कन्होरिया वीर साधना: दिव्य दृष्टि और त्रिकालदर्शी शक्ति प्राप्ति का मार्ग
परिचय
Mythologynath.com पर गुरु सागरनाथ जी की इस चर्चा में आज विषय है — दिव्य दृष्टि। सागरनाथ जी स्पष्ट करते हैं कि यह सारी विद्या कन्होरिया वीर पर निर्भर करती है, जो वीर समूह में चलने वाली एक शक्ति है। यह कन्होरिया वीर हवा में अदृश्य रूप से विद्यमान रहता है।
सागरनाथ जी ने अपने छल्ले और कड़े को दिखाते हुए बताया कि यह उनका सिद्ध किया हुआ कन्होरिया वीर का छल्ला है, जिसे कड़े के ऊपर भी सिद्ध कर रखा गया है। उन्होंने बताया कि जो 52 वीर का कड़ा उन्होंने पहले दिखाया था, उसमें 21 वीर भी चलते हैं और 52 वीर भी चलते हैं, और इन्हीं के साथ कन्होरिया वीर भी सक्रिय रहता है।
कन्होरिया वीर सिद्धि क्यों आवश्यक है
सागरनाथ जी इस विषय को एक तुलनात्मक दृष्टिकोण से समझाते हैं। समाज में अलग-अलग लोग अलग-अलग प्रकार की “सवारी” आने का दावा करते हैं:
– कोई कहता है कि उन्हें माता की सवारी आती है और वे “कन” निकालते हैं।
– कोई कहता है कि उन्हें भैरव की सवारी आती है, मदिरा पीकर वे कन निकालते हैं।
– कोई कहता है कि उन्हें वीर की सवारी आती है — जैसे नरसिंह वीर की सवारी।
– कोई कहता है कि उन्हें हनुमान जी की सवारी आती है।
– कोई कहता है कि उन्हें माता काली कलकत्ते वाली की सवारी आती है और वे कन निकालते हैं।
– कोई कहता है कि उन्हें पीरों की सवारी आती है, यानी मजार से संबंधित सवारी आती है।
परंतु सागरनाथ जी यह प्रश्न उठाते हैं — क्या बिना किसी सवारी के, बैठे-बैठे ही कन निकालने और सारा हाल-चाल बताने का कोई समाधान है? इसका उत्तर वे स्वयं देते हैं — हां, वीर तंत्र में यह सब कुछ उपलब्ध है। यह किताबी ज्ञान नहीं है — जो इसे साधेगा, वह इसे प्राप्त करेगा; जो नहीं साधेगा, वह स्वयं ही खाली हाथ रह जाएगा।
सागरनाथ जी के अनुसार, हर साधक को कन्होरिया वीर को 99% (अर्थात पूर्ण रूप से) सिद्ध करना चाहिए। वे अपने अधिकतर शिष्यों को सबसे पहले यही साधना करवाते हैं, ताकि वे बैठे-बैठे ही खबर मंगवा सकें, बात कर सकें, कन निकाल सकें और जानकारी प्राप्त कर सकें।
कन्होरिया वीर क्या-क्या जानकारी देता है
सागरनाथ जी बताते हैं कि यह वीर साधक को अत्यंत गहन और व्यक्तिगत जानकारियां प्रदान कर सकता है, जैसे:
– सामने वाले व्यक्ति के पास क्या मसाला (शक्ति) है — यानी उसने क्या असल में सिद्ध कर रखा है।
– उसने भूत को सिद्ध कर रखा है या नहीं, और उसके पास अच्छी चीजें हैं या गंदी चीजें।
– उसके घर में पितरों का दोष लगा हुआ है या देवताओं का दोष लगा हुआ है।
– कुल देवता या कुल देवी का दोष है या नहीं।
– उसके चाचा, ताऊ, दोस्त, या सहेली ने उस पर कोई क्रिया (वंदन/टोटका) की हुई है या नहीं — ऐसी बातें जो कोई स्वयं अपने मुंह से नहीं बताएगा, वे कन्होरिया वीर स्वयं बता देता है।
– साधक को कौन सी बीमारी है और उसके निवारण के लिए किस मंत्र का प्रयोग करना है, यह भी यह वीर बता देता है।
इसी कारण जिसे त्रिकालदर्शी साधना अर्थात भूत-भविष्य जानने वाली साधना कहा जाता है, वह कन्होरिया वीर के माध्यम से नाथपंथ में आराम से की जा सकती है। यह वीर आने वाले समय के विषय में भी संकेत देता है — जैसे कि साधक किस पक्ष से चल रहा है, उसे कहां पर समस्या आ सकती है, और उससे कैसे बचाव किया जाए।
ज्योतिष में सहायता
