15 जिनों की सिद्धि: सागरनाथ नाथपंथ की एक अनोखी साधना

परिचय

Mythologynath.com पर गुरु सागरनाथ जी की इस चर्चा में एक ऐसा विषय सामने आया है, जो शायद पहले कभी नहीं सुना या देखा गया होगा — एक ही मंत्र के माध्यम से 15 जिनों को सिद्ध करना, वह भी सात्विक जिनों को। ये सात्विक जिन साधक के हर तरह के कार्य पूर्ण करने में सक्षम माने जाते हैं, और ये केवल साधक को ही दिखाई देते हैं, किसी और को नहीं।

इन 15 जिनों में से एक प्रमुख जिन होता है, और उसके नीचे की श्रेणी में आने वाले शेष जिन उसके अधीन कार्य करते हैं — यानी वे उसके हुक्म को मानकर साधक का कार्य पूर्ण करते हैं।


साधना की पृष्ठभूमि

यह साधना सागरनाथ जी ने अपने एक शिष्य को करवाई थी। यह शिष्य इन विषयों में बहुत उत्सुक था और उसने सागरनाथ जी से इस साधना को करवाने का आग्रह किया। यह मंत्र वह शिष्य कहीं से एक मौलवी से लेकर आया था।

मौलवी ने उस शिष्य को बताया था कि यदि वह इस मंत्र को सिद्ध कर ले, तो उसका बेड़ा पार हो जाएगा — अर्थात वह इससे कोई भी कार्य ले सकेगा। परंतु मौलवी ने यह भी स्पष्ट किया था कि यह उसकी अपनी पहुंच से बाहर है। मौलवी स्वयं इन जिनों से कार्य तो लेता था, परंतु ये जिन उसके सामने प्रत्यक्ष होकर कार्य नहीं करते थे — बिना प्रत्यक्ष हुए ही, एक अरूपी स्वरूप में वे उसका कार्य करते थे।

शिष्य ने मौलवी को कुछ दक्षिणा देकर यह मंत्र प्राप्त किया और सागरनाथ जी के पास आकर इस पर प्रयोग (एक्सपेरिमेंट) करने की इच्छा जताई। यह घटना वर्ष 2012-13 की बताई गई है।


मंत्र की भाषा और स्वरूप

यह मंत्र अरबी प्रकार का है, जिसमें थोड़ा उर्दू भाषा का प्रभाव भी है और शेष शब्द अरबी प्रकार के हैं। यह मंत्र लंबा नहीं है — मात्र एक पंक्ति के आसपास है।


मंत्र की स्कैनिंग और जिनों का स्वरूप

जब सागरनाथ जी ने इस मंत्र पर ध्यान करके इसकी स्कैनिंग शुरू की, तो उन्हें इसमें कई महत्वपूर्ण जानकारियां प्राप्त हुईं।

15 नीलवर्णीय जिन

उन्हें दिखाई दिया कि इस मंत्र से जुड़े 15 जिन एक साथ चलते हैं। ये सभी नीलवर्णीय (नीले रंग के) जिन हैं, जो बिल्कुल वैष्णव शुद्ध और सात्विक स्वरूप के हैं। ये अधिकतर मक्का-मदीना में जाकर ध्यान करते हैं। इसमें एक मुख्य जिन होता है, और उसके साथ 14 अन्य जिन जुड़कर कुल 15 की संख्या पूर्ण होती है।

शिष्य ने बताया कि मौलवी ने भी यही जानकारी दी थी कि जब इन जिनों को बुलाया जाता है, तो वे मक्का-मदीना की ओर से ही आते हैं। ये अधिकतर शुक्रवार के दिन वहां जाकर ध्यान करते हैं, और उस दिन ये कार्य नहीं करते।

सफेद रंग का जिन

इसके अतिरिक्त, सागरनाथ जी को इस मंत्र में एक सफेद रंग का जिन भी दिखाई दिया। यह पूर्णतः सफेद रंग का है, इसके हाथ में एक चिराग है, और यह एक विशाल पहलवान के समान रूप में दिखाई देता है। जब सागरनाथ जी ने इससे संवाद किया, तो इसने स्वयं को बताया कि यह अपने रंग के कारण “दूधया जिन” कहलाता है — क्योंकि इसका रंग दूध जैसा सफेद है।


साधना विधि

आवश्यक सामग्री

इस साधना में निम्न सामग्री की आवश्यकता होती है:

