माता तारा साधना: नवरात्रि की गुप्त शक्ति और उनका शाबर मंत्र

गुरु सागरनाथ और शिष्य उमेश काकड़े के संवाद पर आधारित

परिचय

mythologynath.com में आपका एक बार फिर से स्वागत है। नवरात्रों की सीरीज में आज गुरु सागरनाथ एक ऐसी गुप्त विद्या लेकर आए हैं, जो मां शक्ति के उस स्वरूप से जुड़ी है जिसे शायद आपने पहले कभी सुना, देखा या पढ़ा न हो। आज का विषय है *तारा माता* — उनकी सिद्धि साधना और उनका पौराणिक नाथ पंथी शाबर मंत्र।

गुरु सागरनाथ के साथ इस बार भी उनके शिष्य *उमेश काकड़े* जुड़े हैं, जो एक विद्यार्थी की तरह सवाल पूछते हुए इस पूरी जानकारी को दर्शकों तक पहुंचाने में मदद कर रहे हैं। इस संवाद में गुरुजी बताएंगे कि तारा माता को कैसे सिद्ध किया जाता है, कैसे उनसे सुख-समृद्धि प्राप्त की जाती है, शत्रु का नाश किया जाता है, बल-बुद्धि-विद्या पाई जाती है और रोगों का नाश किया जाता है। इतना ही नहीं, इसे सिद्ध करने वाले साधक को एक उच्च स्तर के ऋषि स्वरूप का दर्जा भी प्राप्त होता है, जिससे स्वयं शिव और उनका पूरा परिवार प्रसन्न होता है।

तारा माता कौन हैं?

तारा माता को दस महाविद्याओं में से *दूसरी महाविद्या* कहा गया है। यह ऐसी क्षमता रखती हैं कि साधक की सोच से परे जाकर कार्य करती हैं। जो व्यक्ति इन्हें सिद्ध कर लेता है या इनकी कृपा प्राप्त कर लेता है, उसके लिए कुछ भी करना असंभव नहीं रह जाता। जो सोचेगा, वही पाएगा — यही तारा माता की विशेषता है।

तारा माता के दो स्वरूप

*पहला स्वरूप — शक्तिपीठ का सौम्य रूप*: तारा माता का एक स्वरूप शक्तिपीठ में विराजमान पिंडी के रूप में है, जो पूर्ण रूप से सौम्य है। इसमें जीभ बाहर निकली हुई है और मुख पर सिंदूर लगा हुआ है, ठीक वैसे ही जैसे हनुमान जी को लगाया जाता है।

*दूसरा स्वरूप — जब भगवान शंकर ने पहली बार देखा*: यह वह रूप है जो सृष्टि के सामने स्वयं भगवान शंकर लेकर आए थे, जब उन्होंने पहली बार माता को देखा था। इस रूप में माता के सिर पर चंद्रमा है, वे जटाधारी हैं, शिव की तरह तीसरा नेत्र और त्रिपुंड धारण करती हैं। उनका रंग चंद्रमा की शेड जैसा है। वे व्याघ्र चर्म (बाघ की खाल) धारण किए हुए हैं, जो घुटनों तक है। उनके हाथों में ग्रीन कलर के सांप हैं, जो सृष्टि के सारे विष और असुर प्रवृत्ति की गंदी नॉलेज को पी जाते हैं।

उनके गले में नरमुंड माला है, लेकिन यह इंसानों की खोपड़ियों की नहीं, बल्कि वैसी खोपड़ियों की है जैसी भगवान महाकाल धारण करते हैं — पूरी तरह जली हुई, (skull) खोपड़ियां।

माता के नीचे लेटा मुर्दा — गहरा प्रतीकात्मक अर्थ

तारा माता जिस मुर्दे के ऊपर खड़ी दिखाई जाती हैं, वह किसी वास्तविक इंसान का मुर्दा नहीं है, बल्कि प्रतीकात्मक रूप है। जैसे ब्रह्मा जी ने सृष्टि बनाई और हम इंसानों में बल, बुद्धि, विद्या, धन, दौलत, शोहरत सब गुण आ गए — लेकिन जब हम देह त्याग करते हैं, तब हमारा सब कुछ खत्म हो जाता है, केवल नाम रह जाता है।

