लोंकड़िया वीर साधना: रावण के सेनापति की गोली जैसी तीव्र सिद्धि

परिचय

गुरु मंत्र साधना.com और Mythologynath.com पर आज की इस विशेष चर्चा में विषय है — लोंकड़िया वीर। यह एक तरीके से मां दुर्गा का उपासक था, और रावण की सेना में एक छोटा सेनापति भी था। सागरनाथ जी के साथ इस चर्चा में रुद्रनाथ जी भी जुड़े हुए हैं, जो लोंकड़िया वीर के विषय में विस्तृत जानकारी और अपने व्यक्तिगत अनुभव साझा करते हैं।

लोंकड़िया वीर रावण की एक मायावी सेना का सेनापति था, जो अत्यंत शक्तिशाली माना जाता है। यह गोली की तरह तीव्र प्रभाव से कार्य करता है — साधक जो भी कार्य इससे मांगे, वह इसे तुरंत पूर्ण कर सकता है। इसकी एक विशेषता यह भी है कि यह हवा में उड़कर ही कार्य करता है।


लोंकड़िया वीर का परिचय और स्थान

रावण के सेनापतियों में प्रहस्त के बाद लोंकड़िया वीर का स्थान आता है — यह रावण का एक विशेष सेनापति था। यह एक मायावीर है, जो पूर्णतः हवा में ही विचरण करता है। इसका वेशभूषा (पहरावा) पूर्णतः सफेद रंग का है।

सागरनाथ जी बताते हैं कि जब यह वीर साधक को सिद्ध हो जाता है और उसके दर्शन प्राप्त होते हैं, तो साधक केवल चुटकी बजाकर इसे कोई भी कार्य बोल सकता है, और यह वीर उस कार्य को तुरंत पूर्ण कर देता है।


मां दुर्गा से प्राप्त वरदान की कथा

लोंकड़िया वीर ने मां दुर्गा को इतना प्रसन्न कर रखा था कि उन्होंने इसे यह वरदान दिया था कि जितनी भी तांत्रिक क्रियाएं (तंत्र) संसार में हैं, वे सभी इसके वश में हो जाएंगी और यह अमर हो जाएगा। मां दुर्गा की मंशा थी कि यह इस शक्ति का उपयोग अच्छे कार्यों के लिए करे। परंतु रावण के साथ रहते-रहते इसका स्वभाव भी रावण जैसा ही होता गया।

हनुमान जी से युद्ध और मोक्ष प्राप्ति

जब हनुमान जी से इसका युद्ध हुआ, तो हनुमान जी ने इसे मोक्ष प्रदान किया — अर्थात युद्ध में मारकर इसकी आत्मा को मुक्त किया। सागरनाथ जी बताते हैं कि हनुमान जी के अतिरिक्त कोई और इसे पकड़ ही नहीं पा रहा था। जब लोंकड़िया वीर ने अपनी संपूर्ण माया का प्रयोग किया, तो हनुमान जी को यह ज्ञात हो गया कि इसने दुर्गा मां को सिद्ध कर रखा है — और हनुमान जी स्वयं दुर्गा मां के पुत्र हैं, इसलिए शक्तियां आपस में एकता बनाए रखती हैं और एक-दूसरे का सम्मान करती हैं।

इसके बाद हनुमान जी ने ध्यानमग्न होकर मां दुर्गा से इसे समाप्त करने की आज्ञा मांगी। आज्ञा प्राप्त होने के बाद उन्होंने इसका तोड़ किया, जिसके परिणामस्वरूप लोंकड़िया वीर की ज्योति सीधे मां दुर्गा के भीतर समा गई।


साधना से प्राप्त होने वाले लाभ

सागरनाथ जी लोंकड़िया वीर साधना से प्राप्त होने वाले विभिन्न लाभों का विस्तार से वर्णन करते हैं। यह वीर साधक के जीवन की निम्न समस्याओं का समाधान कर सकता है:

– शत्रु का नाश करना।
– छोटे से लेकर बड़े तक, जीवन में रुके हुए समस्त कार्यों को गति देना।
– पढ़ाई में आने वाली रुकावटें दूर करना।
– धन संबंधी समस्याओं का समाधान।
– घर में होने वाले लड़ाई-झगड़ों को शांत करना।
– पति-पत्नी के बीच अनबन दूर करना, या रूठी हुई पत्नी को मायके से वापस लाना।
– कोर्ट-कचहरी के केस में सहायता।
– संतान प्राप्ति में बाधा या बार-बार गर्भपात की समस्या दूर करना।
– विवाह में आने वाली रुकावटें दूर करना।
– शत्रु द्वारा बांधी गई गद्दी या शारीरिक शक्ति को खोलना।
– विदेश यात्रा या वीज़ा संबंधी समस्याओं का समाधान।
– व्यापार में सेटलमेंट की समस्याएं दूर करना।


