सखी सुल्तान साधना: पहलवानी शक्ति और वज्र समान शरीर प्राप्त करने की विद्या
परिचय
Mythologynath.com चैनल पर आज एक ऐसी विशेष साधना प्रस्तुत की जा रही है, जिससे साधक का शरीर एक पहलवान की तरह बलशाली और तगड़ा बन जाता है। यह साधना *सखी सुल्तान साधना* के नाम से जानी जाती है, जिसे रुद्रनाथ जी के साथ चर्चा में सागरनाथ जी ने विस्तार से समझाया।
यह साधना सागरनाथ जी के गुरुदेव की व्यक्तिगत साधना रही है, जो स्वयं पहलवानी और कुश्ती दंगल के अत्यंत शौकीन थे। उन्होंने ही अपने शिष्यों को यह ज्ञान प्रदान किया था कि यदि सखी सुल्तान को सिद्ध कर लिया जाए, तो शरीर के समस्त रोग जड़ से समाप्त हो जाते हैं और शरीर पहलवानों जैसा बनने लगता है — फौलाद और वज्र के समान, ठीक वैसा जैसा हनुमान जी का शरीर माना जाता है।
साधना की उत्पत्ति और गुरु का अनुभव
सागरनाथ जी बताते हैं कि उनके गुरुदेव को तंत्र का गहन ज्ञान था, और साथ ही वे पहलवानी करने के भी बड़े शौकीन थे। जब वे इस मंत्र का जाप करके अखाड़े में जाते थे, तो वे पहलवानों को इस प्रकार उठाकर फेंक देते थे जैसे कोई गुड्डे-गुड़िया उठाकर फेंकता हो। यह दर्शाता है कि इस साधना से प्राप्त बल कितना अधिक शक्तिशाली होता है। गुरुदेव अक्सर सागरनाथ जी को भी पहलवानी करने के लिए प्रेरित करते थे, परंतु उन्होंने विनम्रता से मना करते हुए केवल इसका ज्ञान प्राप्त करना चुना।
साधना का मंत्र
इस साधना का मंत्र इस प्रकार बताया गया:
० सखी सुल्तान **** जती सती तपी।
यह मंत्र सरल होते हुए भी अत्यंत प्रभावशाली माना गया है, और इसे तंत्र क्षेत्र में पहली बार इस चैनल पर सार्वजनिक किया गया बताया गया।
साधना की संपूर्ण विधि
अवधि और स्थान
यह साधना *41 दिनों* तक की जाती है। इसमें माला के प्रकार को लेकर कोई विशेष बंधन नहीं है — कोई भी माला इस्तेमाल की जा सकती है। साधना करते समय मुख की दिशा *पूर्व* की ओर रखनी चाहिए, और आसन के लिए भी कोई विशेष प्रकार अनिवार्य नहीं बताया गया — कोई भी आसन प्रयोग किया जा सकता है।
दीपक और सामग्री
– साधना के समय अपने सामने *सरसों के तेल का दीपक (चिराग)* जलाना है।
– एक *नई सरसों के तेल की बोतल* भी दीपक के सामने रखनी है, जो साधना पूरी होने तक वहीं बनी रहेगी।
– *गुलाब का इत्र* शीशी में भरकर पास रखना है।
– *चार कड़े* (किसी भी धातु के, अपने साइज़ के अनुसार) लेकर उन्हें पानी में डुबोकर रखना है — यह प्रक्रिया पूरे 41 दिनों तक चलती रहेगी, जब तक साधना जारी है।
भोग
साधना के *पहले दिन और आखिरी दिन* दो लड्डुओं का भोग अर्पित करना है। इसके साथ ही थोड़े से पीले चावल भी बनाकर रखने हैं — यदि पीले चावल बनाना संभव न हो, तो गुड़ के चावल भी बनाए जा सकते हैं।
जाप विधि
साधना पर बैठने से पहले *गुरु मंत्र* और *आसन मंत्र* का जाप करना अनिवार्य है। इसके बाद इस साधना की न्यूनतम *21 या 31 माला* करनी चाहिए, हालांकि 31 माला जीवन भर के लिए अधिक प्रभावी बताई गई और इसे प्राथमिकता दी गई है।
सिद्धि के बाद का अनुभव
जब यह साधना सिद्ध हो जाती है, तो सखी सुल्तान साधक के सामने या स्वप्न में प्रकट होते हैं। उनका स्वरूप इस प्रकार बताया गया — सिर पर पहलवानों वाली पगड़ी (जैसे प्रसिद्ध पहलवान दारा सिंह पहनते थे) और कमर पर लंगोट बंधा हुआ। वे साधक को आशीर्वाद स्वरूप वही वचन देते हैं जो साधना का उद्देश्य है — शरीर सशक्त होगा और साधक पूर्ण रूप से पहलवान बन जाएगा।
बताया गया कि इस साधना को सिद्ध करने के बाद साधक इतना बलशाली हो जाता है कि वह कभी भी दंगल में पराजित नहीं होगा। उसमें इतनी शक्ति आ जाएगी कि वह 40-50 व्यक्तियों को भी गुड्डे-गुड़ियों की तरह उठाकर फेंकने में सक्षम हो जाएगा। जब भी साधक इस मंत्र को याद करेगा, यह शक्ति सक्रिय हो जाएगी।
