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 परिचय

भारत
में तंत्रसाधना की परंपरा अत्यंत
प्राचीन और गहन रही
है। इस परंपरा में
माँ काली की उपासना
को सर्वोच्च स्थान दिया गया है।
माँ काली, जिन्हें माँ शेरावाली और
काल रात्रि के नाम से
भी जाना जाता है,
शक्ति की सबसे उग्र
और साथ ही सबसे
करुणामयी स्वरूप मानी जाती हैं।
Mythologynath.com के इस विशेष लेख
में हम सागरनाथ जी
द्वारा साझा की गई
उस दुर्लभ साधना को प्रस्तुत कर
रहे हैं, जिसे उन्होंने
अपने दिल का राज
बताया हैमाँ काली
कलकत्ते वाली की **सवारी
साधना**

यह साधना उन सभी साधकों
के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण
है जो माँ की
सवारी लेना चाहते हैं,
या जिनके ऊपर माँ की
सवारी पहले से आती
है लेकिन खुलकर नहीं आती। दिवाली
और नवरात्रों जैसे शुभ मुहूर्त
में इस साधना को
करने का विशेष महत्व
बताया गया है।

 यह साधना क्यों की जाती है?

सागरनाथ
जी के अनुसार, माँ
काली की सवारी साधना
का मुख्य उद्देश्य साधक के ऊपर
माँ की सवारी को
शांत और सौम्य रूप
में स्थापित करना है। यह
कोई उग्र साधना नहीं
है, बल्कि यह एक **सौम्य
साधना** है जो गृहस्थ
जीवन में भी की
जा सकती है।

जब साधक के ऊपर
माँ की सवारी आती
है, तो वह एक
विशेष अनुभव होता है। साधक
का शरीर अत्यंत भारी
हो जाता हैऐसा
महसूस होता है मानो
किसी ने टन भर
का पत्थर ऊपर रख दिया
हो। हाथपाँव में
दर्द होने लगता है।
शरीर टूटने जैसा महसूस होता
है। साधक आसन से
उठ नहीं सकता। और
जब सवारी चली जाती है,
तो शरीर बिल्कुल हल्का
फूलों जैसाहो जाता है।

इस साधना को करने से
साधक को माँ की
आवाज़ और संकेत मन
के भीतर से मिलते
हैं। माँ स्वयं बताती
हैं कि क्या करना
है और क्या नहीं।

 माँ काली की सवारी साधना के लाभ

सागरनाथ
जी ने इस साधना
के अनेक लाभ बताए
हैं। जो साधक इसे
पूर्ण विधिविधान के
साथ करते हैं, उन्हें
निम्नलिखित फल प्राप्त होते
हैं:

**1. भूतभविष्य का ज्ञान**

जब माँ की सवारी
साधक के ऊपर आती
है, तो वह संगत
में बैठे लोगों का
भूत, वर्तमान और भविष्य बता
सकता है।

**2. रुके
हुए कार्य पूर्ण होना**

जिन
लोगों के काम वर्षों
से अटके हुए हैं,
माँ उन्हें पूरा करवाती हैं।
24 से 48 घंटे के भीतर
कार्य सिद्ध हो जाते हैं।

**3. संतान
प्राप्ति**

जिन
दंपतियों को संतान नहीं
होती, माँ उनकी इस
इच्छा को भी पूरा
करती हैं। माँ शेरावाली
मुँह बोलकर देती हैंचाहे
पुत्र हो या पुत्री।

**4. विदेश
यात्रा में बाधा दूर होना**

जो लोग विदेश जाना
चाहते हैं लेकिन रुकावट
आती है, माँ उस
रुकावट को भी दूर
करती हैं।

**5. भूतप्रेत की समस्या का निवारण**

माँ
काली भूतप्रेत की
समस्या को चुटकी में
खत्म कर देती हैं।
तांत्रिक प्रयोगों का भी इस
साधना से कोई असर
नहीं होता।