सागरनाथ जी बताते हैं कि यह साधना ज्योतिष के क्षेत्र में भी साधक को एक एडवांस स्तर तक ले जाती है। भले ही साधक ने कभी ज्योतिष की किताबें न पढ़ी हों, किसी आचार्य से यह विद्या न सीखी हो, फिर भी वह ग्रहों की दशा देखकर आराम से भविष्य में होने वाली घटनाओं के बारे में सही समय पर बता सकता है।
सागरनाथ जी के अनुसार यह वीर तंत्र के मामले में बहुत बलवान है, और खबर देने के मामले में भी बहुत आगे है।
सिद्धि का स्वरूप
कन्होरिया वीर सामान्यतः हवा के रूप में रहता है। जब यह सिद्ध होता है, तो यह पर (आकृति/छाया) रूप में सामने दिखाई देता है, और अपना कार्य पूर्ण करने के बाद पुनः अदृश्य हो जाता है।
सागरनाथ जी इस बात पर ज़ोर देते हैं कि हर साधक को यह वीर हर हालत में सिद्ध करना चाहिए। इसके लिए किसी बड़े ताम-झाम की आवश्यकता नहीं है — इसे घर में आराम से सिद्ध किया जा सकता है। यदि पहले चिल्ले (साधना काल) में यह पूर्ण नहीं होता, तो दूसरे चिल्ले में यह अवश्य पूर्ण हो जाता है — इसे कोई रोक नहीं सकता।
बाधाओं की जानकारी भी देता है
यदि किसी साधक के कार्य में बार-बार कोई रुकावट डाल रहा है — चाहे वह स्वयं उसका गुरु हो, या किसी के साथ उसकी प्रतिस्पर्धा (लागतबाजी) चल रही हो — यह वीर उसके बारे में भी जानकारी दे देता है।
इसके अतिरिक्त, जिन लोगों को शेयर मार्केट या लॉटरी में सफलता प्राप्त करने की आदत है, उनके लिए भी यह वीर सहायक सिद्ध हो सकता है। परंतु यह सहायता तभी मिलती है जब साधक इसे पहले पूर्ण रूप से सिद्ध कर ले — बिना सिद्धि के यह कुछ भी प्रदान नहीं करता।
विद्या को उजागर करने का उद्देश्य
सागरनाथ जी स्पष्ट करते हैं कि उनके पास यह सारी विद्या पहले से मौजूद है, परंतु वे इसे इसलिए उजागर कर रहे हैं ताकि यह घर-घर तक पहुंच सके और लोग इससे कार्य लेकर अपने दुखों का निवारण कर सकें, भटकना बंद कर सकें।
उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें स्वयं यह सब पहले से मालूम रहता है कि किसी के जीवन में क्या समस्या चल रही है और आगे क्या होने वाला है। परंतु जीवन को स्वाभाविक रूप में आगे बढ़ाने के लिए साधक के पास स्वयं की कुछ रीतियां और साधनाएं होनी चाहिए। परमात्मा हमेशा साधक को समाधान देता है — यह दोष परमात्मा पर नहीं डाला जाना चाहिए कि उसने कुछ नहीं दिया, क्योंकि साधना करना और प्रयास करना स्वयं साधक की ज़िम्मेदारी है।
मंत्र
सागरनाथ जी ने यह मंत्र आंशिक रूप से साझा किया है, पूर्ण रूप से नहीं — क्योंकि उनके अनुसार इस क्षेत्र में ऐसे लोग बैठे हैं जो कॉपी-पेस्ट करके दूसरों की मेहनत को अपने नाम से प्रस्तुत करते हैं।
मंत्र का आरंभिक भाग इस प्रकार बताया गया है:
> अवता झाड़ पावता झाड़… कन्होरिया अमुक बात बता
यह मंत्र की पहली पंक्ति है। इसके आगे का भाग — जिसे “फटकारा और मंत्र” कहा गया — अंतिम पंक्ति है। बीच की पंक्ति सागरनाथ जी ने स्वयं के पास सुरक्षित रखी है और उसे उजागर नहीं किया।
यह मंत्र मूल रूप से बंगाल का बताया गया है, जिसमें मराठी भाषा का प्रभाव भी बीच-बीच में आता है। यह एक मिश्रित संयोजन (मिक्स कॉम्बिनेशन) है, और इसके ऊपर कन्होरिया वीर (वीर शक्ति) कार्य करता है। वीरों को नियंत्रित करना और चलाना आना आवश्यक है, और यह विद्या केवल एक योग्य गुरु ही सिखा सकता है।
योग्य गुरु की पहचान
सागरनाथ जी सलाह देते हैं कि साधक को ऐसे गुरु के पास जाना चाहिए जो प्रमाणिक मंत्र और उसकी सही विधि खुलेआम प्रदान करता हो। जो गुरु उपलब्ध है, उसके पास जाकर प्रैक्टिकल रूप से साधना करने पर साधक को अवश्य मार्ग दिखाई देगा।
