यक्षिणी लोक की यात्रा: यक्षिणियों का रहस्यमय संसार
परिचय
mythologynath.com पर आज हम आपको एक अद्भुत यात्रा पर ले चलेंगे — *यक्षिणी लोक* की यात्रा। इस चर्चा में विभिन्न प्रकार की यक्षिणियों के बारे में विस्तार से जानकारी दी जाएगी। इस विषय पर एक बार फिर सागरनाथ जी और रुद्रनाथ जी उपस्थित हुए हैं, जिन्होंने यक्षिणियों से जुड़ी समस्त भ्रांतियों को स्पष्ट करते हुए ए टू जेड जानकारी साझा की।
यक्ष और यक्षिणी क्या होते हैं
सबसे पहले यह स्पष्ट किया गया कि यक्ष और यक्षिणी लगभग एक ही श्रेणी के देव-स्वरूप हैं — पुरुष रूप में इन्हें यक्ष कहा जाता है और नारी स्वरूप में यक्षिणी। ये भगवान शंकर की सबसे बड़ी भक्त मानी जाती हैं, जिन्हें भगवान शंकर से जादुई शक्तियों का वरदान प्राप्त है। ये कैलाश पर्वत पर स्वच्छंद रूप से आवागमन कर सकती हैं, क्योंकि इनका मुख्य स्थान कैलाश पर्वत ही है। बताया गया कि पांच प्रकार के कैलाश पर्वत हैं, और उत्तर भारत से लेकर केदारनाथ और उत्तराखंड तक जितना हिमालय क्षेत्र है, वह सब कैलाश पर्वत की श्रेणी में आता है।
यक्ष और कुबेर का संबंध
यक्ष ऋषि की संतान माने जाते हैं, और इनके प्रमुख (हेड) स्वयं *कुबेर यक्ष* हैं। जैसे देवराज इंद्र अप्सराओं के अधिपति हैं, वैसे ही कुबेर यक्षिणियों के अधिपति माने जाते हैं। इसलिए किसी भी यक्षिणी को सिद्ध करने से पहले कुबेर की अनुमति आवश्यक बताई गई, अन्यथा साधना अधूरी रह सकती है। साथ ही इसमें भोलेनाथ की पूजा भी करनी होती है।
यक्षिणी और अप्सरा में अंतर
चर्चा में यह स्पष्ट किया गया कि यक्षिणी और अप्सरा दोनों दिखने में एक जैसी होती हैं — समान स्वरूप, समान रंग-रूप और समान कांति। परंतु दोनों में एक महत्वपूर्ण अंतर है:
– *यक्षिणी* को मां रूप में, बहन रूप में, पत्नी रूप में और प्रेमिका रूप में — चारों प्रकार से सिद्ध किया जा सकता है।
– *अप्सरा* केवल पत्नी रूप में और प्रेमिका रूप में ही सिद्ध होती है, मां या बहन रूप में नहीं।
यक्षिणियां अनेक कलाओं में माहिर होती हैं — तंत्र में, जादू में, धन प्रदान करने में और धन के मार्ग खोलने में। ये देव कन्याएं मानी जाती हैं।
यक्षिणियां क्यों मंत्रों में बंधी हुई हैं
एक महत्वपूर्ण जानकारी यह दी गई कि यक्षिणियां एक अलग प्रजाति (योनि) की हैं, जैसे मनुष्य योनि होती है, वैसे ही यक्ष योनि होती है। इनमें से कुछ यक्षों की वास्तविक पत्नियां होती हैं, परंतु कुछ यक्षिणियां ऐसी हैं जो किसी की पत्नी नहीं होतीं — इन्हें विशेष रूप से मंत्रों में बांधा गया है। इसका कारण यह है कि इनका संबंध महादेव के साथ-साथ माता सती और माता पार्वती से भी है, क्योंकि ये उन्हीं की शक्ति से उत्पन्न हुई हैं।
ये यक्षिणियां सबसे अधिक प्रसन्नता पत्नी रूप और प्रेमिका रूप में सिद्ध होने पर ही व्यक्त करती हैं, और इन्हीं रूपों में ये सबसे अधिक ऊर्जा प्रदान करती हैं। मित्र रूप में भी इन्हें सिद्ध किया जा सकता है, परंतु उतनी ऊर्जा प्राप्त नहीं होती। यह भी बताया गया कि कुछ यक्षिणियां, जैसे *लक्ष्मी यक्षिणी, केवल माता रूप में ही सिद्ध होती हैं, पत्नी रूप में नहीं, जबकि **भोग यक्षिणी* केवल पत्नी और प्रेमिका रूप में ही सिद्ध होती है।
