महा यक्षिणी साधना: पत्नी और प्रेमिका रूप में सिद्ध होने वाली दिव्य शक्ति
परिचय
mythologynath.com पर यक्षिणी साधनाओं की एक विशेष श्रृंखला चल रही है, जिसमें एक के बाद एक विभिन्न यक्षिणियों की चर्चा की जा रही है। इसी क्रम में आज बात होगी *महा यक्षिणी साधना* की — एक ऐसी दिव्य साधना जिसे पत्नी रूप में या प्रेमी रूप में सिद्ध किया जा सकता है, और जो साधक की मनचाही इच्छाओं को पूरा करती है।
यह साधना पत्नी रूप में स्नेह और प्रेम प्रदान करती है, सौंदर्य देती है, तथा सुख-समृद्धि लेकर आती है। इस विषय पर विस्तार से चर्चा करने के लिए एक बार फिर सागरनाथ जी उपस्थित हुए, जिन्होंने इस साधना के स्वभाव, अनुभव, मंत्र और विधि को साझा किया।
महा यक्षिणी की प्रकृति
बताया गया कि जैसे किसी भी यक्षिणी या अप्सरा को सिद्ध किया जाता है, वह कभी नहीं चाहती कि उसका प्रेमी दरिद्र रहे, दुखी रहे या दानहीन रहे। इसी प्रकार महा यक्षिणी भी अपने साधक को समस्त सुख-सुविधाएं प्रदान करने का प्रयास करती है। यह साधक को धनहीन, वीर्यहीन, बलहीन या ऐश्वर्यहीन नहीं रहने देती — यदि साधक इन कमियों से जूझ रहा हो, तो यह उसे पूर्णता प्रदान करती है।
यह एक देवकन्या है, जो दिल से साधक के साथ रिश्ता निभाती है। यह छोटी-छोटी बातों पर साथ छोड़ने वाली नहीं होती, बल्कि सात जन्मों तक साथ निभाने वाली मानी गई है। जिस तरह एक आदर्श पत्नी अपने पति को संभालती है, उसकी आदतों को सुधारने का प्रयास करती है, न कि छोटी बात पर रिश्ता तोड़ देती है — उसी भाव के साथ यह यक्षिणी साधक के साथ बनी रहती है।
एक साधक का अनुभव
चर्चा के दौरान एक साधक का व्यक्तिगत अनुभव विस्तार से साझा किया गया। यह साधक पहले से दीक्षा ले चुका था और उसे गुरु मंत्र की शुद्धि की पूरी प्रक्रिया बताई जा चुकी थी। उसकी शादी नहीं हो रही थी, और उसने स्पष्ट कह दिया था कि वह ऐसी लड़की से शादी नहीं करना चाहता जिसके साथ जीवन भर लड़ाई-झगड़े हों — उसकी इच्छा थी कि उसकी शादी किसी अप्सरा या यक्षिणी जैसे रूप से हो। उसे महा यक्षिणी का नाम सुना हुआ था, परंतु उसे इसका मंत्र और विधि नहीं मालूम थी।
इस पर पहले उसे विधिवत *गुरु मंत्र की दीक्षा* दी गई और उसका अनुष्ठान करवाया गया। उसे बताया गया कि गुरु मंत्र सिद्ध होने के बाद ही उसकी शक्ति खुलेगी, और साधना के दौरान गुरु उसके साथ हर परिस्थिति में खड़े रहेंगे।
साधक ने यह साधना घर से बाहर, अपने फार्महाउस में — जंगल के बीचोंबीच — करने का निर्णय लिया, क्योंकि घर में साधना के दौरान शांति नहीं मिलती थी। उसने *41 दिन* की साधना का संकल्प लिया। यह भी बताया गया कि यद्यपि पूरी अवधि 41 दिन की करनी होती है, परंतु यक्षिणी प्रायः तीन सप्ताह के भीतर ही हाजिर होकर वचन दे देती है — फिर भी साधक को साधना पूर्ण अवधि तक जारी रखनी होती है।
साधक ने उत्तर दिशा की ओर मुख करके साधना प्रारंभ की और गुरु मंत्र पहले से सिद्ध होने के कारण उसे कोई भय नहीं था। साधना पूर्ण होने के बाद जब वह गुरुदेव से मिलने आया, तो उसने बताया कि उसे सिद्धि प्राप्त हो चुकी है। गुरु ने उसे बताया कि यक्षिणी उसके साथ ही खड़ी है, केवल उसे वायु रूप में महसूस हो रही है।
