यह स्वरूप देखकर सागरनाथ जी की आत्मा कांप उठी और वे उस तेज को सहन नहीं कर पा रहे थे। भय के मारे वे भागने लगे, जबकि नरसिंह भगवान उन्हें “सागर रुक जा” कहकर पुकार रहे थे। बड़े आकार के कारण उनका एक कदम ही बहुत बड़ी दूरी तय कर लेता था।

सागरनाथ जी ने विनती की कि वे छोटे रूप में आएं क्योंकि इतना बड़ा रूप सहन करना कठिन है। इस पर नरसिंह भगवान ने अपना रूप छोटा करके लगभग 10 फुट का कर लिया। तब भी उनके मुख पर रक्त लगा हुआ था। जब उन्होंने “प्रह्लाद, रुक जा” कहकर पुकारा, तब सागरनाथ जी रुक गए।

अंततः सागरनाथ जी ने भय के बावजूद साहस करके उनके चरण पकड़ लिए और दंडवत होकर क्षमा-याचना की। नरसिंह भगवान ने कहा कि वे प्रसन्न हैं और डरने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि जैसे भक्त प्रह्लाद उन्हें प्रिय थे, वैसे ही सागरनाथ जी भी प्रिय हैं।

इसके बाद नरसिंह भगवान ने उन्हें गोद में बिठाकर समझाया कि वे सदैव उग्र रूप में ही प्रकट होते हैं — जो भक्त इस उग्रता को सह लेता है, उसे वर प्राप्त होता है, और जो नहीं सह पाता, उसकी तपस्या भंग हो जाती है। उन्होंने आश्वासन दिया कि सागरनाथ जी की तपस्या भंग नहीं होगी, क्योंकि उनके पीछे वे सभी देवी-देवता खड़े हैं जिन्हें उन्होंने सिद्ध किया है।

नरसिंह भगवान ने यह भी बताया कि साधना अभी पूरी नहीं हुई है — एक सप्ताह हो चुका है, अभी 41 दिन पूरे करने हैं। लेकिन वर पहले ही दिया जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि दुनिया का कोई भी तंत्र, मंत्र या यंत्र क्यों न हो, इसी मंत्र में उसकी काट है, और जो भी कार्य-सिद्धि कहेंगे, वे करेंगे — चाहे मारण हो या उच्चाटन। साथ ही, उन्होंने यह भी बताया कि भविष्य में जो भी तंत्र उन पर चलाए जाएंगे, वे उन्हें दिखाएंगे कि उन्हें कैसे तोड़ा जाए।

साधना सिद्ध होने के बाद के अनुभव

क्रिश्चियन आत्मा से रक्षा

41 दिन पूर्ण होने के बाद सागरनाथ जी को कई अनुभव हुए। एक बार, चूंकि सागरनाथ जी ईसाइयों के विरुद्ध सीधी बातें कहते थे, इस कारण कुछ लोगों ने जलकर किसी फादर के माध्यम से उन पर एक नकारात्मक शक्ति (क्रिश्चियन आत्मा) छोड़ दी। यह शक्ति उन्हें पकड़ लेती है और उनके एक पैर में असहनीय दर्द होने लगता है, जिससे वे सो नहीं पाते और हिल भी नहीं पाते।

इस स्थिति में उन्होंने स्वप्न में यही नरसिंह मंत्र पढ़ना शुरू किया। नरसिंह भगवान प्रकट हुए और उस शक्ति को दहाड़ते हुए पकड़ लिया, पूछा कि तू कौन है और तुझे किसने भेजा है। वह आत्मा गूंगी थी (जो व्यक्ति मरा था, वह जन्म से गूंगा था), इसलिए वह कुछ बोल नहीं पाई। नरसिंह भगवान ने अपनी दाढ़ों से उसे पकड़कर चीर डाला, और इस प्रकार वह तंत्र समाप्त हो गया।

हांडी तंत्र से रक्षा

एक अन्य अवसर पर किसी ने सागरनाथ जी पर “हांडी का तंत्र” प्रयोग किया। इस अनुभव में सागरनाथ जी ने स्वयं को सिंहासन पर बैठा हुआ देखा, जबकि उनके चारों ओर सांड के रूप में काले जिन (नकारात्मक शक्तियां) चक्रव्यूह की भांति घूम रहे थे। जैसे ही वे कदम आगे बढ़ाने की कोशिश करते, यह चक्रव्यूह घूमने लगता।

तभी एक पर्वत पर नरसिंह भगवान का काले रंग का स्वरूप प्रकट हुआ, जिसकी नथ सोने की थी और नाखून वज्र के समान सोने के चमकते हुए थे। वे क्रोध से तमतमा रहे थे। उन्होंने सागरनाथ जी को खड़े रहने का आदेश दिया और कहा कि इनका इलाज वे स्वयं करेंगे। इसके बाद नरसिंह भगवान ने उन काले जिनों पर उसी प्रकार आक्रमण किया, जैसे शेर अपने शिकार पर झपटता है, और पांच मिनट के भीतर उन सभी को लहूलुहान करके मार डाला। इस प्रकार यह तंत्र भी समाप्त हुआ।

एक अन्य साधक पर प्रयोग

इसके बाद नरसिंह भगवान ने सागरनाथ जी को बताया कि एक और व्यक्ति, जो स्वयं को बहुत उच्च स्तर का साधक मानता था और जिसका गुरु भी उच्च स्तर का था, उसका भी सामना करना है। मंत्र जाप करते हुए सागरनाथ जी उसके डेरे में (जहां वह गद्दी लगाकर बैठा था) पहुंचे। वहां नरसिंह भगवान ने अपने मुख से अग्नि निकालकर सभी को जला दिया।

