भगवान शंकर, गणपति और गुरु गोरखनाथ की महासाधना: शावर मंत्र का गुड़ रहस्य
गुरु सागरनाथ के व्यक्तिगत अनुभव से
परिचय
mythologynath.com में आपका एक बार फिर से हार्दिक स्वागत है। मैं गुरु सागर एक ऐसी साधना लेकर आया हूं जो शायद आपने कहीं देखी हो या सुनी हो। यह भगवान शंकर और गुरु गोरखनाथ की एक साथ की जाने वाली साधना है, जिसमें गणपति जी को, शक्ति को, गोरख जति को और भगवान आदिनाथ को एक साथ साधना के माध्यम से संपन्न किया जाता है।
इस साधना की सबसे बड़ी बात यह है कि यह नाथ पंथ में धुनें के ऊपर की जाने वाली साधना है। इसे अधिकतम जहां तक हो सके शिवरात्रि पर संपन्न किया जाता है। शिवरात्रि पर इसकी गति और अधिक बढ़ जाती है, इसमें कोई दो राय नहीं है।
शिवरात्रि का महत्व इस साधना में
भगवान आदिनाथ शिवरात्रि के समय अपने तंत्र को खोलते हैं। उस समय उनका मिलन शक्ति के साथ होता है। ठीक जैसे कुछ समय बाद नवरात्रि आते हैं और शिव-शक्ति का मेल होता है — हमारे पुराणों में ऐसा बताया गया है — वैसे ही शिवरात्रि के दिन शिव और शक्ति एक-दूसरे के साथ मिलते हैं, जैसे उस समय सृष्टि की संरचना हुई थी। उसी तिथि को शिवरात्रि के रूप में मनाया जाता है, जब भगवान शंकर सृष्टि के सामने प्रकट होते हैं।
लेकिन हमारा विषय यह नहीं है। हमारा विषय यह है कि इस शाबर मंत्र में क्या-क्या होता है।
इस साधना का स्वरूप — सौम्य लेकिन उग्र
जो अनुभव मैंने स्वयं इस साधना को करने के दौरान देखे हैं, वे बहुत ही उग्र थे, जबकि साधना स्वयं सौम्य थी। इसके साथ भूत-प्रेत-पलीत चलते हैं, जो बहुत ही उग्र रूप में चलते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि “उग्र” का मतलब यह है कि वे डराते हैं — ऐसा नहीं है कि वे कुछ करते हैं। लेकिन जो इनसे डर गया, उसका काम होना निश्चित है।
इसलिए यह चीजें बच्चों के लिए नहीं हैं। सीधी बात यह है कि यह शक्तियां उसी के लिए हैं, जिसका दिमाग पूरी तरह से हैवी रूप में तैयार हो और जो इन चीजों को सहन कर सकता हो।
साधना कोई खेल नहीं होती। गुरु के मार्गदर्शन में करेंगे तो यह सहज हो जाती है। लेकिन गुरु के बिना करेंगे तो यह उल्टा आपकी जिंदगी में मजाक बनकर रह जाएगी।
साधना का फल — भगवान शंकर, गणपति और गुरु गोरखनाथ की सहायता
यह साधना सबसे बड़ी मनोकामना पूरी करने वाली साधना है, जिससे भगवान शंकर सहाई हो जाते हैं, गणपति सहाई हो जाते हैं और गुरु गोरखनाथ सहाई हो जाते हैं।
जहां गुरु गोरखनाथ सहाय हो जाते हैं, वहां कोई छोटी-मोटी शक्ति नहीं चलती। उनके घर में बहुत बड़ी शक्ति चलती है, जो आज भी अमर है और शरीर सहित है। वे जति हैं — जैसे हनुमान जी हमारे जति शरीर सहित हैं, वैसे ही गुरु गोरखनाथ आज भी इस धरती पर शरीर सहित विराजमान हैं।
मंत्र कैसे जपें: धुनें और हवन की विधि
अब मूल मंत्र और उसकी विधि पर आते हैं। यह मंत्र धुनें के ऊपर जपा जाता है। अगर धुना उपलब्ध न हो, तो इसके स्थान पर *बेरी की लकड़ी* का प्रयोग किया जाता है — वह लकड़ी जो वहां मिलती है जहां पितृ पूजे जाते हैं।
बेरी के पौधे से सूखी हुई लकड़ी लेनी है, गीली नहीं। जो सूखी बेरी की लकड़ी हो, वही लेनी है। उसका हवन घर पर करना होता है।
हवन विधि
– हवन में *घी* डालना है।
– थोड़ी सी *हवन सामग्री* भी डालनी है।
– इसके बाद इच्छा हो तो *खीर का भोग* लगाया जा सकता है — यह अनिवार्य नहीं, इच्छा पर निर्भर है।
– शक्ति के लिए *पान का भोग* भी लगाया जा सकता है।
– अगर यह भी संभव न हो, तो सिंपल तरीके से बेरी की लकड़ियों के साथ *आम की लकड़ियों* का भी कॉम्बिनेशन किया जा सकता है।
