स्वर्ण परी साधना: तंत्र जगत की भ्रांतियों को दूर करने वाली एक प्रमाणिक विद्या
परिचय
आज की इस चर्चा में गुरु सागरनाथ जी विषय लेकर आए हैं — स्वर्ण परी। साथ ही आज के तंत्र क्षेत्र में परी साधना को लेकर जो भ्रांतियां फैली हुई हैं, उन्हें भी दूर करने का प्रयास किया गया है।
यह परंपरा और यह मंत्र सागरनाथ जी को हरियाणा के एक मौलवी से प्राप्त हुआ, जिसे इल्म भी कहा जा सकता है। उस मौलवी ने सात परियां सिद्ध कर रखी थीं और साथ ही ख्वाजा पीर की भी सिद्धि प्राप्त कर रखी थी। इन्हीं शक्तियों से वे अच्छे-बुरे कार्य करवाते थे, जिससे उनका अपना जीवन काफी हद तक संवर चुका था। उस समय वे लगभग 60 से 65 वर्ष की आयु के बीच थे।
वे अधिकतर लोगों का वशीकरण करना, उनके बिगड़े कार्यों को सुधारना जैसे कार्य करते थे। यह एडवांस स्तर की विद्या है, जो समय के साथ लुप्त हो चुकी है। सागरनाथ जी बताते हैं कि आज इस क्षेत्र में जो छोटे-मोटे तांत्रिक बैठे हैं, वे परी सिद्ध होने का दावा तो कर देते हैं, परंतु उनका मंत्र उतना प्रमाणिक नहीं होता। जिनका मंत्र प्रमाणिक भी होता है, उन्हें उसकी सही विधि नहीं पता होती — मंत्र को नियंत्रण में कैसे लेना है, कैसे चलाना है, यह ज्ञान उनके पास नहीं होता। ये लोग स्वयं को बड़े तांत्रिक या पंडित मानते हैं, परंतु उनका ज्ञान वास्तव में निम्न स्तर का ही होता है।
सात परियों का परिचय
यह विद्या सागरनाथ जी को कैसे प्राप्त हुई, इसकी कहानी 2014 से जुड़ी है। जब वह मौलवी उनके पास आए थे, तब धीरे-धीरे ज्ञान की चर्चा होने लगी। उन्होंने बताया कि उन्होंने सात परियां सिद्ध कर रखी हैं, जिनके नाम हैं — इंद्र परी, हूर परी, नूर परी, शाह परी, लाल परी, सफेद परी, और मंत्र की एक पंक्ति में आने वाली “बड़े अदब से खड़ी” वाली परी।
इन परियों से मौलवी जी हर तरह के कार्य लेते थे। ये चारों दिशाओं में कार्य करती हैं — चाहे दिशा बंधी हो, गद्दी बंधी हो, भूत-प्रेत का मामला हो, संगल डालना हो या उन्हें बुलाना हो — किसी भी प्रकार का कार्य इनसे लिया जा सकता है।
परंतु ये परियां थोड़ी चंचल स्वभाव की होती हैं — यह चंचलता सामान्य नहीं, बल्कि वास्तविक होती है। ये साधकों को नए-नए इल्म सिखाती हैं — नए तंत्र को कैसे चलाना है, किस देवी-देवता को क्या अर्पित करना है, उन्हें कैसे प्रसन्न करना है, भूत चुडेल या देवी माता या रूठे हुए पितरों से पीछा कैसे छुड़ाना है — यह सब ज्ञान ये परियां साधक को देती हैं।
मौलवी जी की सिद्धि और अनुभव
उस मौलवी ने इन सातों परियों को सिद्ध कर रखा था और उनसे हर तरह के कार्य लेते थे — चाहे अच्छे हों या बुरे। इस कारण समाज में उनका नाम भी काफी अच्छा हो चुका था। वे हरियाणा के पेवा क्षेत्र (पंजाबी भाषा में पेवा) के रहने वाले थे।
इसके अतिरिक्त उन्होंने काल भैरव को भी सिद्ध कर रखा था। जब काल भैरव उनके पास सवारी में आते थे, तो बहुत मदिरा पीते थे, और अधिकतर वे उन्हें (दड़े) और सट्टे के नंबर देते-लेते थे।
