लखदाता पीर (लाला वाले पीर) साधना: भैरव यति और 41 मलंगों की महान गाथा

प्रस्तावना

Mythologynath.com पर आज एक बहुत ही जबरदस्त साधना लेकर उपस्थित हैं सागरनाथ जी — लालों वाले पीर की साधना, जिनके साथ भैरव यति भी चलते हैं। यह अत्यंत प्रभावशाली साधना मानी गई है, जिसे यदि कोई व्यक्ति पूरी श्रद्धा से करे, तो उसकी संपूर्ण जिंदगी बदल सकती है। आइए इस साधना के विषय में विस्तार से जानते हैं, जैसा सागरनाथ जी ने बताया।

लखदाता की सिद्धि — भैरव यति के साथ

सागरनाथ जी ने बताया कि आज वे लखदाता की सिद्धि, भैरव यति के साथ लेकर आए हैं। इस साधना को सिद्ध करने के बाद साधक संसार का कोई भी कार्य कर सकता है। यह मूल रूप से एक मनोकामना साधना है, जो साधक के घर में इतनी धन-धान्य और बरकत भर देती है कि साधक उसे समेटते-समेटते भी नहीं समेट पाएगा — यह “छप्पड़ फाड़कर” देती है। यदि साधक गरीब है, तो उसकी गरीबी का श्राप भी समाप्त हो जाता है।

लाला वाला पीर नाम क्यों

इस पीर को “लाला वाला पीर” इसलिए कहा जाता है, क्योंकि यदि किसी दंपति को संतान नहीं हो रही हो, या केवल पुत्रियां ही हो रही हों, तो इस साधना को करने से पुत्र की प्राप्ति सुनिश्चित होती है। सागरनाथ जी ने बताया कि यह पुत्र आगे चलकर तपस्वी बनेगा, अपने माता-पिता का नाम रोशन करेगा और उनकी सेवा करेगा। जिसने इस लाला वाले पीर को प्रसन्न कर लिया, उसके लिए संसार में फिर कुछ भी शेष नहीं रह जाता।

भैरव यति की कथा

इस साधना में भैरव यति भी साथ चलते हैं, जो पीर निगाहे की पिंडी के रूप में जाने जाते हैं। इनकी कथा इस प्रकार है — एक बार भैरव किसी जगह फंस गए थे, जब एक जादूगर ने उन्हें कैद कर लिया और उनसे जबरन कार्य करवाना शुरू कर दिया। भैरव के पास सारा बल होने के बावजूद उनकी कहीं सुनवाई नहीं हो रही थी।

दुखी होकर भैरव ने परमात्मा से प्रार्थना की कि यदि धरती पर कोई पुण्य आत्मा उन्हें इस नर्क से मुक्त करा दे, तो वे जीवनभर उसकी सेवा करेंगे। उसी समय लाला वाले पीर वहां से गुजर रहे थे। जब उन्हें भैरव यति की इस दुर्दशा का पता चला, तो उन्होंने जादूगर का नाश करके उसका मान भंग किया और भैरव को मुक्त कराया।

इस उपकार के बदले भैरव यति ने लाला वाले पीर को वचन दिया कि वे सदैव उनके आगे चलेंगे, और जो भी दुखी फरियादी उनके पास आएगा, उसके सभी कार्य पूर्ण करेंगे।

41 मलंगों की कथा

सागरनाथ जी ने बताया कि इस साधना से जुड़ा एक और विशेष लाभ यह है कि इसे करने से साधक के साथ स्वतः ही 41 मलंग चलने लगते हैं। मलंग वे साधक होते हैं जो केवल लंगोट धारण करते हैं, शरीर से पूरी तरह नंगे रहते हैं, जटाधारी होते हैं, और सदैव धूणी तपाते हैं। ये सांसारिक कार्यों से कोई सरोकार नहीं रखते, परंतु एक बार जिसका कार्य करने का वचन दे दें, वह निश्चित रूप से पूर्ण होता है — इसे कोई भी रोक नहीं सकता।

इनकी उत्पत्ति की कथा इस प्रकार है — एक व्यक्ति, जिसका नाम गुप्त रखा गया, को एक संतान की इच्छा थी। परंतु आशीर्वाद में अंक लिखते समय गलती से “1” की जगह “41” लिख दिया गया। इस प्रकार उस व्यक्ति की पत्नी को 41 संतानें प्राप्त हुईं। यह देखकर उसने सभी बच्चों को एक टोकरी में डालकर जीवित ही धरती में दफना दिया। परंतु यह देव-कृपा थी कि उनकी सांसें चलती रहीं, और वे धरती के भीतर ही बड़े होते गए।