– उसमें खीर का भोग दिया जा सकता है।
– पहले *पंचमेवे का भोग* दें, फिर *पताशे का भोग* दें।
इस भोग में शिव, शक्ति, गणपति और शावर मंत्र में चलने वाली उनकी शक्ति — सब आ जाते हैं। भूत-पलीत-प्रेत आपको कुछ नहीं कहेंगे।
आह्वान मंत्र
साधना के दौरान इस मंत्र का जाप किया जाता है, जिससे भूत, प्रेत, पलीत और राक्षसों का आह्वान होता है, शिव-गोरख के आदेश से:
मंत्र
० ओम **
**** गुरु का गोरख सिद्ध को आदेश आदेश आदेश।
इस मंत्र का जाप शिवरात्रि के अवसर पर लगातार किया जाता है। शिवरात्रि की रात्रि में लगातार जाप करने से मंत्र आपकी आभा (ओरा) में समा जाता है। आपका वेग बढ़ जाता है, ऊर्जा बढ़ जाती है।
साधना की अवधि: 11, 21 या 41 दिन
अगर आपने इस साधना को आगे बढ़ाना है, तो इसे पूरे नवरात्रों में भी किया जा सकता है। भोग पहले दिन और आखिरी दिन रखना अनिवार्य है।
साधना की अवधि इस प्रकार तय की जा सकती है:
– *11 दिन* की साधना
– *21 दिन* की साधना
– *41 दिन* की साधना (अधिकतम)
इसके बाद ही यह साधना संपन्न मानी जाती है।
गुरुजी का व्यक्तिगत अनुभव
जब मैंने यह साधना की थी, तो मैंने *41 दिन* की साधना की थी। पहला दिन मैंने शिवरात्रि का लिया था। शिवरात्रि के दिन से शुरुआत करने के बाद मैं प्रतिदिन धुनें के ऊपर हवन करता था, बेरी की लकड़ी से। इस दौरान मुझे इतना पसीना आ जाता था कि उस मौसम में भी पसीने की तरेलियां निकल आती थीं — यह देखकर पता चलता है कि यह मंत्र कितना हार्डकोर और प्रभावशाली है।
योग निद्रा में मिला अनुभव
उस समय गणपति जी की कृपा से मुझे योग निद्रा में एक विशेष दर्शन हुआ। मैंने देखा कि विशाल मैमद (लुप्त हो चुकी हाथियों की प्रजाति) मेरे पीछे चल रहे थे — यह वह प्रजाति है जिसे गूगल पर देखा जा सकता है, बड़े-बड़े दांत, बड़ी सूंड और भारी खाल वाले। परमात्मा ने उन्हें केवल बर्फीली जगहों में रहने के लिए बनाया था। यह प्रजाति अब लुप्त हो चुकी है। आज के अफ्रीकन हाथी, जो सबसे बड़े गिने जाते हैं, उनसे भी वे कई गुना बड़े थे — उनका भार टनों में होता था। वे काले रंग के दिखते थे और झुंडों में मेरे पीछे-पीछे चल रहे थे।
इस विजन में वे मुझे इशारा करते हुए एक गुफा की तरफ धकेल रहे थे। जब मैं गुफा के अंदर गया, तो मुझे एक विशाल मूर्ति दिखी — गणपति जी की, छह मुख वाली, बिल्कुल ब्लैक रंग की, विराट रूप में। मैंने उन्हें नमस्कार किया।
आगे बढ़ने पर एक रास्ता साइड से जाता था। वहां मैंने भगवान भोलेनाथ की सेना — भूत-प्रेत — को देखा। उनके विचित्र-विचित्र रूप थे — किसी की एक आंख थी, किसी के चमगादड़ जैसे कान थे, कोई मोटा था कोई पतला। वहीं से गणपति जी और मां पार्वती आगे से आ गए। जब भूत ज्यादा ही छेड़खानी और ठिठोली करने लगते हैं — जो कि उनका स्वभाव ही है — तो शक्ति और गणपति जी ने इशारे से उन्हें एक तरफ हटने को कहा और उन्होंने रास्ता छोड़ दिया।
मां पार्वती और गणपति जी का स्वरूप
जब मां पार्वती पास आईं, उनका रूप बिल्कुल सफेद चंद्रमा जैसा था, फूलों की सफेद साड़ी में बिल्कुल कांच जैसा स्वरूप। गणपति जी आठ या बारह वर्ष के रूप में थे, बड़े रूप में नहीं। मां ने मेरी बांह पकड़ी और कहा कि “चलो आगे, आपको कुछ नहीं कहेंगे।”
आगे साक्षात भोलेनाथ बैठे हुए दिखे, अपनी वही ध्यान मुद्रा में आसन लगाए हुए, बाघम्बर खाल पहने, काला त्रिशूल लिए। पूरा कैलाश पर्वत बर्फ की तरह दिखता था, कमंडल था और वहां नंदी भी विराजमान था — जिसका मुख वेल्कम (बैल) जैसा और शरीर मनुष्य जैसा था, हाथ जुड़े हुए।
भोलेनाथ से मिला वचन