यक्षिणियों का निवास स्थान
यक्षिणियों के निवास के विभिन्न स्थान बताए गए:
– कुछ यक्षिणियां *वृक्षों* पर निवास करती हैं — अशोक का पेड़, चंपा का पेड़, बरगद का पेड़, पीपल का पेड़।
– कुछ यक्षिणियां *आंकड़े के पौधे* (सफेद आंकड़ा और नीला आंकड़ा) पर विराजमान होती हैं।
– कुछ यक्षिणियां कैलाश पर्वत की ओर निवास करती हैं, जबकि कुछ *यक्ष लोक* में निवास करती हैं।
जो यक्षिणियां धरती पर ही, पेड़-पौधों पर निवास करती हैं, वे जल्दी सिद्ध होती हैं, जबकि यक्ष लोक में निवास करने वाली यक्षिणियों को सिद्ध होने में अधिक समय लगता है।
अलकापुरी की उत्पत्ति की कथा
चर्चा में एक महत्वपूर्ण पौराणिक कथा साझा की गई कि यक्षिणियों का अदृश्य स्थान कहां है। रामायण काल में जब रावण ने उत्पात मचाया, तो उसने अपने सौतेले भाई कुबेर से लंका छीन ली थी — क्योंकि लंका पहले यक्षों की नगरी हुआ करती थी, जहां सभी यक्षों ने अपना डेरा बसाया था।
लंका छिन जाने के बाद कुबेर भगवान भोलेनाथ की शरण में गए। भगवान शंकर ने ध्यानावस्था से जागकर उन्हें आदेश दिया कि वे कैलाश पर्वत से थोड़ी दूरी पर स्थित स्थान पर अपनी नई नगरी *अलकापुरी* बसाएं। यह नगरी आज भी सतयुग से चली आ रही है, और हिमालय के जिस-जिस भाग में पांच कैलाश पर्वत स्थित हैं, वहां-वहां यह अलकापुरी नगरी अदृश्य रूप में बसी हुई है।
गुप्त हिमालय
एक विशेष जानकारी यह भी दी गई कि हिमालय के दो रूप हैं — एक जो सामान्य रूप से दिखाई देता है, और दूसरा *गुप्त हिमालय*, जो किसी को दिखाई नहीं देता और वहां पहुंचना संभव नहीं है। बड़े-बड़े वैज्ञानिक भी वहां पहुंचने का प्रयास करके असफल हो जाते हैं, क्योंकि वहां समय का वेग बहुत तेज है और कंपास जैसे उपकरण भी वहां काम नहीं करते। वहां सिद्ध योगी निवास करते हैं, और वहां पहुंचने के लिए साधक के पास विशेष योग बल और तीव्र ऊर्जा (ओरा) होनी चाहिए।
यक्षिणियों की क्षमताएं
यक्षिणियों को सिद्ध करने के अनेक लाभ बताए गए:
– ये शत्रु का चुटकियों में नाश कर सकती हैं।
– ये अपार धन प्रदान करती हैं और धरती में गड़े हुए खजाने की जानकारी देती हैं।
– ये साधक को तंत्र में बलवान बनाती हैं।
– ये नए-नए मंत्रों की खोज करके देती हैं।
– ये दिव्य रसायन प्रदान करती हैं और लुप्त हो चुकी जड़ी-बूटियों का ज्ञान देती हैं।
– ये साधक की योगासन में बैठने की क्षमता को बढ़ा देती हैं — सामान्यतः दो घंटे बैठने वाला साधक इनकी कृपा से आठ घंटे तक शांत मन से बैठ सकता है।
– चूंकि यक्षराज कुबेर धनाध्यक्ष माने जाते हैं, इसलिए इन्हें सिद्ध करने वाले साधक को धन-धान्य की कोई कमी नहीं रहती। यक्ष का खजाना इतना विशाल बताया गया कि पूरी धरती का खजाना समेट लेने पर भी वह समाप्त नहीं होगा।
सिद्धि की प्रक्रिया और चेतावनी
यह स्पष्ट किया गया कि यक्षिणियों को सिद्ध करने के लिए सर्वश्रेष्ठ गुरु का मिलना आवश्यक है। मंत्र को सिद्ध करना, चैतन्य करना, और साथ में गुरु मंत्र जोड़ना अनिवार्य है — तभी यक्षिणी शांत स्वभाव में आकर नियंत्रित होती है।