साधना की पूर्व-आवश्यकताएं

दुर्गा और काल भैरव की आराधना आवश्यक

चूंकि लोंकड़िया वीर स्वयं मां दुर्गा का उपासक रहा है, इसलिए इसे सिद्ध करने से पहले मां दुर्गा के कुछ मंत्रों का जाप और काल भैरव जी की आराधना करना आवश्यक है — इससे साधना जल्दी सफल होती है।

गुरु दीक्षा अनिवार्य

सागरनाथ जी बार-बार यह चेतावनी देते हैं कि इस साधना को बिना गुरु दीक्षा के कदापि नहीं करना चाहिए। उन्होंने एक उदाहरण दिया कि एक व्यक्ति सीधे इस साधना में हाथ डालने के कारण तीन बार पागल होते-होते बचा। जैसे किसी बच्चे को आग के साथ खेलने दिया जाए तो उसका हाथ जलना निश्चित है, वैसे ही बिना उचित मार्गदर्शन के इस साधना को करना खतरनाक है।

दुर्गा उपासना की अवधि

साधना शुरू करने से पहले पांच दिन या एक सप्ताह की दुर्गा उपासना करनी चाहिए, जिसमें मां दुर्गा को सात्विक तरीके से प्रसन्न किया जाता है। इसके साथ ही 11 मंगलवार तक माता रानी को प्रसाद अर्पित करना भी आवश्यक बताया गया है, क्योंकि माता रानी की सहायता से लोंकड़िया वीर शीघ्र प्रसन्न हो जाता है।


साधना की सामग्री और विधि

भोग सामग्री

लोंकड़िया वीर का भोग पूर्णतः सात्विक है — इसमें मांस-मदिरा का कोई स्थान नहीं। इसका मुख्य भोग है:

– *दूध* — कच्चा नहीं, बल्कि चूल्हे या गैस पर उबाला हुआ दूध, जिसे एक मिट्टी के बर्तन में रखा जाए। मात्रा 250 ग्राम से आधा लीटर तक हो सकती है।
– *जलेबी* — दो से तीन टुकड़े, जिन्हें उबले हुए दूध में भिगो दिया जाता है।

साधना की विधि

1. सबसे पहले आसन का जाप करना है — चौकी पर बैठकर आसन ग्रहण करें।
2. इसके बाद गुरु मंत्र का जाप करें।
3. फिर गणेश जी और भगवान शंकर का स्मरण करें।
4. इसके बाद लोंकड़िया वीर की सिद्धि साधना पकड़ें — कम से कम 11 या 15 माला का जाप करें।


मंत्र
सागरनाथ जी द्वारा बताया गया मंत्र इस प्रकार है:

੦ लोंकड़िया वीर ***** देखा लोंकड़िया वीर तेरी हाजिरी का तमाशा।

सागरनाथ जी इस मंत्र का अर्थ स्पष्ट करते हैं — “भागे-भागे आओ” का अर्थ है कि यह वीर हवा में भागते हुए आता है। “जैसे दुर्गा द्वारे कूदे” का संदर्भ इस बात से है कि जैसे यह वीर मां दुर्गा के द्वार पर सिद्धि हेतु पहुंचा था, वैसे ही यह साधक के द्वार पर भी उसी तत्परता से आए। “पाताल के राजा” इसलिए कहा गया है क्योंकि यह पाताल लोक में निवास करता है — धरती के नीचे सात पाताल माने गए हैं।


लोंकड़िया वीर का स्वरूप

सागरनाथ जी बताते हैं कि जब यह वीर साधक के सामने प्रकट होता है, तो इसके पैर और हाथ दिखाई नहीं देते। यह सफेद वस्त्रों में हवा में उड़ता हुआ दिखाई देगा — पूर्णतः मायावी रूप में। इसका चेहरा भी दिखाई नहीं देता, केवल हवा में उड़ता हुआ सफेद कपड़ा और खुली हुई बाजुएं दिखाई देती हैं। सागरनाथ जी स्पष्ट करते हैं कि यह कोई भूत-प्रेत नहीं है, इसलिए साधक को घबराने की आवश्यकता नहीं।

वचन ग्रहण करना

जब यह वीर साधक के समक्ष प्रकट हो, तो साधक अपनी इच्छानुसार तीन वचन ले सकता है — जैसे कि जब भी बुलाया जाए तो हाजिर हो, जो भी कार्य बताया जाए उसे तुरंत करे, साधक की रक्षा करे, और मित्र के रूप में साथ चले।


