ख्वाजा पीर साधना: वरुण देवता की शक्तिशाली विद्या और सागरनाथ जी का अनुभव
प्रस्तावना
Mythologynath.com पर आज फिर से उपस्थित हैं सागरनाथ जी, जो हमें ख्वाजा पीर साधना के बारे में विस्तार से बताएंगे। इस लेख में हम जानेंगे कि ख्वाजा पीर कौन हैं, इस साधना के क्या फायदे हैं, इसे कौन कर सकता है, और सागरनाथ जी का इस मंत्र को प्राप्त करने और सिद्ध करने का वास्तविक अनुभव क्या रहा।
ख्वाजा पीर कौन हैं
सागरनाथ जी ने बताया कि ख्वाजा पीर वास्तव में हमारे वरुण देवता हैं, जो जल देवता हैं और पांच तत्वों में से एक तत्व के अधिपति माने जाते हैं। समय के साथ इनका नाम बदलकर “पीर” जुड़ गया, लेकिन ये मूल रूप से वीर स्वरूप में गिने जाते हैं — “ख्वाजा वीर”। वर्तमान समय में ये बुजुर्ग रूप में माने जाते हैं, और यह मंत्र बहुत प्राचीन है।
मंत्र की प्राप्ति की कथा
सागरनाथ जी ने बताया कि एक बार भगवान शंकर जी से उनकी बातचीत हो रही थी। बातचीत के अंत में भगवान शंकर ने कहा कि अब विश्राम करो, आज एक विशेष चीज सपने में बताकर जाएंगे। इसके बाद स्वप्न में भगवान शंकर (आदिनाथ) ने ख्वाजा पीर का मंत्र एक-एक अक्षर करके दिखाया, और सागरनाथ जी उसे दोहराते गए।
सुबह उठकर सागरनाथ जी ने उस मंत्र को कॉपी-पेन पर लिखा और अपने पास पहले से लिखे हुए मंत्र के साथ मिलाकर देखा कि कहीं कोई अक्षर का हेरफेर तो नहीं हुआ। दोनों मंत्र पूरी तरह एक समान थे। इसके बाद भगवान शंकर ने कहा कि अब इसे सिद्ध करने का समय आ गया है।
सागरनाथ जी ने बताया कि यह देखकर वे समझ गए कि यह मंत्र पूरी तरह जागृत है, क्योंकि बिना गुरु और बिना जागृत मंत्र के साधना करने से सिद्धि नहीं मिलती। मंत्र वही करने चाहिए जो गुरु के साथ चलते हों — तभी उनसे पूर्ण सिद्धि और सवारी तक प्राप्त होती है।
अनुष्ठान के दौरान का अनुभव
जब सागरनाथ जी ने इस मंत्र का अनुष्ठान शुरू किया, तो उन्हें एक दृश्य दिखाई दिया — उत्तरांचल की तरह बर्फ से ढके पर्वत, और वहां एक ऐसा व्यक्ति मिला जिसकी शक्ल हनुमान चालीसा से जुड़े रामभद्राचार्य जैसी थी। वह अपना आसन लगाकर बैठा था, चिमटा गाड़ा हुआ था, और उसकी आंखों से उसे दिखाई नहीं देता था।
जब सागरनाथ जी उग्र स्वभाव में उससे पूछते हैं कि वह क्या कर रहा है, तो वह बताता है कि उसने सागरनाथ जी के साथ छेड़खानी की थी, क्योंकि किसी ने उन पर तंत्र करवाया था। यह पता चलता है कि यह काम पड़ोस के ही किसी व्यक्ति ने करवाया था, जो जलन के कारण ऐसा करता है।
चिमटे से आक्रमण और माता काली का प्रवेश
सागरनाथ जी ने उसका चिमटा निकालकर, काली माता का मंत्र पढ़ते हुए, उसके सिर पर वार करना शुरू किया और उसे लहूलुहान कर दिया। इसी दौरान उनके भीतर माता काली प्रवेश कर जाती हैं, जो चीखें मारती हैं और उस दुष्ट को चेतावनी देती हैं कि आज उसका सर्वनाश करके ही छोड़ेंगी।
इस क्रिया में चिमटा माता के “चंद्रहास” खड्ग में परिवर्तित हो जाता है। वह व्यक्ति भागकर कहीं गायब हो जाता है, और माता उसे ढूंढते हुए एक मंदिर की ओर ले जाती हैं।
हांडी और ख्वाजा पीर की कलाम
इससे पहले के दृश्य में सागरनाथ जी ने देखा था कि उस व्यक्ति ने एक हांडी को लाल कपड़े से ढक कर रखा हुआ था। उसी समय माता ने सागरनाथ जी को आदेश दिया कि भोलेनाथ जी ने जो ख्वाजा पीर की कलाम (मंत्र) दी है, उसे पढ़ें।