उस दर्शन में भोलेनाथ ने मुझे कुछ वचन दिए। उन्होंने शावर मंत्रों के बारे में बताया कि जब भी मैं शावर मंत्र पढ़ता और करता जाऊंगा, मैं उन चीजों के प्रभाव को कैप्चर करता जाऊंगा और आने वाले समय में एक पदवी पर बैठ जाऊंगा — किसी न किसी स्तर की पदवी। शावर मंत्र की क्षमता और ऊर्जा को मैं बहुत जल्दी पकड़ लूंगा और ऊर्जावान बन जाऊंगा। इतना कि जब मैं कोई शावर मंत्र करूंगा, तो उसके प्रभाव से ही तुरंत पहचान जाऊंगा कि यह सही शावर मंत्र है या गलत।
इसके अलावा उन्होंने कुछ और वचन भी दिए, जो मेरी गुरु गद्दी से संबंधित व्यक्तिगत विषय थे, जिन्हें यहां साझा करना उचित नहीं।
सावधानी: बिना गुरु के यह साधना न करें
इस साधना से जुड़ी सबसे जरूरी बात यह है — इस साधना को गुरु की देखरेख में करें, दीक्षा लेकर ही करें। बिना दीक्षा के कोई भी मंत्र उठाकर मत जपिए।
अगर आपके पास गुरु है, तो यह वेल एंड गुड है, वेरीफाई है — आप कर सकते हैं, इसमें कोई मनाही नहीं। लेकिन बिना गुरु के इसमें छेड़खानी मत कीजिए। साधना तो आप सिद्ध कर लेंगे, लेकिन उसका प्रभाव आने वाले समय में आप संभाल नहीं पाएंगे।
ऊर्जा संभालने में गुरु की भूमिका
इस साधना का एक चक्र होता है — ऊर्जा एक स्थान से शुरू होकर ऊपर की ओर जाती है। जब यह ऊर्जा ऊपर पहुंचती है, तब समस्या यह खड़ी होती है कि जब आप इस ऊर्जा को संभाल नहीं पाते, तो मेंटली डिस्टर्ब हो जाते हैं। वहां गुरु ही उस ऊर्जा को स्थिर करता है और तभी उसे बाहर निकलने देता है।
सहस्रार चक्र में ओम विराजमान है — सहस्र पंखुड़ियों वाले कमल पर, और वहीं गुरु गोरखनाथ भी विराजमान हैं, जैसा कि नाथ मंत्र में बताया गया है।
इस साधना में मिलने वाला अनुभव और सिद्धि
इस साधना में आपको पलीत भी महसूस होंगे, लेकिन वे कुछ नहीं कहेंगे। वे हंसी-ठिठोली करेंगे, लेकिन आप अपने मंत्र के कार्य में लगे रहिए। इससे आपको विशेष सिद्धि प्राप्त होती है।
सबसे बड़ी बात यह है कि गुरु गोरखनाथ साथ चलेंगे, जब आप जाप करेंगे, और भोलेनाथ की अपार कृपा प्राप्त होगी। भोलेनाथ का स्वरूप सौम्य होगा। जो सांसारिक लोग हैं, जो शादीशुदा जीवन में गृहस्थी से जुड़े हैं, उनके लिए भी भोलेनाथ बहुत सौम्य हैं — वे मुक्तिदाता हैं, दयादाता हैं। ऐसा नहीं है कि वे उग्र स्वभाव में आएंगे। गणपति और शक्ति भी बिल्कुल सौम्य स्वरूप में हैं — इतने सुंदर, जितना शायद आपने पहले कभी न देखा हो, न सुना हो।
निष्कर्ष
इस साधना का सार यह है कि यह भगवान शंकर, गणपति, शक्ति और गुरु गोरखनाथ को एक साथ जोड़ने वाली एक विशेष नाथ पंथ की साधना है, जिसे शिवरात्रि के अवसर पर धुनें या बेरी की लकड़ी के हवन से संपन्न किया जाता है। इसमें 11, 21 या अधिकतम 41 दिनों तक विधिवत हवन, भोग और मंत्र जाप की परंपरा निभाई जाती है।
यह साधना केवल मनोकामना पूर्ति की साधना ही नहीं, बल्कि आत्मिक ऊर्जा और शावर मंत्रों की क्षमता को पहचानने और आत्मसात करने की साधना भी है। लेकिन इसकी सबसे बड़ी शर्त यही है — यह साधना बिना गुरु और बिना दीक्षा के कदापि नहीं की जानी चाहिए, क्योंकि इससे जागृत होने वाली ऊर्जा को संभालना हर किसी के बस की बात नहीं है।
गुरु सागरनाथ अपने निजी अनुभवों के आधार पर यह स्पष्ट करते हैं कि सही मार्गदर्शन में की गई यह साधना भगवान शंकर, गणपति और गुरु गोरखनाथ की विशेष कृपा दिलाती है, जबकि गलत या अधूरे ज्ञान के साथ की गई साधना जीवन में उलझन और परेशानी का कारण बन सकती है।
चैनल को लाइक, शेयर और सब्सक्राइब करें, ताकि ऐसे अनुभव आधारित वीडियो आगे भी आपके लिए लाए जा सकें।
जय माता की। जय माता की।