साधना से प्राप्त होने वाले लाभ
मौलवी जी के अनुसार इस साधना को करने से साधक कई प्रकार से लाभान्वित होता है:
– साधक एक अच्छा इंसान बन जाता है और उच्च स्तर पर पहुंच जाता है।
– तंत्र के क्षेत्र में साधक का नाम अच्छा हो जाता है और उसकी पकड़ मजबूत हो जाती है।
– बारीक से बारीक चीज़ समझ में आने लगती है — कोई इल्म या मंत्र सही है या गलत, यह परी बता देती है।
– साधक वशीकरण कर सकता है।
*एक महत्वपूर्ण सीमा* यह भी बताई गई कि यह मंत्र मारण कर्म नहीं करेगा। यह केवल वशीकरण करेगा, उच्चाटन करेगा और द्वेष देगा — परंतु मारण कर्म इससे संभव नहीं है।
साधना विधि
सिद्धि की अवधि
मौलवी जी के अनुसार यह साधना लगभग 21 दिनों के भीतर सिद्ध की जाती है। इसमें कोई बहुत लंबा-चौड़ा चाम-धाम (विस्तृत तैयारी) नहीं होता।
आवश्यक सामग्री
– गुलाब के फूल इसमें लगते हैं।
– कच्चा दूध प्रयोग में लाया जाता है।
– मिठाई दूध से बनी होनी चाहिए।
– इत्र आवश्यक है — गुलाब का या चमेली का इत्र चलेगा।
– जो दीपक जलाया जाए वह चमेली के तेल का होना चाहिए।
सुपारी और गंधक की विधि
साधना में एक विशेष विधि बताई गई है:
1. गंधक की सात ढेरियां बनानी हैं — जैसे एक बॉर्डर बनाया जाता है।
2. दिशा के लिए पश्चिम या पूर्व दिशा ली जा सकती है।
3. इन सात ढेरियों के ऊपर सात सुपारियां रखनी हैं।
4. प्रत्येक ढेरी के ऊपर दो लौंग और दो इलायची भी रखनी हैं।
माला और जप संख्या
मंत्र की 100 माला 21 दिन के भीतर फेरनी होती है, तभी यह परी वश में होती है। मौलवी जी ने स्पष्ट कहा कि जो व्यक्ति 100 माला नहीं कर सकता, वह कुछ भी सिद्ध नहीं कर सकता। यदि 100 माला संभव न हो तो 51 माला की जा सकती है, परंतु तब साधना की अवधि 41 दिन की करनी होगी।
यह भी बताया गया कि इस साधना को जीवन में एक बार सिद्ध करना पड़ता है, बार-बार नहीं। एक बार सिद्ध हो जाने पर यह आराम से साथ रहती है।
किस रूप में की जा सकती है साधना
यह साधना साधक अपनी इच्छानुसार भिन्न-भिन्न रूपों में कर सकता है — बहन के रूप में, पत्नी के रूप में, या प्रेमिका के रूप में। इस साधना से:
– धन की समस्या जड़ से समाप्त हो जाती है।
– वाणी/भाषा संबंधी कुशलता (इलंबी) सिखाई जाती है।
– साधक का बोलबाला और नाम स्थापित होता है।
– तंत्र के क्षेत्र में साधक काफी आगे बढ़ जाता है।
मंत्र
सागरनाथ जी ने स्पष्ट किया कि यह एक प्रमाणिक मंत्र है, परंतु इसे पूरी तरह प्रकट नहीं किया जाएगा — केवल आंशिक रूप से बताया जाएगा, क्योंकि तंत्र क्षेत्र में ऐसे लोग भी हैं जो दूसरों के पिता-गुरुओं के मंत्रों को उठाकर अपना बताते हैं, जबकि उनका इस पर कोई वास्तविक अनुभव नहीं होता।
मंत्र के प्रारंभिक चार अक्षर इस प्रकार हैं:
> अहिना अरना सरीना सफरीना
और मंत्र के अंतिम भाग में यह पंक्ति आती है:
> कामिनी पद भावी वशम कुर कुर नमः
यह मंत्र मिश्रित रूप का है — अर्थात यह कोई मिलावटी सामग्री नहीं है, बल्कि एक सम्मिश्रित (मिक्स) किंतु पूर्णतः प्रामाणिक मंत्र है।