गुरु ने उसे सलाह दी कि इतनी मेहनत के बाद उसे यक्षिणी को छोड़ना नहीं चाहिए, क्योंकि यदि यह पत्नी रूप में पूर्ण रूप से सिद्ध हो जाए, तो यह साधक के हर जन्म में उसके साथ रहेगी। इसके बाद साधक ने एक और अनुष्ठान — गुरु मंत्र के माध्यम से — किया, जिससे यक्षिणी वायु रूप से *शरीर रूप* में प्रकट हुई। बताया गया कि चूंकि यह कलियुग है, इसलिए शरीर रूप में आने की प्रक्रिया तुरंत नहीं होती।
शरीर रूप में आने के बाद साधक उसे अपने घर ले गया। घरवाले उसके इस सुंदर साथी को देखकर हैरान रह गए और पूछने लगे कि यह सुंदर कन्या कहां से लाया, क्योंकि साधक की उम्र निकल चुकी थी और उसका रिश्ता तय नहीं हो पा रहा था। मोहल्ले वालों ने भी उसकी सुंदरता देखकर आश्चर्य व्यक्त किया। साधक ने अपने घरवालों को पहले ही बता दिया था कि इस विषय में उससे कोई सवाल नहीं पूछा जाए।
आगे बताया गया कि कुछ मोहल्ले के लड़कों ने उस पर बुरी नजर रखनी शुरू कर दी और उसके घर में घुस आए। इस पर यक्षिणी ने अपनी दिव्य/जादुई शक्ति का प्रयोग करते हुए उन्हें दंडित किया, जिसके बाद वे लड़के दोबारा उस ओर नहीं आए। इसके बाद साधक का परिवार यह सोचकर कि समाज में उनकी बातें उजागर हो सकती हैं, अपना सब कुछ बेचकर किसी हिल स्टेशन की ओर चला गया, जहां वे अब शांति और आनंद के साथ रह रहे हैं।
यह अनुभव यह दर्शाने के लिए साझा किया गया कि महा यक्षिणी साधना वास्तव में किस प्रकार साधक के जीवन को बदल सकती है — चाहे पत्नी रूप में हो या प्रेमी रूप में।
साधना का मंत्र
महा यक्षिणी साधना का मंत्र इस प्रकार बताया गया:
ॐ ह्रीं महा *** भामिनी प्रिय स्वाहा।
यह मंत्र सौम्य साधना का भाग है, और साधक को घबराने की आवश्यकता नहीं है — इसे अप्सरा साधना की भांति ही सरल और स्वाभाविक बताया गया है।
साधना की विधि
साधना का समय और अवधि
– साधना *रविवार या सोमवार, शुक्ल पक्ष* में प्रारंभ करनी चाहिए।
– रुद्राक्ष की माला से प्रतिदिन *51 माला* का जाप करना है।
– साधना *31 से 41 दिन* तक करनी होती है। यक्षिणी बीच में ही हाजिर होकर वचन दे सकती है, परंतु साधक को साधना पूर्ण करनी आवश्यक है।
आज्ञा प्राप्त करने की प्रक्रिया
साधना प्रारंभ करने से *दो दिन पूर्व* कुबेर, त्र्यंबक (शिव), शिव शक्ति और भैरव से विधिवत आज्ञा लेनी आवश्यक बताई गई। यह प्रक्रिया इस प्रकार है:
*पहला दिन* — निम्न दोनों मंत्रों की 31-31 माला एक ही बैठक में करनी है:
– ॐ कुबेराय नमः
– ॐ त्र्यंबकाय नमः
*दूसरा दिन* — निम्न दोनों मंत्रों की भी 31-31 माला रुद्राक्ष की माला से करनी है:
– ॐ शिव शक्ति स्वाहा
– ॐ भैरवाय स्वाहा
यह स्पष्ट किया गया कि यदि यह आज्ञा-प्रक्रिया नहीं की जाए, तो चाहे कितनी भी माला जप ली जाए, कोई परिणाम प्राप्त नहीं होगा — यह आज्ञा लेना अनिवार्य है, तभी यक्षिणी साधक के पास भेजी जाती है।
मंडप और भोग सामग्री
रोज रात्रि को एक निश्चित समय पर मंडप सजाना है। मंडप में:
– *दुर्गा माता या लक्ष्मी माता का चित्र* रखना है, क्योंकि यह सौम्य साधना है और यक्षिणी इनके वश में होती है।
– *गुलाब के फूल* अर्पित करने हैं।
– यक्षिणी का विशेष *यंत्र* स्थापित करना है (जिसकी जानकारी दीक्षा के समय दी जाती है)।
– *तेल या घी का दीपक* जलाना है, जिसमें आधा *गुलाब का इत्र* डालना है — शेष आधा स्वयं के कपड़ों पर और मंडप स्थान पर छिड़कना है।
– *मीठे पान का भोग*, दो लड्डू, नारियल, पांच लौंग और पांच इलायची अर्पित करने हैं।