**6. मुठ
(
तांत्रिक प्रयोग) का खंडन**

यदि
कोई तांत्रिक साधक पर हवा
में मुठ जलाए, तो
माँ काली उस मुठ
को खंडित करके उल्टे तांत्रिक
के ऊपर ही वापस
भेज देती हैं।

**7. सर्वश्रेष्ठ
तांत्रिक बनना**

इस साधना को करने वाला
साधक सर्वश्रेष्ठ तांत्रिक, भगत और सिद्ध
पुरुष बन जाता है।
सिद्ध पुरुषका अर्थ है
जिसके वचन सदा सत्य
होते हैं।

 माँ काली का सवारी शाबर मंत्र

सागरनाथ
जी ने यह बताया
कि यह मंत्र उन्हें
एक अघोड़ीप्रकार के संत से
प्राप्त हुआ था, जिन्होंने
स्वयं इस साधना को
सिद्ध किया था। यह
मंत्र इंटरनेट या गूगल पर
कहीं उपलब्ध नहीं है। यह
गुरुगद्दी के साथ चलने
वाला **शाबर मंत्र** है:

**जय
काली कलकत्ते वाली,**

**तेरा
वार ना जाए खाली।**

**************** डाली।**

***********जय
माँ काली।**

यह मंत्र माँ की सवारी
बुलाने का सिद्ध मंत्र
है। इसे ध्यान से,
श्रद्धा के साथ पढ़ना
और जपना है।

 साधना की सम्पूर्ण विधि

सागरनाथ
जी ने इस साधना
के लिए जो सामग्री
और विधि बताई है,
वह इस प्रकार है:

आवश्यक
सामग्री

दो
लौंग

दो
इलायची

एक
मीठा पान

एक
पानी वाला नारियल

पंचमेला

माता
की कढ़ाई

शराब
(
भोग हेतु)

कलेजी
(
भोग हेतु)

दो
नींबू

मिठाई

लाल
रंग का आसन

रुद्राक्ष
की माला

मेहंदी
का लेप

माटी
का दीया (खप्पर के लिए)

तेल

साधना
की विधि

**पहला
चरणआसन और तैयारी:**

साधक
को लाल रंग का
आसन बिछाना है। माला रुद्राक्ष
की होनी चाहिए। रोज़ाना
पाँच माला जप करना
अनिवार्य है।

**दूसरा
चरणनारियल की तैयारी:**

जो पानी वाला नारियल
है, उसे बीच में
से काट लेना है
और उसकी गिरी निकाल
लेनी है। इस नारियल
के बीच में तेल
की ज्योत लगाई जाएगी। यह
खप्पर का रूप है
माँ का खप्पर।

**तीसरा
चरणमेहंदी का लेप:**

मेहंदी
का लेप नारियल के
ऊपर करना हैजैसी
मेहंदी हाथों पर लगाई जाती
है।

**चौथा
चरणभोग:**

भोग
**पहले दिन और आखिरी
दिन** देना है। भोग
में शामिल हैं:

कलेजी

शराब

कढ़ाई

नींबू

नारियल

मिठाई

यह भोग गद्दी के
ऊपर रखा जाता है।

**पाँचवाँ
चरणभोग का विसर्जन:**

सुबह
उठकर भोग की सामग्री
नदी में जल प्रवाह
कर देनी है। यदि
नदी उपलब्ध हो, तो
पीपल के पेड़ के
नीचे रख दें। उजाड़
जगह पर भी भोग
रखा जा सकता है।
परन्तु **श्मशान में भोग नहीं
लगाना है** — यह बात विशेष
रूप से बताई गई
है।

**छठा
चरणसाधना की अवधि:**

यह साधना **कम से कम
21/41 दिन** तक करनी है।

 दिवाली की रातकाल रात्रि का महत्व

सागरनाथ
जी ने बताया कि
इस साधना को शुरू करने
का सबसे श्रेष्ठ समय
**दिवाली की रात** है।
दिवाली की रात को
काल रात्रिकहा जाता है,
और काल रात्रि माँ
काली का ही दूसरा
नाम है। यह वर्ष
की सबसे शक्तिशाली रात
होती है।