वहां से आती अजीब आवाजों को सुनकर लोग डरकर भाग जाया करते थे, यह समझकर कि वहां कोई भूत-प्रेत है। एक दिन लाला वाले पीर वहां से गुजर रहे थे, तभी उन्हें नाम लेकर आवाज़ लगाई गई। वे समझ गए कि यहां 41 मलंग विद्यमान हैं। जब उन्होंने उन्हें बाहर आने को कहा, तो मलंगों ने बताया कि वे जवान हो चुके हैं और पूर्णतः नग्न हैं, इसलिए बाहर नहीं आ सकते। इस पर लाला वाले पीर ने अपनी पगड़ी (साफा) को फाड़कर उनके लिए 41 लंगोट बनाए, जिससे सभी मलंग पूर्ण हुए।

इसके बाद मलंगों ने बताया कि उन्होंने वर्षों से व्रत (रोजा) रखा हुआ है और उन्हें भूख लगी है। तभी उन्होंने पीर के सामने खड़े उनके दिव्य घोड़े “कक्की कौड़ी” को देखा और उसे मारकर खा लिया। परंतु चूंकि वह एक देव-घोड़ा था, वह पुनः जीवित हो गया। इसके बाद इन मलंगों और भैरव यति ने पीर को वचन दिया कि वे उनके घोड़े के पीछे चलेंगे, और जो भी भक्त व फरियादी पीर के पास आएंगे, उनका कार्य भी ये मलंग करेंगे।

लखदाता पीर की विशेषता

सागरनाथ जी ने बताया कि यह लखदाता पीर आज तक की गवाही के अनुसार किसी का कार्य अधूरा नहीं छोड़ते। इनके दरबार में जो भी कार्य होते हैं, वे भैरव यति और 41 मलंग मिलकर पूर्ण करते हैं।

लखदाता पीर का मंत्र

सागरनाथ जी द्वारा बताया गया मंत्र इस प्रकार है:

“काला भैरों कालियां जटा, हाथ कड़ा मोड़े मढ़ा, जहां भेजूं भैरों यति, वहीं हाजिर खड़ा। कक्की घोड़ी सब्ज लगाम, उत्ते चढ़े, सखी सुल्तान चले, मंतर फुरे वाचा देखा। बाबा लखदाता पीर, तेरे इल्म का तमाशा, मेरे गुरु का शब्द साचा।”

साधना की विधि

सागरनाथ जी ने साधना की पूरी विधि इस प्रकार बताई:

– यह साधना वैष्णव भोग पर आधारित है।
– सवा किलो चावल की “निहारी” (पीले रंग का भोग, जिसे पंजाबी में यह नाम दिया जाता है) पहले दिन और अंतिम दिन बनानी है।
– यह साधना 41 दिनों की है।
– कम से कम पांच माला प्रतिदिन करनी है।
– पास में जल रखना है, जिसे प्रतिदिन पीना और उसी से स्नान करना है।
– साथ में इत्र भी रखना है।
– पांच या सात लड्डू अर्पित करने हैं।
– भैरव यति के दरवेश (सेवक स्वरूप) को काला कुत्ता भोग स्वरूप देना है।
– अंतिम दिन नीले रंग की सवा मीटर की चादर चढ़ानी है, जिसे इनके स्थान या मजार पर, अथवा वह उपलब्ध न हो तो पीपल के वृक्ष के नीचे अर्पित किया जा सकता है।
– धूणी (जैसे पाथी/उपले की होती है) जलानी है, उस पर घी और लड्डू के टुकड़े अर्पित करने हैं।
– चौमुखी दीपक जलाना बेहतर है, परंतु सिंगल मुखी दीपक भी चलेगा।

साधना कब शुरू करें

यह साधना वीरवार (गुरुवार) से आरंभ करनी है — विशेष रूप से वह वीरवार जब चंद्रमा बलवान हो, अर्थात अमावस्या के बाद आने वाला वीरवार, जिसे “जेठा वीरवार” भी कहा जाता है।

अन्य नियम

सागरनाथ जी ने कुछ अतिरिक्त नियम भी बताए:

– साधना के लिए कोई विशेष वस्त्र आवश्यक नहीं, कोई भी कपड़े पहने जा सकते हैं।
– मुख दिशा पूर्व की ओर रखनी है।
– साधना का समय शाम 6 बजे से रात 12 बजे से पहले, या सुबह 6 बजे से 10 बजे तक पूर्ण कर लेना चाहिए।
– चिराग तेल के दीपक का ही जलाना है।
– साधना काल में 41 दिनों का ब्रह्मचर्य पालन अनिवार्य है, क्योंकि यह एक सीधी सिद्धि-साधना है, कोई साधारण साधना नहीं।