उस साधक के जटाधारी गुरु के साथ भी नरसिंह भगवान ने कठोर व्यवहार किया — उसे दीवारों में पटका, थप्पड़ मारे। जब वह गुरु अपना चिमटा लेकर आक्रमण करने दौड़ा, तो नरसिंह भगवान ने उसे आसानी से परास्त कर उसकी गर्दन पकड़कर उसका शरीर अलग-अलग स्थानों पर फेंक दिया। इसके बाद उन्होंने चेतावनी दी कि इस त्रिलोक में कोई भी उन्हें रोकने वाला नहीं है।

पंचमुखी हनुमान जी के दर्शन

सागरनाथ जी ने एक और अनुभव साझा किया, जिसमें उन्हें अपने घर की रसोई में पंचमुखी हनुमान जी का दर्शन हुआ। केले के पत्तों पर पांच मुखों के सामने गुड़ के चावल रखे हुए थे, जिन्हें हनुमान जी ग्रहण कर रहे थे। सागरनाथ जी उनसे मात्र 10 फुट की दूरी पर खड़े थे। जब हनुमान जी ने भोजन ग्रहण कर लिया, तो सागरनाथ जी ने उन्हें नमस्कार किया।

उस समय नरसिंह भगवान ने भी हनुमान जी की ओर संकेत करते हुए कहा कि यह वही भक्त है, अपने प्रह्लाद की तरह। यह सुनकर सागरनाथ जी भयभीत हो गए, परंतु हनुमान जी ने आश्वस्त किया कि यह अपना भक्त है, इसे कुछ मत कहो, और उन्हें आशीर्वाद दिया।

जाते समय हनुमान जी से इतनी ऊर्जा निकल रही थी कि चंद्रमा की रोशनी भी उसके सामने फीकी पड़ रही थी। सागरनाथ जी हाथ जोड़कर “ओम नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करते हुए उनके पीछे-पीछे चले। यह मंत्र भी उन्हें बताया गया था, और यह वचन दिया गया था कि इस मंत्र के जाप से हनुमान जी हर रूप में उनके साथ चलेंगे।

इस साधना के लाभ

सागरनाथ जी के अनुसार, इस नरसिंह वीर साधना का सबसे बड़ा लाभ उन लोगों के लिए है, जिनके घर पर बहुत बड़ा तंत्र-प्रयोग हो चुका है और जो तंत्र के कारण अपना जीवन और घर बर्बाद होते देख चुके हैं। यह साधना ऐसे तंत्रों को शीघ्र ही समाप्त करने की क्षमता रखती है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि इसके लिए भगवान शंकर द्वारा बताई गई विधि का पालन करना आवश्यक है, चाहे साधक वैष्णव हो या तामसी। जीवन को संवारने के लिए यह विधियां अपनानी पड़ती हैं, जो स्वयं देवता के मुख से बताई गई हैं। साथ ही, यह भी कहा कि जो व्यक्ति इन बातों को स्वीकार नहीं कर सकता, उसे इस पर विश्वास करने की कोई बाध्यता नहीं है — यह सबकी अपनी श्रद्धा और चयन का विषय है।

सागरनाथ जी ने जोर देकर कहा कि उनके लिए भगवान शंकर के वचन अमृत के समान सत्य हैं, और उन्हें केवल अपनी साधना और जीवन को संवारने से मतलब है, दूसरों के मत या आलोचना से कोई सरोकार नहीं। उन्होंने इसे “पीएचडी डिग्री” जैसी उच्चतम साधना बताया, न कि कोई छोटी-मोटी उपलब्धि।

निष्कर्ष

इस पूरी चर्चा में सागरनाथ जी ने अपने निजी अनुभवों के माध्यम से नरसिंह वीर साधना के महत्व और शक्ति को विस्तार से बताया। एक अहंकारी साधक और उसके गुरु के साथ हुए टकराव से यह साधना उनके जीवन में आई, जब भगवान शंकर ने स्वप्न में स्वयं उन्हें शाबरी विद्या का यह गुप्त मंत्र प्रदान किया। इसके बाद 41 दिनों की विधिपूर्वक साधना से यह मंत्र सिद्ध हुआ, और नरसिंह भगवान के उग्र किंतु करुणामय स्वरूप के प्रत्यक्ष दर्शन हुए।

इसके पश्चात कई अवसरों पर — चाहे वह कोई विदेशी तांत्रिक प्रयोग हो, हांडी का तंत्र हो, या किसी अन्य उच्च स्तर के साधक द्वारा किया गया आक्रमण — नरसिंह भगवान ने स्वयं प्रकट होकर उनकी रक्षा की और उन शक्तियों का नाश किया। साथ ही, पंचमुखी हनुमान जी के दर्शन का अनुभव भी इस साधना यात्रा से जुड़ा एक महत्वपूर्ण पड़ाव रहा।

सागरनाथ जी के अनुसार, यह साधना विशेष रूप से उन लोगों के लिए वरदान सिद्ध हो सकती है, जो गंभीर तांत्रिक बाधाओं से पीड़ित हैं, परंतु इसके लिए निर्धारित विधि का श्रद्धापूर्वक और नियमपूर्वक पालन आवश्यक है। यह संपूर्ण अनुभव उनकी अपनी साधना यात्रा और आस्था का प्रत्यक्ष प्रमाण है, जिसे उन्होंने इस सत्संग के माध्यम से श्रोताओं के साथ साझा किया।

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