जहां हमारी सोच-समझ (भगवान ब्रह्मा की दी हुई शक्तियां) खत्म होती हैं, वहीं से महाशक्ति यानी महातारा की शक्ति शुरू होती है। उनका आरंभ वहीं से होता है जहां हमारी समझ का अंत होता है, और उनका अंत अनलिमिटेड है।

तारा माता की शक्तियां

तारा माता को *ज्ञान मुद्रा की देवी* कहा गया है — बल, बुद्धि और विद्या की देवी, जैसे सरस्वती माता ज्ञान और वाक् सिद्धि देती हैं। इसके साथ ही वे शत्रु का जड़ से नाश भी करती हैं।

कहा जाता है कि जिन ऋषियों ने बड़े-बड़े ग्रंथों की रचना की, मंत्रों की रचना की, उनका ज्ञान एक विशेष आकाशगंगा से जुड़ा था — हमारी आकाशगंगा से ऊपर एक ऐसी गैलेक्सी है जहां मंत्रों की संरचना स्वतः होती रहती है। ध्यान में बैठने पर जो अक्षर दिखाई देते हैं, उच्च स्तर के योगी वहीं से मंत्रों को कैप्चर करते हैं — जैसे गुरुजी को स्वयं योग निद्रा में मंत्र प्राप्त हुए।

तारा नाम का अर्थ

तारा माता का नाम इसलिए पड़ा क्योंकि वे “तारने वाली” हैं। जो भी रोता हुआ बालक या व्यक्ति उनके पास जाता है, वे उसे तार देती हैं। उनका रूप देखने में डरावना लगता है, लेकिन ध्यान से देखा जाए तो डरने की कोई जरूरत नहीं — वह मुद्रा उनकी प्रसन्न मुद्रा है।

काली माता और तारा माता में अंतर

काली माता उग्र होती हैं क्योंकि वे भड़की हुई अवस्था में आती हैं, और जब वे भगवान शिव के ऊपर पैर रखती हैं, तभी वे शांत होती हैं। लेकिन तारा माता पहले से ही शांत स्वरूप में हैं, भले ही देखने में उग्र लगती हों — जैसे कोई स्त्री हद से ज्यादा खुश हो लेकिन देखने में उग्र लगे। जैसा व्यवहार आप उनसे करेंगे, वैसा ही व्यवहार वे आपके साथ करेंगी।

शाबर मंत्र के प्रभाव

यह मंत्र डाकनी, हाकनी, शाकनी जैसी शक्तियों को स्वतः सिद्ध कर देता है। किसी भूत-प्रेत या चुड़ैल पर यह मंत्र पढ़कर मारा जाए, तो वह या तो भाग जाएगा या भस्म हो जाएगा। इन भूत-प्रेतों से काम भी लिया जा सकता है। यह मंत्र बल देता है, बुद्धि देता है, शत्रु नाश करता है, वाक् सिद्धि देता है और अमोघ रक्षा प्रदान करता है। तंत्र के क्षेत्र में यह साधक को उस स्थान पर बिठा देता है, जहां उसका तंत्र कोई तोड़ नहीं सकता। यह धन की समस्या को भी जड़ से खत्म कर देती हैं, ठीक वैसे ही जैसे माता लक्ष्मी और माता कमला करती हैं।

तारा माता का शाबर मंत्र

गुरु सागरनाथ द्वारा बताया गया मंत्र इस प्रकार है:

० ओम मुर्दे की *****माता तेरी हाजिरी दा तमाशा।

मंत्र के शब्दों का अर्थ

– *मुर्दे की काठ*: वह लकड़ी या शैया (बिस्तर) जिसके ऊपर मुर्दे को लिटाया जाता है।
– *14 भवन उधारा*: 14 भवन वे हैं जिनके मालिक स्वयं भगवान नारायण नरसिंह स्वरूप में हैं। यहां “उधारा” का अर्थ है कि माता ने ये 14 भवन उधार में दे दिए हैं।
– *चले मंत्र फुरे वाचा*: मंत्र चले, वाणी फुरे (सफल हो)।

गुरुजी ने स्पष्ट किया कि यह शाबर मंत्र रिटन (लिखित) रूप में भी मिल जाएगा, और कुछ शब्दों के उच्चारण में हल्का फेरबदल हो सकता है क्योंकि यह पंजाबी भाषा के प्रभाव से बोला जाता है, लेकिन लिखित रूप बिल्कुल सही होगा।