एक महत्वपूर्ण चेतावनी दी गई कि साधकों को *तामसी यक्षिणियों* की साधना नहीं करनी चाहिए — चाहे साधक कुंवारा हो या विवाहित, तामसी साधना में समस्याएं आ सकती हैं, क्योंकि इनका स्वभाव कभी भी उग्र हो सकता है। इसलिए सदैव *सौम्य और सात्विक* तरीके से ही यक्षिणी साधना करने की सलाह दी गई।
यक्षिणियों की उत्पत्ति का कारण
एक गहन जानकारी यह साझा की गई कि यक्षिणियों को क्यों बनाया गया। जब कलियुग आरंभ होने वाला था, तब नाथ संप्रदाय के गुरु *दत्तात्रेय जी* ने विचार किया कि मनुष्य की आयु सीमित है — वह 50-60 वर्ष में ही शरीर त्याग देगा, जबकि उसके जीवन में चिंताएं, रोग, दुख, क्लेश और शत्रु बने रहेंगे। इनसे बचाव के लिए कुछ विशेष शक्तियों की आवश्यकता महसूस हुई।
इस पर भगवान शंकर से चर्चा हुई और यह निर्णय लिया गया कि यक्षिणियों की रचना की जाए। यह ज्ञान माता पार्वती ने भगवान शंकर से स्वयं पूछा था, और शंकर जी ने उन्हें अमृत समान यह ज्ञान अपने मुख से प्रदान किया। उन्होंने बताया कि यह विद्या कलियुग में उस साहसी व्यक्ति के लिए है, जिसके मन में भय न हो और जिसके पीछे गुरु का संरक्षण हो।
यह भी बताया गया कि जो साधक यक्षिणी को सिद्ध कर लेता है, वह देव पदवी के समकक्ष यक्ष योनि तक पहुंच जाता है, और उसके आगे वह अपनी इच्छा अनुसार देव तुल्य या ऋषि तुल्य बनने का मार्ग चुन सकता है।
पद्मिनी यक्षिणी
चर्चा में पद्मिनी यक्षिणी को तंत्र क्षेत्र की सबसे शानदार यक्षिणी बताया गया। यह गाजे-बाजे और अपनी पूरी मंडली के साथ रथ या पालकी पर सवार होकर प्रकट होती है। इसके रथ पर एक विशाल कमल होता है, यह स्वयं कमल आसन पर विराजमान होती है और हाथ में भी कमल धारण करती है। इसका रंग सफेद होता है, जैसे चंद्रमा की किरणें।
इसे सिद्ध करने पर साधक का योग-तंत्र अत्यधिक विकसित हो जाता है — जैसे पहले दो घंटे बैठ पाता था, अब आठ घंटे तक बैठ सकेगा। यह साधक की समस्त इच्छाओं को पूर्ण करती है, जैसे एक प्रेमिका या पत्नी करती है। सबसे विशेष बात यह बताई गई कि इसे किसी प्रकार के भोग की इच्छा नहीं होती — यह मां रूप या बहन रूप में भी सहजता से सिद्ध हो सकती है।
अन्य प्रमुख यक्षिणियां
चर्चा में यह भी बताया गया कि कुल *36 प्रकार* की यक्षिणियां हैं, जिनमें से 32 सामान्यतः लोगों के समक्ष उपलब्ध हैं और 4 पूर्णतः गोपनीय हैं। इनके विस्तृत मंत्र आगामी वीडियो में दिए जाने की बात कही गई। इस चर्चा में निम्नलिखित यक्षिणियों का संक्षिप्त परिचय दिया गया:
– *भोग यक्षिणी (सुर सुंदरी)*: गुरु मंत्र सिद्ध करने के बाद मंडप सजाकर सिद्ध की जाती है।
– *श्मशान यक्षिणी*: श्मशान भूमि में सिद्ध की जाती है — गृहस्थ साधकों को इसे टालने की सलाह दी गई, क्योंकि यह अघोरी तांत्रिकों की साधना है।
– *वशीकरण यक्षिणी*: तीनों लोकों — पृथ्वी, पाताल और स्वर्ग — में वशीकरण करने में सक्षम।
– *मनोहारिणी यक्षिणी*: सामने वाले का मन जीत लेती है और स्वर्ण मुद्राएं प्रदान करती है।
– *कनकवती यक्षिणी*: वट वृक्ष के नीचे सिद्ध की जाती है, इसमें मांस-मदिरा का भोग लगता है।
– *कामेश्वरी यक्षिणी*: शयन कक्ष में एकांत में सिद्ध की जाती है, साधक की समस्त इच्छाएं पूर्ण करती है।