– पीले रंग की मिठाई अर्पित करनी है।
– थोड़ा सा कच्चा दूध चलेगा।
– इत्र चलेगा।
– दो फूल अर्पित किए जा सकते हैं — गुलाब के या गेंदे के फूल दोनों चलेंगे।

माला का प्रकार

इस साधना में हकीक की माला का प्रयोग होता है। शुद्ध हकीक आजकल दुर्लभ है और मिलती भी है तो बहुत महंगी होती है, इसलिए साधारण हकीक की माला भी ली जा सकती है — सफेद हकीक की माला जो लगभग 200-300 रुपये में उपलब्ध हो जाती है।

साधना की अवधि

यह साधना 11 दिन या 21 दिन की की जा सकती है। साधना के दौरान भगवान की अगरबत्ती जलाना भी उचित बताया गया है।

माला फेरने की विधि

इस साधना में उल्टी माला फेरनी होती है, सीधी माला नहीं फेरी जाती। जो साधक अभ्यासी होते हैं, उन्हें उल्टी माला घुमाने की विधि पहले से पता होती है।


साधना के दौरान अनुभव

जिनों ने यह भी बताया कि साधना के दौरान साधक को कई तरह के दृश्य दिखाई देंगे। ये दृश्य भयानक नहीं, बल्कि अधिकतर सुंदर होंगे — धन-दौलत, मृत मुस्लिम सेना, और पैगंबर जैसे दृश्य दिखाई दे सकते हैं। परंतु साधक को इन दृश्यों में उलझे बिना केवल साधना और अपने ध्यान पर केंद्रित रहना है, जिससे ये जिन जल्दी नियंत्रण में आ जाते हैं।

शिष्य की सिद्धि का अनुभव

सागरनाथ जी ने अपने शिष्य को इस साधना में बिठाया और उसे इस मंत्र का शक्तिपात किया, साथ ही गुरु मंत्र का भी विधि-विधान से शक्तिपात किया।

जब शिष्य ने साधना करनी शुरू की, तो एक सप्ताह के भीतर ही मुख्य जिन — नीलवर्णीय जिन, जिसका नाम अब्बास मोहम्मद है — दिखना शुरू हो गया। साधना जारी रहने पर उसके सामने परछाइयां आकर खड़ी होनी शुरू हो गईं। 11 दिनों के भीतर ही यह अनुभव पूर्ण रूप से हो गया, जिसके बाद शिष्य ने इन जिनों से वचन लिए। अब ये जिन उस शिष्य के लिए कार्य कर रहे हैं।

शिष्य इनसे अच्छे कार्य लेता है, जैसे किसी की बंधी हुई चौकी को खोलना, भूत-प्रेत का उतारा करना, या लोगों के अन्य कार्य पूर्ण करना। यह भी बताया गया कि ये जिन ऐसे कार्यों को शीघ्रता से पूर्ण कर देते हैं।


किसी भी धर्म से की जा सकने वाली साधना

यह साधना करने के लिए साधक को अपनी पद्धति बदलने की आवश्यकता नहीं होती। सागरनाथ जी बताते हैं कि वे स्वयं नाथपंथ से हैं और अपने पहरावे (वेशभूषा) में ही रहते हैं। इस साधना में साधक पर यह दबाव नहीं डाला जाता कि उसे किसी विशेष पद्धति में ढलना है। कुछ जिन ऐसे भी होते हैं जो जल्दी मानते नहीं हैं, परंतु इस साधना में जिन बड़े प्यार से जल्दी मान गए और अब कार्य कर रहे हैं।


मंत्र को सार्वजनिक करने का उद्देश्य

कुछ दिनों बाद जब शिष्य सागरनाथ जी से मिलने आया, तो उसने पूछा कि क्या वे इस मंत्र को प्रकाशित करना चाहते हैं। सागरनाथ जी ने सहमति जताते हुए कहा कि मंत्र को प्रकाशित करने से मंत्र की शक्ति कम नहीं होती। उनका उद्देश्य है कि जो विद्याएं लुप्त होती जा रही हैं, वे जन-समाज के सामने रखी जाएं। जो साधक इसे करना चाहते हैं, वे करेंगे; जो नहीं करना चाहते, वे किसी और बात में उलझे रहेंगे।