शास्त्रों
में बताया गया है कि
माँ दुर्गा जो जगत जननी
हैं, उन्होंने अपनी तीसरी आँख
से माँ काली को
उत्पन्न किया था। माँ
काली अजन्मी हैंयानी वे साक्षात
परमेश्वर का स्वरूप हैं,
जिनका कोई जन्म नहीं।
इसलिए दिवाली की रात उनकी
शक्ति सर्वाधिक सक्रिय होती है और
इस साधना का फल अत्यंत
शीघ्र मिलता है।

 महत्वपूर्ण सावधानियाँ

सागरनाथ
जी ने साधना के
साथसाथ कुछ अत्यंत
महत्वपूर्ण बातें भी बताई हैं,
जिन्हें साधक को हमेशा
ध्यान में रखना चाहिए:

**1. माँ
से गलत काम मत करवाना।**

यदि
आप माँ से कोई
अनुचित कार्य करवाने की कोशिश करेंगे,
तो माँ उल्टा टाँग
देंगी। माँ की शक्ति
का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए।

**2. माँ
से आज्ञा लेकर कार्य करें।**

यदि
कोई कठिन या असामान्य
कार्य करना होचाहे
वह जायज हो या
नाजायजपहले माँ से
आज्ञा लें। जो माँ
बोलें, वही करें। यदि
माँ हाँ बोलें, तो
करें; यदि नहीं बोलें,
तो रुकें।

**3. यह
श्मशान काली की साधना नहीं है।**

यह साधना घर में रहकर,
गृहस्थ जीवन में सौम्य
और शांत रूप से
की जाती है। इसका
उद्देश्य है कि माँ
घर में विराजमान होकर
सभी का भला करें।

**4. इस
साधना से किसी के पीछे जाने की जरूरत नहीं।**

सागरनाथ
जी का कहना है
कि यह साधना इतनी
पूर्ण है कि साधक
को किसी और के
पास जाने की आवश्यकता
नहीं रहती। माँ स्वयं सब
कुछ कर देती हैं।

 सवारी आने का अनुभव कैसा होता है?

साधक
जब यह जानना चाहता
है कि माँ की
सवारी उसके ऊपर
रही है या नहीं,
तो उसे निम्न संकेतों
से पता चलता है:

शरीर
अचानक अत्यंत भारी हो जाता
है।

हाथपाँव दुखने लगते
हैं।

ऐसा
लगता है जैसे शरीर
टूट रहा हो।

साधक
आसन से हिल नहीं
सकताजैसे कोई भारी
पत्थर ऊपर रख दिया
गया हो।

मन में माँ की
आवाज़ सुनाई देती है।

और जब सवारी चली
जाती है:

शरीर
एकदम हल्काफूलों जैसाहो जाता है।

साधक
पूर्णतः सामान्य हो जाता है।

यह पूरा अनुभव साधक
को स्वयं पता चलता है
किसी को बताने की
आवश्यकता नहीं होती।

 

निष्कर्ष

माँ
काली कलकत्ते वाली की सवारी
साधना एक अत्यंत दुर्लभ,
सौम्य और शक्तिशाली साधना
है। सागरनाथ जी ने यह
साधना अपने दिल के
राज के रूप में
साझा की है। इस
साधना को करने वाला
साधक केवल माँ
की असीम कृपा का
भागीदार बनता है, बल्कि
वह एक सिद्ध पुरुष,
श्रेष्ठ भगत और सर्वोत्तम
तांत्रिक भी बन जाता
है।

दिवाली
की काल रात्रि से
इस साधना को प्रारंभ करना
विशेष फलदायी बताया गया है। इस
शुभ अवसर का लाभ
उठाकर, विधिविधान के
साथ, श्रद्धा और भक्ति के
भाव से यह साधना
करें और अपने जीवन
को माँ की कृपा
से सुख, समृद्धि और
शक्ति से भर दें।

जो भी साधक यह
साधना करना चाहते हैं,
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**जय
माँ काली। जय माता दी।**

 

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