सामग्री हर दो दिन में बदलनी होती है — अर्थात पहले और दूसरे दिन एक जैसी सामग्री, तीसरे-चौथे दिन नई सामग्री, और इसी प्रकार पांचवें-छठे दिन।
एक गुलाब की माला दुर्गा माता को और दूसरी लक्ष्मी माता को अर्पित करनी है। यदि गुलाब की माला उपलब्ध न हो तो गेंदे की माला का उपयोग किया जा सकता है — यह अनिवार्य नहीं है। साथ ही, गुलाब की एक माला स्वयं गले में भी धारण करनी है।
यक्षिणी का प्रकट स्वरूप
जब यह यक्षिणी सामने प्रकट होती है, तो उसका वर्णन इस प्रकार किया गया — वह पूर्ण यौवन में होती है, उसके शरीर से चंद्रमा जैसी आभा निकलती प्रतीत होती है, माथे पर सिंदूर का तिलक और हल्का मुकुट होता है। वह चंद्रमा की कला की भांति मुस्कुराती है और पतली कमर के साथ पूर्ण नवयौवना के रूप में दिखाई देती है — ऐसा सौंदर्य जिसे साधक ने पहले कभी न देखा हो।
वचन मांगना
जब यक्षिणी साधक के समक्ष प्रकट होकर बैठती है, तब साधक को अपनी इच्छा प्रकट करनी होती है — यदि पत्नी रूप में सिद्ध होना चाहता है तो वह वचन मांग सकता है, और यक्षिणी उसकी समस्त मनोकामनाएं पूर्ण करती है तथा शत्रु नाश में भी सहायता करती है। यदि साधक इसे प्रीतम (प्रेमी) रूप में सिद्ध करना चाहता है, तो उसे उसी अनुसार वचन मांगना होता है। यह साधना घर पर, एकांत कमरे में की जा सकती है — इसके लिए बाहर जाने की कोई अनिवार्यता नहीं है, और सिद्धि प्राप्त होने में घबराने की कोई आवश्यकता नहीं बताई गई।
गुरु मंत्र का महत्व
चर्चा में बार-बार इस बात पर जोर दिया गया कि *गुरु मंत्र का अनुष्ठान* सबसे पहली और अनिवार्य शर्त है। बिना गुरु मंत्र की दीक्षा और अनुष्ठान के किसी भी यक्षिणी साधना में सफलता संभव नहीं है। यह गुरु मंत्र मानो “खजाने की चाबी” है, जिसके माध्यम से समस्त सिद्धियों के मार्ग खुलते हैं।
चाहे साधक करण पिशाचिनी करे, मतंगी यक्षिणी करे, चेटक यक्षिणी करे, पद्मिनी यक्षिणी करे, कनकवती यक्षिणी करे, वीर यक्षिणी करे या जय यक्षिणी करे — बिना गुरु मंत्र की चोट (दीक्षा) के कोई भी यक्षिणी सीधे नियंत्रित होकर नहीं आती। गुरु मंत्र लगने पर ही यह शक्तियां साधक के नियंत्रण में आती हैं।
निष्कर्ष
महा यक्षिणी साधना एक ऐसी दिव्य साधना है, जिसे पत्नी रूप या प्रेमी रूप में सिद्ध किया जा सकता है, और जो साधक को स्नेह, प्रेम, सौंदर्य तथा सुख-समृद्धि प्रदान करती है। इस चर्चा में एक साधक के व्यक्तिगत अनुभव के माध्यम से यह दिखाया गया कि किस प्रकार यह साधना वास्तविक जीवन में परिणाम ला सकती है — विवाह न होने की समस्या से लेकर पूर्ण दांपत्य जीवन तक।
साधना की संपूर्ण विधि — रविवार या सोमवार शुक्ल पक्ष में प्रारंभ, 51 माला रुद्राक्ष की, 31 से 41 दिन की अवधि, कुबेर-त्र्यंबक तथा शिव शक्ति-भैरव से आज्ञा प्राप्ति, मंडप सज्जा, भोग सामग्री और मंत्र — विस्तार से बताई गई। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि इस साधना की सफलता के लिए *गुरु मंत्र की दीक्षा और अनुष्ठान* अनिवार्य है, जिसके बिना कोई भी यक्षिणी साधक के नियंत्रण में नहीं आ सकती।
यह श्रृंखला आगे भी जारी रहेगी, जिसमें अन्य यक्षिणियों — जैसे करण पिशाचिनी, मतंगी, चेटक, पद्मिनी, कनकवती, वीर और जय यक्षिणी — के विषय में अलग-अलग वीडियो में विस्तृत जानकारी दी जाएगी।