सागरनाथ जी ने बताया कि उनके पास जितनी भी साधनाएं हैं, उनकी दीक्षा लेने के लिए लोगों की भरमार लगी रहती है। जिन्हें वास्तविक आवश्यकता और रुचि होती है, वे समय पर दीक्षा ले लेते हैं।


नकल करने वालों को लेकर स्पष्ट संदेश

सागरनाथ जी ने इस चर्चा में स्पष्ट रूप से कहा कि वे इस मंत्र को पूरी तरह सार्वजनिक नहीं करेंगे, क्योंकि इस क्षेत्र में ऐसे लोग भी हैं जो दूसरों की सामग्री उठाकर अपने नाम से प्रस्तुत करते हैं। उन्होंने बताया कि जब ऐसे चैनलों से उनके अनुभव के बारे में पूछा जाता है, तो वे कोई ठोस उत्तर नहीं दे पाते और बात टाल देते हैं।

उनका कहना है कि जो लोग किसी और की मेहनत और ज्ञान की नकल करते हैं, उन्हें स्वयं अभ्यासी और अनुभवी साधक बनना चाहिए, न कि केवल दूसरों की बातों की नकल करनी चाहिए। सागरनाथ जी ने यह भी बताया कि उनके गुरु रुद्रनाथ जी को इस विषय की जानकारी है, जो उनके साथ मार्गदर्शन में सक्रिय रहते हैं।


साधना की विधि और दीक्षा

इस साधना को करने के इच्छुक साधकों के लिए सागरनाथ जी ने बताया कि इसमें अंदाज़न 11 से 15 माला करनी होती है। इस साधना से घर में ही 15 जिन एक साथ प्रत्यक्ष हो सकते हैं, जिससे साधक को घबराने की आवश्यकता नहीं है।

जो साधक इस साधना की दीक्षा या ट्रांसफर लेना चाहते हैं, उन्हें यह दी जाती है — चाहे साधक सागरनाथ जी के पास स्वयं आना चाहे, या घर बैठे-बैठे ही ट्रांसफर प्राप्त करना चाहे, दोनों ही विकल्प उपलब्ध हैं।

पर्सनल गुरु मंत्र की भूमिका

सागरनाथ जी अपने शिष्यों को एक पर्सनल गुरु मंत्र भी प्रदान करते हैं। यह गुरु मंत्र यह निर्धारित करता है कि शिष्य को भविष्य में कौन सी साधना करनी चाहिए। कई बार सागरनाथ जी स्वयं यह मार्गदर्शन देते हैं, तो कई बार यह गुरु मंत्र स्वयं शिष्य के लिए उपयुक्त साधना का “टारगेट” तय कर देता है और यह बताता है कि उसे जीवन में कौन सी साधना करनी चाहिए और क्यों करनी चाहिए।

उनके उच्च स्तर के शिष्य 11 माला तक सीमित नहीं रहते — वे 31, 41, 51 और अधिकतम 81 या 100 माला तक भी साधना करते हैं।


निष्कर्ष

यह साधना एक अत्यंत विरल और विशिष्ट विद्या है, जो एक ही मंत्र के माध्यम से 15 सात्विक जिनों को सिद्ध करने की क्षमता रखती है। इस चर्चा से हमें कई महत्वपूर्ण बातें ज्ञात होती हैं:

– यह साधना नीलवर्णीय और सफेद वर्ण के जिनों से जुड़ी है, जो सात्विक स्वरूप के माने गए हैं।
– साधना में निर्धारित सामग्री, हकीक की माला, उल्टी माला जप, और 11 से 21 दिन की अवधि का पालन करना आवश्यक है।
– साधक को साधना के दौरान आने वाले दृश्यों में उलझे बिना केंद्रित रहना चाहिए।
– यह साधना किसी भी धर्म का व्यक्ति अपनी मूल पद्धति में रहते हुए कर सकता है।
– गुरु के मार्गदर्शन और उचित शक्तिपात के साथ यह साधना अपेक्षाकृत शीघ्र सिद्ध हो सकती है।
– सागरनाथ जी अपने शिष्यों को व्यक्तिगत गुरु मंत्र और साधनाओं की दीक्षा एवं ट्रांसफर दोनों प्रदान करते हैं।

अंततः इस चर्चा का उद्देश्य लुप्त होती जा रही इन गूढ़ विद्याओं को जन-समाज के सामने रखना है, ताकि सच्चे और जिज्ञासु साधक इनसे लाभान्वित हो सकें।

राम राम। जय माता की।

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