मंत्र की पद्धति
इस मंत्र को “अघोर पद्धति” कहा जा सकता है। यह वह पद्धति है जिसके माध्यम से मुसलमानों ने सनातन धर्म की चीज़ों को अघोर पद्धति द्वारा सिद्ध किया। कभी-कभी ऐसा होता है कि मुस्लिम मंत्र या इल्म अधूरे होते हैं, परंतु जब दूसरे समाज के लोग देवी-देवताओं की विधि बताते हैं, तो उसमें कुछ शब्द जोड़ दिए जाते हैं। परंतु यह मंत्र अत्यंत प्रमाणिक बताया गया है — यह पीढ़ी दर पीढ़ी चला आ रहा है और लगभग 400 वर्ष पुराना है, जो अपने आप में एक बड़ी बात है।
साधना के लिए आवश्यक शर्तें
जब सागरनाथ जी ने इस विषय में और गहराई से पूछा कि इसे कैसे सिद्ध किया जाए, तो मौलवी जी ने कुछ महत्वपूर्ण शर्तें बताईं:
1. *निडरता*: साधना करने वाला व्यक्ति पूर्णतः दिलेर और निडर होना चाहिए।
2. *गुरु की देखरेख*: साधक को गुरु की देखरेख में रहना चाहिए।
3. *गुरु मंदिर अनुष्ठान*: साधक ने पहले गुरु मंदिर में अनुष्ठान किया हुआ होना चाहिए, ताकि साधना में आने वाले दुष्प्रभावों से बचा जा सके।
यह ध्यान देने योग्य बात है कि दुष्प्रभाव परी के कारण नहीं आते, बल्कि साधक के स्वयं के या उसके आसपास के क्षेत्र — गली, मोहल्ला, नगर, खेड़ा — से जुड़े दुष्प्रभाव भी हो सकते हैं। इन्हीं दुष्प्रभावों को रोकने के लिए गुरु मंत्र किया जाता है, ताकि साधक को चारों दिशाओं में सफलता मिल सके।
अच्छे और जानकार साधकों को यह मालूम होता है कि चारों दिशाओं को कैसे खोला और बांधा जाता है, तभी साधना पूर्ण मानी जाती है। जो साधक बिना इस ज्ञान के मंत्र लेकर बैठ जाते हैं, उनकी तुलना उस गधे से की गई है जो कभी घोड़ों की रेस में नहीं दौड़ा, परंतु स्वयं को घोड़ा समझता है — जब वह असली रेस में उतरता है, तभी उसे अपनी वास्तविकता पता चलती है।
भोग और साधना का दिन
इस साधना में खीर का भोग भी लगाया जाता है — यह पहले और आखिरी दिन दिया जा सकता है, या फिर प्रत्येक शुक्रवार को भी दिया जा सकता है। साधना को शुक्ल पक्ष के शुक्रवार से पकड़ कर करना चाहिए।
यह साधना किसी भी धर्म का व्यक्ति कर सकता है — चाहे मुस्लिम पद्धति की हो या हिंदू धर्म की पद्धति की — बस यह गुरु की देखरेख में की जानी चाहिए। यह साधक की समस्त मनोकामनाएं पूरी करती है और समस्त कार्य संपन्न करती है।
मौलवी जी का व्यक्तिगत अनुभव — पत्नी रूप में सिद्धि
एक दिलचस्प जानकारी यह भी सामने आई कि मौलवी जी ने इन सातों परियों को पत्नी रूप में सिद्ध कर रखा था। यह इसलिए नहीं था कि उनकी असल पत्नी उन्हें संभाली नहीं जा रही थी — उनकी अपनी शादी हुई थी और उनका अपना परिवार भी था। इस साधना का यह अर्थ नहीं निकाला जाना चाहिए कि सात परियों को जोड़कर आठ पत्नियों की गिनती जैसा कुछ बनता है।
ज़रूरी नहीं कि इसमें वही सब कुछ हो जो सामान्य पति-पत्नी संबंध में होता है। इसमें कुछ मन का लेन-देन और कुछ वचनों का आदान-प्रदान भी होता है। इसलिए इस साधना को लेकर डरने की कोई बात नहीं है — यह आराम से की जा सकने वाली साधना है।