दुर्गा और काल भैरव की आवश्यकता का कारण

सागरनाथ जी विशेष रूप से स्पष्ट करते हैं कि यह वीर एक उच्च स्तर की मायावी शक्ति है, जो केवल बड़ी शक्तियों — जैसे काल भैरव या मां दुर्गा — की पकड़ में ही आता है। यह छोटी-मोटी शक्तियों के नियंत्रण में नहीं आता, इसीलिए काल भैरव और मां दुर्गा की आराधना अनिवार्य है, क्योंकि काल भैरव ही इसे नियंत्रित कर सकते हैं।


सागरनाथ जी का व्यक्तिगत अनुभव

सागरनाथ जी बताते हैं कि जब उन्होंने महसूस किया कि यह प्राचीन विद्या धीरे-धीरे लुप्त हो रही है — यह अब केवल देहात, गांव या हिमाचल के दूरदराज़ क्षेत्रों में सीमित रह गई है — तो उन्होंने इस विद्या को पुनर्जीवित करने का निर्णय लिया।

जब उन्हें इसकी विधि और मंत्र प्राप्त हुआ, तो उन्होंने एक सप्ताह तक ध्यान में इसका अभ्यास किया। आठवें दिन उन्हें यह अनुभव हुआ — सर्दियों की एक दोपहर, जब वे लेटे हुए थे, उन्हें लोंकड़िया वीर हवा में उड़ता हुआ, सफेद कपड़ों में दिखाई दिया। उसने उनके पास आकर कहा — “सागरनाथ, आने वाले समय में तू मुझे सिद्ध करेगा।”

वीर द्वारा बताई गई विधि

सागरनाथ जी के पूछने पर वीर ने अपना परिचय दिया और बताया कि उसे उबला हुआ दूध और जलेबी मिट्टी के बर्तन में चाहिए। यदि साधक को कोई बड़ा कार्य करवाना हो, तो सवा किलो जलेबी और सवा किलो दूध अर्पित करना चाहिए, और इसे उबालकर बाहर खुले स्थान पर रख देना चाहिए। इससे वह कितना भी बड़ा कार्य पूर्ण कर सकता है।

संतान प्राप्ति का व्यक्तिगत अनुभव

सागरनाथ जी ने एक वास्तविक घटना साझा की — एक व्यक्ति की संतान नहीं हो रही थी। जब उन्होंने लोंकड़िया वीर से पूछा, तो वीर ने बताया कि इसमें एक विशेष रुकावट है और सवा किलो दूध व सवा किलो जलेबी का भोग देने से यह समस्या हल हो जाएगी। सागरनाथ जी स्वयं उस व्यक्ति के घर गए, दूध उबाला, बर्तन बदला और इसे बाहर उजाड़ में रखने को कहा। दो महीने के भीतर उस परिवार को खुशखबरी प्राप्त हुई।


षट्कर्म करने की क्षमता

सागरनाथ जी बताते हैं कि यह वीर षट्कर्म आसानी से कर सकता है — साधक चाहे सीधे कार्य ले या उल्टे-सीधे कार्य, यह वीर दोनों प्रकार के कार्य करने में सक्षम है। उन्होंने बताया कि उन्होंने स्वयं मैचों (खेलों) के दौरान भी इस वीर की सहायता ली है, जब लोग जीत-हार को लेकर अत्यधिक भावुक हो जाते हैं। सागरनाथ जी के अनुसार, एक साधक के पास हर प्रकार के “तीर” (शक्तियां) होनी चाहिए — जो विद्याएं लुप्त हो चुकी हैं, उन्हें भी पुनर्जीवित करना आवश्यक है।


आधुनिक समय में गुरुओं के प्रति सचेत करने वाला संदेश

चर्चा के दौरान सागरनाथ जी ने एक महत्वपूर्ण सामाजिक मुद्दे पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि आजकल कई तथाकथित गुरु शिष्यों को साधना सिद्ध तो करवा देते हैं, परंतु बाद में ईर्ष्यावश उनकी शक्ति को अवरुद्ध (ब्लॉक) कर देते हैं, ताकि शिष्य उन पर निर्भर बना रहे और आर्थिक रूप से उन्हें लाभ मिलता रहे। यह पूरी तरह से एक व्यावसायिक रणनीति है।

एक वास्तविक उदाहरण — प्रेत सिद्धि का मामला

एक युवक ने प्रेत सिद्धि की, वचन प्राप्त हुए, परंतु उसके तथाकथित गुरु ने बाद में वह शक्ति वापस उठवा दी। उस युवक ने साधना के दौरान गुरु को मदिरा की बोतलें और अन्य वस्तुएं भेंट की थीं, जिससे उसका धन और समय दोनों व्यर्थ गए।