किनके लिए विशेष रूप से लाभकारी
यह साधना विशेष रूप से *पहलवानों और बॉडी बिल्डरों* के लिए बताई गई है, जिन्हें अत्यधिक शारीरिक बल की आवश्यकता होती है। साथ ही, यह उन आधुनिक युवाओं के लिए भी वरदान स्वरूप बताई गई जो फास्ट फूड और गलत आदतों के कारण शारीरिक रूप से कमजोर हो चुके हैं।
रोगों और जोड़ों के दर्द में लाभ
चर्चा में यह भी बताया गया कि यदि किसी व्यक्ति के शरीर के जोड़ों में दर्द रहता हो और डॉक्टरों ने भी इलाज को लेकर निराशा जता दी हो, तो यह साधना उपयोगी सिद्ध हो सकती है। साधना सिद्ध होने के बाद जो सरसों का तेल दीपक के सामने रखा गया था, उससे शरीर की मालिश करनी है। इससे जोड़ों का दर्द पूर्ण रूप से समाप्त हो जाता है।
जब यह सिद्ध तेल नियमित रूप से शरीर पर लगाया जाता है, तो शरीर धीरे-धीरे वज्र के समान बनता जाता है। इसे आज के समय के लिए एक वरदान के समान साधना कहा गया है, क्योंकि यह दवाइयों पर निर्भरता को भी कम कर सकती है।
वृद्ध व्यक्तियों और बुजुर्गों के लिए
यह साधना केवल युवाओं तक सीमित नहीं है। बताया गया कि 40 वर्ष से अधिक आयु के व्यक्ति भी इसे कर सकते हैं। जो बुजुर्ग अपने शरीर की मालिश इस सिद्ध तेल से करते हैं, उनकी जोड़ों की दर्द जैसी समस्याएं और बिस्तर से जुड़ी शारीरिक कमजोरियां भी दूर हो सकती हैं।
तांत्रिक बाधाओं में सहायक
यह भी बताया गया कि यदि किसी व्यक्ति के शरीर पर किसी नकारात्मक या गंदी तांत्रिक शक्ति का प्रभाव (पहरा) हो, और इस सिद्ध तेल से उसकी मालिश की जाए, तो वह प्रभाव भी समाप्त हो जाता है। इस प्रकार यह साधना केवल शारीरिक बल प्रदान करने तक सीमित नहीं, बल्कि तांत्रिक बाधाओं को दूर करने में भी सक्षम मानी गई है।
भूख और पाचन शक्ति पर प्रभाव
एक अन्य विशेषता यह बताई गई कि यदि साधक किसी भोजन पर यह मंत्र पढ़कर उसे ग्रहण करे, तो उसकी भूख पहलवानों की तरह बढ़ जाती है और वह अधिक मात्रा में भोजन करने लगता है। इसके साथ ही यह मंत्र पाचन शक्ति को भी सुदृढ़ करता है।
मिर्गी के दौरे में सहायक
चर्चा में यह भी बताया गया कि यदि किसी व्यक्ति को मिर्गी के दौरे पड़ते हों, तो इस साधना से सिद्ध किया हुआ तेल उस व्यक्ति को देने पर यह समस्या भी नियंत्रित हो सकती है।
कड़ों का उपयोग
साधना के दौरान पानी में डुबोकर रखे गए चार कड़ों को 41 दिन पूर्ण होने के बाद अपने *दाहिने हाथ* में धारण करना है। इसके पश्चात साधक को अपनी वर्जिश (व्यायाम) और पहलवानी अभ्यास आरंभ करना चाहिए, जिससे उसे स्वयं अपनी बढ़ी हुई शक्ति का एहसास होगा।
निष्कर्ष
सखी सुल्तान साधना एक ऐसी विशेष तांत्रिक विद्या है, जो साधक को पहलवानों जैसा बलशाली और वज्र समान शरीर प्रदान करती है। यह साधना सागरनाथ जी के गुरुदेव की अपनी अनुभवसिद्ध साधना रही है, जिन्होंने इसे कुश्ती और पहलवानी के अभ्यास के दौरान स्वयं सिद्ध किया था।
इस चर्चा में इसका मंत्र, 41 दिन की साधना विधि — जिसमें सरसों के तेल का दीपक, चार कड़े, गुरु मंत्र और आसन मंत्र का जाप, तथा भोग सामग्री शामिल है — विस्तार से बताई गई। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि यह साधना न केवल शारीरिक बल बढ़ाने में सक्षम है, बल्कि जोड़ों के दर्द, तांत्रिक बाधाओं, भूख और पाचन संबंधी समस्याओं तथा मिर्गी जैसे दौरों में भी सहायक सिद्ध हो सकती है।
यह साधना विशेष रूप से पहलवानों, बॉडी बिल्डरों, आधुनिक जीवनशैली से कमजोर हो चुके युवाओं, तथा वृद्ध व्यक्तियों के लिए भी उपयुक्त बताई गई है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह प्राचीन विद्या आज के समय में भी शारीरिक स्वास्थ्य और बल प्राप्ति के लिए एक वरदान के समान मानी जा सकती है।