– *बंधन मोचन यक्षिणी*: सांसारिक बंधनों से मुक्ति दिलाती है, धन से लेकर शत्रु नाश तक सभी इच्छाएं पूर्ण करती है, साधक के खान-पान का भी ध्यान रखती है।
– *पद्मावती/पद्मनी यक्षिणी (अष्ट महा यक्षिणी)*: लक्ष्मी माता के समान, आठ प्रमुख यक्षिणियों में से एक मानी जाती है।
– *सिद्ध यक्षिणी*: उच्च स्तर की देवी, ध्यान बढ़ाती है, पत्नी सुख और धन-धान्य प्रदान करती है।
– *कान चेटक यक्षिणी*: महामतंगी (दस महाविद्याओं में से एक) की सेविका, जिन्हें मतंगी यक्षिणी भी कहा जाता है — शत्रु का जड़ से नाश करती है, विश्व का हाल बताती है और स्वप्न सिद्धि देती है।
– *नटी यक्षिणी*: शिव भगवान की रुद्र स्वरूप वाली यक्षिणी, इसमें मांस-मछली-मदिरा की बलि दी जाती है और एक महीने बाद मनोकामना पूर्ण होती है — अशोक वृक्ष के नीचे सिद्ध की जाती है।
– *अनुरागिनी यक्षिणी*: समस्त मनोकामनाएं पूर्ण करती है।
– *विचित्रा यक्षिणी*: चंपा के फूलों के बगीचे में सिद्ध की जाती है, एक महीने की साधना में धन-वैभव प्रदान करती है।
– *वर्मा यक्षिणी*: श्मशान भूमि में सिद्ध की जाती है, प्रसन्न होने पर साधक का वरण-पोषण करती है।
– *हंसी यक्षिणी*: घर में एकांत कमरे में सिद्ध की जाती है, गड़ा हुआ धन ढूंढने में विशेष सक्षम।
– *भीषण यक्षिणी*: चौराहे पर बैठकर सिद्ध की जाती है, समस्त प्रकार के विघ्न काटती है।
– *जनरंजनी यक्षिणी*: दुर्भाग्य को समाप्त कर सौभाग्य में परिवर्तित करती है।
– *विशाला यक्षिणी*: चिंचा (इमली) के पेड़ के नीचे सिद्ध की जाती है, दिव्य रसायन प्रदान करती है जिससे साधक अदृश्य भी हो सकता है।
– *मदीना यक्षिणी*: राजद्वार पर सिद्ध की जाती है, इससे साधक को अदृश्य होने या गायब होने की शक्ति प्राप्त होती है।
– *घंटाकर्णी यक्षिणी*: एकांत स्थान में सिद्ध की जाती है, इसमें घंटा बजाया जाता है — इसके बाद साधक को ऐसी वशीकरण शक्ति प्राप्त होती है कि जहां तक घंटे की आवाज पहुंचती है, वहां तक के लोग वशीभूत हो जाते हैं।
निष्कर्ष
इस चर्चा में यक्षिणी लोक की गहन और रहस्यमय यात्रा प्रस्तुत की गई। यक्ष और यक्षिणी की उत्पत्ति, कुबेर के अधिपत्य, अलकापुरी नगरी की पौराणिक कथा, गुप्त हिमालय के रहस्य, तथा यक्षिणियों की अद्भुत क्षमताओं पर विस्तार से बात की गई। साथ ही अप्सरा और यक्षिणी के बीच के महत्वपूर्ण अंतर को भी स्पष्ट किया गया।
यह भी बताया गया कि दत्तात्रेय जी और भगवान शंकर के बीच हुए विमर्श के परिणामस्वरूप ही कलियुग के मनुष्यों की सहायता के लिए यक्षिणियों की रचना हुई, ताकि सीमित जीवनकाल में भी साधक अपने दुख, चिंता और शत्रुओं से मुक्ति पा सके।
अंत में विभिन्न प्रकार की यक्षिणियों — भोग यक्षिणी, श्मशान यक्षिणी, वशीकरण यक्षिणी, कामेश्वरी यक्षिणी, पद्मिनी यक्षिणी, कान चेटक यक्षिणी और अन्य अनेक यक्षिणियों — का परिचय दिया गया, जिनकी साधना विधियां और मंत्र आगामी वीडियो में विस्तार से साझा किए जाने की बात कही गई। यह स्पष्ट किया गया कि यक्षिणी साधना सदैव सौम्य और सात्विक विधि से, गुरु मंत्र के साथ ही करनी चाहिए, ताकि साधक इसका पूर्ण और सुरक्षित लाभ उठा सके।