जैसे ही सागरनाथ जी वह मंत्र पढ़ना शुरू करते हैं, उनके सामने वह घड़ा (हांडी) जल में दिखाई देता है और जल का स्तर बहुत ऊंचा उठने लगता है — लगभग 100 से 150 मीटर तक ऊंची लहर उठ जाती है। इसी लहर में एक हाथ का पंजा दिखाई देता है, जो उस घड़े को पकड़कर तोड़ देता है। जैसे ही घड़ा टूटता है, सागरनाथ जी को यह संदेश मिलता है कि वह क्रिया अब पूरी तरह समाप्त (जीरो) हो चुकी है।
सागरनाथ जी ने इस संदर्भ में यह भी बताया कि हांडी की क्रिया जल के माध्यम से भी की जाती है और हवा के माध्यम से भी। उस व्यक्ति ने जो हांडी छोड़ी थी, वह श्मशान वाली नहीं बल्कि जल वाली हांडी थी।
मंदिर में दर्शन और कार्य की पूर्णता
घड़ा टूटने के बाद माता (आदि शक्ति) सागरनाथ जी को एक मंदिर में ले जाती हैं, जहां भोलेनाथ साक्षात विराजमान होते हैं, उनके साथ हनुमान जी और भैरव भी उपस्थित होते हैं। माता उस समय भी किलकारियां मारते हुए मंदिर में प्रवेश करती हैं।
सागरनाथ जी वहां जोर से घंटी (टल्ला) बजाते हैं और आदिनाथ व महाकाल का जयकारा लगाते हैं। इस पर मंदिर में स्थित हनुमान जी की मूर्ति अपने वास्तविक रूप में प्रकट हो जाती है, और भैरव जी कहते हैं कि हे नाथ, कार्य पूरा हो चुका है, अब शांत हो जाओ।
सागरनाथ जी शुरू में कहते हैं कि जब तक वे उस दुष्ट का लहू न पी लें, उसका सिर न काट दें, तब तक शांत नहीं होंगे। लेकिन जब भैरव और हनुमान जी दोबारा आश्वस्त करते हैं कि कार्य पूर्ण हो चुका है, तब सागरनाथ जी अपना गुरु-मंत्र जपकर शांत होते हैं और उनके चरणों में प्रणाम करके आशीर्वाद लेते हैं।
इसके बाद उन्हें बताया जाता है कि जो मंत्र-अनुष्ठान आदिनाथ ने बताया है, वह इसी प्रकार निरंतर चलता रहेगा। इस पूरी प्रक्रिया के पूरा होने पर उनके ऊपर लगा तंत्र भी कट जाता है।
ख्वाजा पीर का आशीर्वाद
अनुष्ठान पूर्ण होने पर स्वयं ख्वाजा वीर जी सागरनाथ जी को दर्शन देते हैं और आशीर्वाद प्रदान करते हैं। वे बताते हैं कि इस मंत्र की विधि इसी प्रकार निभानी है, और सभी कार्य पूर्ण होंगे, क्योंकि वे स्वयं भोलेनाथ द्वारा बताई गई परंपरा और सनातन धर्म से ही जुड़े हुए हैं।
ख्वाजा पीर मंत्र (शाबर मंत्र/कलाम)
सागरनाथ जी द्वारा बताया गया यह मंत्र इस प्रकार है:
“ख्वाजा ख्वाजा साहब पीरा दा पीर, बच्चे ने याद आवे पर्वत चीर, ********** ख्वाजा शाह पीर।”
सागरनाथ जी ने बताया कि इस मंत्र में “चार कुण्ठा” का उल्लेख है, जिसका अर्थ है व्यक्ति की चार दिशाएं। यह मंत्र उन चारों दिशाओं में लगे बंधनों (जंजीरों) को ढूंढ-ढूंढ कर तोड़ने की शक्ति रखता है।
साधना की विधि
ख्वाजा पीर को सिद्ध करने के लिए सागरनाथ जी ने निम्नलिखित विधि बताई:
– साधना के लिए तस्बी (माला) का उपयोग करना है।
– साधक को चारों दिशाओं में मुंह करके आसन पर बैठना है।
– चार प्याले जल के रखने हैं, ऐसे जल के जो पक्षियों को पिलाने के लिए उपयोग में न लाए गए हों।
– मंत्र का कम से कम 11 माला जाप प्रतिदिन करना है।
– यह साधना 41 दिनों की है।
– साधना का प्रारंभ “जेठे रविवार” से करना है (रविवार इनका दिन है, न कि वीरवार)। कोई भी सामान्य रविवार नहीं, बल्कि जेठ माह के रविवार से ही आरंभ करना है।