माला का प्रकार

इस साधना में तस्बी (मुस्लिम परंपरा की माला) का प्रयोग होता है। सफेद हकीकी और काली हकीकी, दोनों प्रकार की माला का उपयोग किया जा सकता है। 13 वर्ष से अधिक आयु के बच्चे भी यह साधना कर सकते हैं। महिलाओं के मासिक धर्म के दिनों में साधना से 4-5 दिन का ब्रेक लिया जा सकता है, इसके बाद साधना पुनः निरंतर जारी रखी जा सकती है।

रंग की प्राथमिकता

सागरनाथ जी ने विशेष रूप से स्पष्ट किया कि इन्हें नीला रंग अत्यंत प्रिय है, न कि हरा रंग, जैसा आजकल प्रचलित हो गया है। उन्होंने इसे समाज में फैला हुआ एक ढकोसला बताया और कहा कि नीला रंग ही इनकी सच्ची पसंद है।

परहेज

इस साधना के दौरान मांस, मुर्गा और शराब का पूर्णतः त्याग करना आवश्यक है, क्योंकि लखदाता पीर स्वयं ये चीजें ग्रहण नहीं करते और अपने साधक को भी इनका सेवन नहीं करने देते। गृहस्थ साधकों को 41 दिनों तक इन चीजों से परहेज करना चाहिए, इसके बाद सामान्य जीवन-शैली जारी रखी जा सकती है।

साधना सिद्ध होने के संकेत

सागरनाथ जी ने बताया कि यह पीर साक्षात दर्शन देते हैं — अपने दिव्य घोड़े “कक्की कौड़ी” पर सवार होकर सामने प्रकट हो सकते हैं। ये संसार की हर मनोकामना पूर्ण करते हैं और कानों में सीधे मार्गदर्शन भी देते हैं — यह एक प्रकार की आकाशवाणी होती है। यदि साधना पूर्ण होने पर इनकी चौकी या सवारी भी प्राप्त हो जाए, तो यह “सोने पे सुहागा” के समान है।

सागरनाथ जी ने यह भी स्पष्ट किया कि यह एक अत्यंत शांत और वैष्णव स्वरूप का पीर है, जो कभी तामसी रूप में कार्य नहीं करता, फिर भी संसार का हर कार्य संपन्न कर सकता है।

जीवन-सुधार की सलाह

सागरनाथ जी ने साधकों को सलाह दी कि साधना में आगे बढ़ने से पहले पहले अपने घर और जीवन को सुधारना चाहिए। जब व्यक्तिगत जीवन में सुधार दिखने लगे, तभी चौकी लगाकर आगे के कार्य लिए जा सकते हैं।

कड़ा साधना — विशेष विस्फोटक साधना

सागरनाथ जी ने इस मंत्र से जुड़ी एक विशेष अतिरिक्त विधि भी बताई — कड़ा साधना। इसके लिए 11 सामान्य धातु के कड़े लेकर, उन्हें 41 दिनों तक जल में भिगोकर, साधना के सामने रखा जाता है। 41 दिन पूर्ण होने के बाद ये कड़े धारण किए जा सकते हैं। यह मंत्र मूल रूप से “कड़ा साधना” वाला मंत्र है, और शाबर मंत्रों में कड़ा साधना को एक सामान्य साधना नहीं, बल्कि उच्च शक्ति (हाई पावर) और अत्यंत प्रभावशाली, “विस्फोटक” साधना माना जाता है।

निष्कर्ष

इस चर्चा में सागरनाथ जी ने लखदाता पीर (लाला वाले पीर) की साधना का विस्तृत वर्णन किया, जो भैरव यति और 41 मलंगों के साथ चलने वाली एक अत्यंत शक्तिशाली मनोकामना साधना है। इस साधना की पृष्ठभूमि में भैरव यति की मुक्ति और 41 मलंगों की अद्भुत उत्पत्ति की कथाएं जुड़ी हैं, जो इस पीर की महानता को दर्शाती हैं।

41 दिनों तक चलने वाली इस साधना में वैष्णव भोग, नीली चादर, धूणी, तेल का दीपक और तस्बी माला का प्रयोग होता है, तथा वीरवार से इसकी शुरुआत की जाती है। सागरनाथ जी के अनुसार, यह साधना विशेष रूप से संतान-सुख, धन-समृद्धि और जीवन की हर मनोकामना पूर्ण करने में सक्षम है। साथ ही उन्होंने कड़ा साधना जैसी एक विशेष उच्च-शक्ति विधि का भी उल्लेख किया, जो इस मंत्र को और भी प्रभावशाली बनाती है। पूरी श्रद्धा, अनुशासन और नियमों के पालन के साथ की गई यह साधना साधक के जीवन में स्थायी और असीम परिवर्तन लाने में सक्षम मानी गई है।

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