साधना की विधि

समय और अवधि

– कम से कम *21, 31 या 41 माला* करनी है।
– साधना *21 दिनों* के लिए करनी है।
– समय *रात्रि* का रहेगा।
– कृष्ण पक्ष हो या शुक्ल पक्ष — दोनों में साधना की जा सकती है, कोई फर्क नहीं पड़ता।
– साधना शुरू करने का दिन *मंगलवार* होना चाहिए।
– अगर 21 दिन में साधना पूरी न हो पाए, तो *41 दिन* तक ले जाई जा सकती है।
– अगर 41 दिन भी संभव न हो, तो साधना को *दो चरणों* में — 21 दिन एक बार और 21 दिन दोबारा — पूरा किया जा सकता है। इससे साधना संपन्न मानी जाएगी और दोबारा करने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

माला और सामग्री

– *माला*: रुद्राक्ष की माला चलेगी।
– *अनार की बलि*: पांच अनार की बलि दी जाती है — मंत्र पढ़ने के बाद अनार को काटा जाता है।
– *अन्न की बलि*: गेहूं के आटे का एक गोल पेड़ा (रोटी जैसा) बनाकर उसे बीच से काटा जाता है।
– *नींबू की बलि*: 11 नींबू की बलि दी जाती है।
– *पान का पत्ता*: पूरी डंडी सहित साबुत पान का पत्ता रखा जाता है, जिस पर कपूर रखा जाता है और कपूर के ऊपर दो साबुत लौंग रखी जाती हैं। इन्हें अग्नि दी जाती है।

साधना बैठने का क्रम

1. आसन लगाकर आसन का जाप करना।
2. शाबर मंत्र का कवच लगाना।
3. गुरु मंत्र की माला जपना।
4. उसके बाद तारा माता की साधना शुरू करना, जिसमें पहले बलि दी जाती है।

बलि देने का नियम

बलि हर *मंगलवार* को दी जाती है — साधना के जितने दिनों में मंगलवार आएगा, हर बार बलि दी जाएगी। साधना का पहला दिन और आखिरी दिन भी बलि दी जाती है।

विसर्जन विधि

बलि सामग्री को इस क्रम में विसर्जित किया जाता है:
1. शिव मंदिर में शिवलिंग के ऊपर अर्पण करें।
2. अगर यह संभव न हो, तो दुर्गा मंदिर में रखें।
3. यह भी संभव न हो, तो पीपल के पेड़ के नीचे रखें।
4. यह भी न हो सके, तो बहते जल में प्रवाहित कर दें।

*ध्यान रहे*: बरगद के पेड़ के नीचे यह सामग्री नहीं चढ़ानी चाहिए। इसका कारण यह बताया गया कि बरगद का स्वरूप उन ऋषि-मुनियों का है जो तप करते-करते समाधि में लीन हो गए और शरीर त्याग कर बरगद के पेड़ बन गए, जबकि पीपल के पेड़ में शनिदेव, ब्रह्मा-विष्णु-महेश और सात्विक देवी-देवता निवास करते हैं। यह भी बताया गया कि जो व्यक्ति नियमित रूप से बरगद के पेड़ को सुबह नमस्कार करता है, जल और धूप-दीप अर्पित करता है, उसके जीवन के लगभग 99% कष्ट कट जाते हैं।

माता के आगमन के संकेत

जब तारा माता की सवारी आती है, तो सबसे पहले घुंघरुओं की आवाज सुनाई देती है, जैसे डमरू बज रहा हो। दूसरी महाविद्या को साक्षात दर्शन देने की क्षमता उसी साधक में होती है जिसने काली माता को सिद्ध किया हो।

लेकिन साधारण साधक के लिए भी माता स्वप्न में या योग निद्रा में आकर बात करती हैं, वचन देती हैं और स्वप्न सिद्धि प्रदान करती हैं — यानी जो वे स्वप्न में कहती हैं, वह सच हो जाता है। जब माता से संपर्क होता है, तब शरीर भारी हो जाता है और हृदय की धड़कन तेज हो जाती है — ठीक वैसे ही जैसे काली माता की सवारी आने पर होता है।