ख्वाजा सिद्धि का उदाहरण

एक अन्य व्यक्ति ने ख्वाजा साहब को 11 दिनों के भीतर सिद्ध कर लिया था और उनसे वचन भी प्राप्त हो गए थे। परंतु उसने ख्वाजा साहब के इस वचन का उल्लंघन करते हुए — कि इस बारे में किसी को न बताया जाए — अपने गुरु को यह बात बता दी। गुरु ने ईर्ष्यावश उसकी शक्ति को अवरुद्ध कर दिया, जिससे वह व्यक्ति आज भी असहाय स्थिति में है।

सागरनाथ जी इस उदाहरण के माध्यम से यह स्पष्ट करते हैं कि साधकों को जागरूक रहना चाहिए और अपनी सिद्ध शक्तियों के विषय में अनावश्यक रूप से किसी को नहीं बताना चाहिए, विशेष रूप से जब स्वयं शक्ति ने ऐसा वचन मांगा हो।


दीक्षा प्रक्रिया की पारदर्शिता

सागरनाथ जी और रुद्रनाथ जी दोनों स्पष्ट करते हैं कि उनके गुरु मंत्र में किसी भी देवी-देवता का सामान्य नाम नहीं, बल्कि सर्वव्यापी ओमकार स्वरूप ज्योति का नाम शामिल है। वे इस बात पर ज़ोर देते हैं कि वे दीक्षा के लिए शुल्क अवश्य लेते हैं, परंतु बदले में वास्तविक और प्रामाणिक ज्ञान प्रदान करते हैं — उन्होंने आज तक किसी शिष्य की शक्ति को छल से अवरुद्ध नहीं किया।

 

सही उपयोग की सलाह

सागरनाथ जी बताते हैं कि यह वीर साधक की सुरक्षा, शत्रु नाश, व्यापार वृद्धि, और यहां तक कि राजनीतिक क्षेत्र में सफलता (जैसे चुनाव लड़ना, प्रधान बनना) दिलाने में भी सहायक है। परंतु उनका स्पष्ट संदेश है कि इस शक्ति का प्रयोग केवल अच्छे कार्यों के लिए किया जाना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति नहीं मानता, तो उसे इस शक्ति के प्रयोग से बचना चाहिए और परिणाम मां दुर्गा पर छोड़ देना चाहिए।

रुद्रनाथ जी इस बात से सहमति जताते हुए कहते हैं कि बुरे कार्यों का परिणाम स्वयं साधक पर ही वापस आता है, इसलिए क्रोध और वासना जैसी नकारात्मक भावनाओं से बचकर विवेकपूर्ण ढंग से इस शक्ति का उपयोग करना चाहिए।


निष्कर्ष

लोंकड़िया वीर साधना नाथपंथ की एक अत्यंत प्रभावशाली और तीव्र गति से कार्य करने वाली विद्या है। इस चर्चा से हमें निम्न महत्वपूर्ण बातें ज्ञात होती हैं:

– यह वीर रावण के सेनापति के रूप में उत्पन्न हुआ, परंतु मां दुर्गा की कृपा से इसे विशेष शक्तियां प्राप्त हुईं।
– यह साधना पूर्णतः सात्विक है — दूध और जलेबी ही इसका मुख्य भोग है।
– बिना गुरु दीक्षा के इस साधना को करना अत्यंत जोखिमपूर्ण है, क्योंकि यह वीर उच्च स्तर की मायावी शक्ति है।
– दुर्गा उपासना और काल भैरव की आराधना इस साधना की पूर्व-आवश्यकताएं हैं।
– यह वीर धन, शत्रु-नाश, संतान प्राप्ति, व्यापार वृद्धि और राजनीतिक सफलता जैसे अनेक कार्यों में सहायक सिद्ध हो सकता है।
– शक्ति प्राप्त करने के बाद उसका दुरुपयोग या अनावश्यक प्रचार करने से बचना चाहिए, और सदैव सतर्क तथा जागरूक रहना चाहिए।

अंततः सागरनाथ जी का यह स्पष्ट संदेश है कि यह लुप्त होती प्राचीन विद्या समाज-कल्याण की भावना से पुनर्जीवित की जा रही है, ताकि सच्चे साधक इसका सदुपयोग कर अपने जीवन को समृद्ध और सुरक्षित बना सकें।

राम राम। जय माता की। जय श्री महाकाल।

Ready to elevate your sadhana? Lets connect!