– जहां जल बहता हुआ मिले, वहां सवा किलो गुड़ और सवा किलो दलिया मंत्र पढ़ते हुए जल में प्रवाहित करना है, और विनती करनी है कि साधना पूर्ण हो और वे साधक के साथ, अपने पूरे कुल-शक्ति सहित, चलें।
– चारों दिशाओं में रखे जल को प्रतिदिन एकत्रित करके उसी से स्नान भी करना है। इससे साधक पर लगी बाधाएं टूटती और कटती जाती हैं।
– चिराग एक मुखी सरसों के तेल का, या चार मुखा लगाया जा सकता है।
यह साधना गुरु दीक्षा लेकर ही करनी चाहिए, क्योंकि यह अत्यंत तीव्र गति से फल देने वाली साधना है। साधक अपने घर पर ही इसे कर सकता है, इसके लिए नदी किनारे जाकर चिल्ला निकालने की आवश्यकता नहीं है।
साधना के फल और सिद्धि के संकेत
सागरनाथ जी ने बताया कि जब साधक की साधना पूर्ण होती है, तो ख्वाजा पीर स्वप्न में दर्शन देकर वचन देते हैं। यदि साधक का ओरा (ऊर्जा-स्तर) अधिक प्रबल हो, तो वे प्रत्यक्ष रूप से सामने खड़े होकर भी वचन दे सकते हैं। समय आने पर साधक के ऊपर इनकी सवारी भी आती है, और वे संसार की हर बात बता सकते हैं तथा हर कार्य पूर्ण कर सकते हैं।
जो लोग पीरों की गद्दी लगाते हैं, उनके लिए यह साधना विशेष रूप से लाभकारी है, क्योंकि मुस्लिम परंपरा की साधनाओं में ख्वाजा को बहुत उच्च स्थान प्राप्त है। सागरनाथ जी ने इन्हें “नूरी इल्म का बादशाह” बताया।
सतयुग से जुड़ी कथा
सागरनाथ जी ने बताया कि ख्वाजा पीर सतयुग के समय के हैं, जब भगवान नारायण ने वराह अवतार धारण किया था। इस कथा के अनुसार, हरणाक्ष ने घोषणा की थी कि उसके समान कोई बलवान नहीं है। वह वरुण देव के पास युद्ध करने गया, तो वरुण देव ने कहा कि वे अब बूढ़े हो चुके हैं और उनका बल इतना नहीं कि हरणाक्ष को हरा सकें। उन्होंने सुझाव दिया कि यदि हरणाक्ष अपने वास्तविक बल की परख करना चाहता है, तो उसे भगवान नारायण की शरण में जाकर उनसे युद्ध करना चाहिए।
साधना के लाभ
सागरनाथ जी के अनुसार, इस साधना से साधक की धन-दौलत में अभूतपूर्व वृद्धि होती है — यह “छप्पड़ फाड़ के” धन देने वाली साधना है। साथ ही, यह बैठे-बैठे ही साधक के सभी कार्य पूर्ण करने की क्षमता रखती है। उन्होंने यह भी बताया कि जब साधक पर ख्वाजा पीर की कृपा हो जाती है, तो काली भैरव भी स्वतः ही उनके साथ सिद्ध हो जाते हैं।
निष्कर्ष
इस चर्चा में सागरनाथ जी ने ख्वाजा पीर साधना — जो कि वरुण देवता से जुड़ी एक अत्यंत प्राचीन शाबर विद्या है — का विस्तृत वर्णन किया। यह मंत्र उन्हें स्वयं भगवान शंकर द्वारा स्वप्न में प्रदान किया गया, जिसकी सत्यता की उन्होंने पहले से लिखे मंत्र से मिलान करके पुष्टि की। अनुष्ठान के दौरान उन्हें कई अलौकिक अनुभव हुए — पड़ोसी द्वारा करवाए गए तंत्र का पर्दाफाश, माता काली का प्रवेश, हांडी की क्रिया का टूटना, और अंततः भोलेनाथ, हनुमान जी व भैरव के साक्षात दर्शन।
इस साधना की विधि में जेठे रविवार से शुरुआत, 41 दिनों तक चारों दिशाओं में जल रखना, प्रतिदिन 11 माला जाप, और गुड़-दलिया का जल में प्रवाह शामिल है। सागरनाथ जी के अनुसार, गुरु दीक्षा के साथ श्रद्धापूर्वक की गई यह साधना साधक को धन, समृद्धि और सभी बाधाओं से मुक्ति दिलाने में समर्थ है, और सिद्धि पूर्ण होने पर साधक को स्वयं ख्वाजा पीर का साक्षात आशीर्वाद प्राप्त होता है।