महत्वपूर्ण सावधानियां

गुरुजी ने विशेष चेतावनी दी कि इस साधना को उग्र रूप (तामसिक साधना, मांस-मदिरा) में नहीं करना चाहिए। तामसिक रूप में यह साधना तभी की जाती है जब साधक का परिवार में कोई न हो, वह पूरी तरह अकेला हो। ऐसी स्थिति में माता उग्र रूप में आकर खून तक चूस सकती हैं।

*यह साधना राजसिक है, तामसिक नहीं।* यह उन लोगों के लिए है जिनका राजपाट, सुख-समृद्धि खत्म हो चुकी है और वे उसे वापस पाना चाहते हैं। महाकाली, दुर्गा, धूमावती और लक्ष्मी की तरह यह भी एक ऐसी महाशक्ति है जो जीरो को हीरो और हीरो को जीरो कर सकती है — इसलिए गुरु के मार्गदर्शन में ही यह साधना करनी चाहिए।

नियमित पूजा में उपयोग होने वाली सामग्री

– *फूल*: गुलाब के फूल — माता काली की तरह इन्हें भी गुलाब सबसे प्रिय है।
– *इत्तर*: गुलाब का इत्तर।
– *अगरबत्ती*: गुलाब की अगरबत्ती।
– *भोग*: मीठा भोग — बर्फी, काले गुलाब जामुन, लड्डू, पान आदि श्रद्धानुसार दिए जा सकते हैं। लेकिन मंगलवार की बलि से ही माता तृप्त हो जाती हैं, इसलिए रोज कोई विशेष पंचोपचार पूजा करने की आवश्यकता नहीं।
– *वस्त्र और आसन*: लाल या गुलाबी रंग के वस्त्र और आसन उपयुक्त माने गए हैं, लेकिन यह अनिवार्य नहीं — साफ-सुथरे नियमित पूजा वस्त्र पहनकर भी साधना की जा सकती है।

गुरुजी ने यह भी स्पष्ट किया कि महाविद्याओं को रोज-रोज भोग की आवश्यकता नहीं होती, जैसे छोटी शक्तियों (भूत, डाकनी, शाकनी) को होती है। महाशक्तियां स्वयं तय करती हैं कि उन्हें कब भोग चाहिए — कभी सप्ताह में, कभी महीनों में, तो कभी वर्ष में एक बार — और उसके बाद वे पूरे समय तक साधक का कार्य करती रहती हैं।

साधना कौन कर सकता है?

गुरुजी ने स्पष्ट किया कि यह साधना अत्यंत सुलभ है —
– शादीशुदा पुरुष और स्त्री दोनों कर सकते हैं।
– बूढ़े लोग कर सकते हैं।
– कुंवारी कन्याएं कर सकती हैं।
– घर में भी की जा सकती है, बाहर भी।
– नदी किनारे या श्मशान में भी की जा सकती है, यह साधक की अपनी रुचि पर निर्भर है।
– सन्यासी, योगी और अघोरी — सभी इसे कर सकते हैं। यह एक मल्टीपर्पस विद्या है।

निष्कर्ष

इस संवाद में गुरु सागरनाथ ने तारा माता की गुप्त और लगभग लुप्त हो चुकी शाबर विद्या को विस्तार से समझाया। तारा माता, जो दस महाविद्याओं में दूसरी महाविद्या मानी जाती हैं, अपने सौम्य और उग्र दोनों स्वरूपों में साधक को बल, बुद्धि, विद्या, धन और शत्रु नाश जैसी शक्तियां प्रदान करती हैं।

उनका शाबर मंत्र — “ओम मुर्दे की काठ ऊपर बैठी तारा…” — एक शक्तिशाली मंत्र है, जिसे 21, 31 या 41 दिनों तक रुद्राक्ष माला से जपकर, मंगलवार के दिन विशेष बलि अर्पित करते हुए सिद्ध किया जाता है।

गुरुजी ने बार-बार इस बात पर जोर दिया कि यह साधना राजसिक है, तामसिक नहीं, और इसे गुरु के मार्गदर्शन में ही करना चाहिए, क्योंकि बिना उचित समझ और दीक्षा के इस शक्ति को संभालना कठिन हो सकता है। सही विधि और श्रद्धा के साथ की गई यह साधना साधक को एक उच्च ऋषि स्वरूप का दर्जा दिलाती है, जहां न केवल तारा माता, बल्कि स्वयं शिव और उनका पूरा परिवार प्रसन्न होता है।

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