उनका कहना है कि जीवन एक पहाड़ जितना बड़ा है, लेकिन एक-एक चिल्ला निकालते हुए साधक आगे बढ़ सकता है। सागरनाथ जी ने स्वयं बताया कि उन्होंने कई साधनाएं की हैं, जिनमें कुछ में असफलता भी मिली है और कुछ में सफलता, परंतु उन्होंने इस पर अधिक ध्यान न देकर केवल सफलता प्राप्त करने पर ध्यान केंद्रित रखा, और वह सफलता वे अपने साथ लेकर आए हैं।
सकारात्मक दृष्टिकोण का महत्व
सागरनाथ जी इस बात पर ज़ोर देते हैं कि साधक को हमेशा अच्छा सोचना चाहिए, बुरा सोचने की आवश्यकता नहीं है — क्योंकि जितना अधिक बुरा सोचा जाएगा, उतना ही बुरा परिणाम स्वयं पर आएगा।
अनुशासनहीन शिष्यों के प्रति स्पष्ट रुख
सागरनाथ जी ने कुछ ऐसे शिष्यों का भी उल्लेख किया जिन्होंने उनसे विद्या प्राप्त करके भी अनुशासन का पालन नहीं किया, जिस कारण उनकी अर्जित विद्या समाप्त हो गई। जब ऐसे लोग दोबारा साधना करवाने का आग्रह करते हैं, तो सागरनाथ जी स्पष्ट मना करते हैं। उनका कहना है कि उन्हें ऐसे शिष्य नहीं चाहिए जो केवल दिखावा (लफ्फाजी) करते हों या स्वयं को अनावश्यक रूप से “चैंपियन” समझते हों।
उनका स्पष्ट संदेश है — जितना कार्य बताया जाए, उतना पूर्ण निष्ठा से किया जाए, तभी सफलता मिलेगी — और वह भी 100% नहीं, बल्कि 1000% तक।
दीक्षा और मार्गदर्शन
सागरनाथ जी ने बताया कि अब वे मुफ्त में मंत्र देना बंद कर रहे हैं, क्योंकि कुछ लोग उनकी सामग्री को उठाकर अपने नाम से प्रस्तुत करने लगते हैं। जो साधक इस विद्या को सिद्ध करना चाहते हैं और दीक्षा लेना चाहते हैं, वे जुड़ सकते हैं। यह विद्या वे पहले भी अपने शिष्यों को दे चुके हैं, परंतु अब वे इसे चरण-दर-चरण (स्टेप बाय स्टेप) वीडियो के माध्यम से साझा कर रहे हैं, ताकि साधकों को स्पष्ट रूप से समझ आ सके कि क्या करना है और क्या नहीं।
यह विद्या मूल रूप से मराठी विद्या बताई गई है, जिसे वीरों की विद्या के रूप में बहुत ही शक्तिशाली माना गया है।
इस साधना के साथ-साथ जो साधक जुड़ना चाहते हैं, उन्हें गुरु मंत्र, रक्षा मंत्र, आसन मंत्र और कीलन मंत्र भी उपलब्ध कराया जा रहा है — यह सब उचित दक्षिणा में जन-कल्याण की भावना से प्रदान किया जा रहा है, ताकि यह विद्या घर-घर तक पहुंच सके।
निष्कर्ष
कन्होरिया वीर साधना नाथपंथ की एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रभावशाली विद्या है, जो साधक को दिव्य दृष्टि और त्रिकालदर्शी क्षमता प्रदान करने में सक्षम मानी जाती है। इस चर्चा से हमें निम्न महत्वपूर्ण बातें ज्ञात होती हैं:
– कन्होरिया वीर बिना किसी बाहरी “सवारी” के, बैठे-बैठे ही साधक को गहन और व्यक्तिगत जानकारियां प्रदान कर सकता है।
– यह वीर पितृ दोष, कुल देवता दोष, टोटके, और भविष्य संबंधी जानकारियां देने में सक्षम है।
– यह साधना ज्योतिष ज्ञान के बिना भी साधक को भविष्यवाणी करने की क्षमता प्रदान कर सकती है।
– साधना को घर में सरल विधि से सिद्ध किया जा सकता है, और अधिकतम दो चिल्लों में यह पूर्ण हो जाती है।
– इस विद्या को सीखने के लिए एक योग्य और प्रमाणिक गुरु का होना अनिवार्य है।
– अनुशासन, सकारात्मक सोच और पूर्ण निष्ठा इस साधना की सफलता के लिए आवश्यक शर्तें हैं।
अंततः यह संदेश स्पष्ट है — नाथपंथ की जो लुप्त होती विद्याएं हैं, उन्हें जन-कल्याण की भावना से सामने रखा जा रहा है, ताकि सच्चे और निष्ठावान साधक इनसे लाभान्वित होकर अपने जीवन को संवार सकें।
राम राम। जय माता की।