साधना के परिणाम
जो साधक इस साधना की दीक्षा लेता है, उसे गुरु मंत्र की साधना में भी दीक्षा दी जाती है, तभी यह साधना पूर्ण रूप से संपन्न होती है। इससे साधक को निम्न लाभ मिलते हैं:
– धन के मार्ग खुल जाते हैं।
– शत्रु का विनाश होता है।
– वशीकरण और उच्चाटन किया जा सकता है (मारण संभव नहीं — इसकी जगह यह स्तंभन करती है)।
– आकर्षण प्राप्त होता है।
– साधक को अन्य साधनाओं में भी सफलता मिलती है।
परी साधना क्यों आवश्यक है
सागरनाथ जी बताते हैं कि परी साधना करनी चाहिए, ठीक जैसे अप्सरा साधना की जाती है। परी साधना करने से साधक का मन शांत हो जाता है और दिमाग बिल्कुल चंचल नहीं रहता — यह पूर्णतः शांत स्वरूप में आ जाता है, जिससे साधक हर अन्य साधना के क्षेत्र में भी आगे बढ़ सकता है।
दीक्षा और सिद्धि ट्रांसफर की प्रक्रिया
सागरनाथ जी ने स्पष्ट किया कि आज की इस चर्चा में प्रमाणिक मंत्र पूर्ण रूप से नहीं दिया गया है, परंतु साधना की पूरी विधि बता दी गई है। प्रमाणिक मंत्र उसी को दिया जाएगा जो इसकी दीक्षा लेगा। जो साधक इसका ट्रांसफर लेना चाहते हैं, उन्हें भी यह ट्रांसफर दिया जाएगा — यह कोई बहुत बड़ी बात नहीं है।
इसके लिए साधक को कुछ दिन बैठना होता है, जिसके बाद सिद्धि पूर्ण हो जाती है। जब गुरु शक्ति भाव भीतर स्थापित करता है, उस ऊर्जा को नियंत्रित करने के बाद साधक को कुछ दिन — पूरी ज़िंदगी नहीं, बल्कि कुछ ही दिन — बैठकर उस साधना को करना होता है।
वचन पहले ही करवाए जाते हैं — जब शक्ति ट्रांसफर की जाती है, तो शक्ति भेजे जाने से पहले ही साधक से वचन लिए जाते हैं, चाहे यह प्रक्रिया ऑनलाइन हो या ऑफलाइन। यह इसलिए किया जाता है ताकि उस वास्तविक शक्ति और तेज को नियंत्रित रखा जा सके।
वचनों के बाद साधक को कुछ दिनों तक बैठकर उस ऊर्जा को संतुलित करना होता है। धीरे-धीरे यह ऊर्जा साधक के आज्ञा चक्र पर आकर स्थिर हो जाती है, और उसके बाद यह साधक से संवाद करना और कार्य करना शुरू कर देती है।
निष्कर्ष
स्वर्ण परी साधना एक अत्यंत प्रमाणिक परंतु आज के समय में लगभग लुप्त हो चुकी विद्या है। यह साधना सिखाती है कि:
– तंत्र क्षेत्र में बिना सही मंत्र और सही विधि के कुछ भी सिद्ध नहीं किया जा सकता — केवल मंत्र प्रमाणिक होना पर्याप्त नहीं, उसे नियंत्रित करने की विधि भी आनी चाहिए।
– यह साधना 21 दिनों में, निश्चित सामग्री और नियमों के साथ, गुरु की देखरेख में की जा सकती है।
– यह मारण कर्म नहीं करती, बल्कि वशीकरण, उच्चाटन, द्वेष और स्तंभन जैसे कार्य करती है।
– साधक की निडरता, गुरु अनुष्ठान, और वचनों का पालन इस साधना की सफलता के लिए अनिवार्य शर्तें हैं।
– यह साधना धन, नाम, आकर्षण और अन्य साधनाओं में सफलता का मार्ग खोलती है।
अंत में यही संदेश है कि यह विद्या जन-कल्याण के लिए साझा की जा रही है, ताकि सच्चे साधक सही मार्गदर्शन में इसे प्राप्त कर सकें और अपने जीवन को संवार सकें।
राम राम। जय माता की।
