मेनका अप्सरा साधना: विश्वामित्र ऋषि की सिद्ध की हुई दिव्य विद्या

परिचय

mythologynath.com पर आज हम एक और अद्भुत और प्राचीन रहस्यमय साधना पर चर्चा करेंगे — *मेनका अप्सरा साधना*। अप्सराओं का उल्लेख हमारे धार्मिक ग्रंथों में अक्सर मिलता है। विश्वामित्र जी के संबंध में यह चर्चा प्रसिद्ध है कि उन्होंने मेनका के साथ विवाह किया और उनसे एक पुत्री उत्पन्न हुई, जिसका नाम शकुंतला था।

आज की चर्चा में यह बताया जाएगा कि अप्सराओं से किस प्रकार विवाह होता है और उनके साथ आगे कैसे घर-गृहस्थी बसाई जाती है। इस विषय पर विस्तार से बात करने के लिए एक बार फिर सागरनाथ जी और रुद्रनाथ जी उपस्थित हुए हैं।

अप्सरा साधना का उद्देश्य

अप्सरा साधना मुख्य रूप से सौंदर्य की प्राप्ति, आकर्षण, सर्व रोगों के नाश और शरीर में 16-17 वर्ष की युवती जैसा जोश भरने के लिए की जाती है। इससे पहले भी अप्सरा साधना से संबंधित कई साधनाएं इस श्रृंखला में दी जा चुकी हैं। आज इसी श्रृंखला में *मेनका अप्सरा साधना* प्रस्तुत की जा रही है, जो विश्वामित्र जी की प्रिय अप्सरा साधना रही है।

मेनका और विश्वामित्र का संबंध

बताया गया कि जब विश्वामित्र जी तपस्या कर रहे थे, तब मेनका उनकी तपस्या भंग करने के लिए स्वर्ग से आई थीं। लेकिन विश्वामित्र जी ने बाद में मंत्रों की रचना करके उन्हें अपने वश में बांध लिया, ताकि वे उन्हें अपने शिष्यों को आगे प्रदान कर सकें। इसके लिए उन्होंने विशेष मंत्र विज्ञान की रचना की, और बाकी सभी मंत्रों को उन्होंने कीलित कर दिया, ताकि कोई अन्य व्यक्ति इन्हें बिना उनकी अनुमति के सिद्ध न कर सके।

केवल वही मंत्र इस साधना को सिद्ध कर सकता है, जो स्वयं विश्वामित्र जी द्वारा सिद्ध और प्रदत्त हो। यही मंत्र आज इस वीडियो में प्रदान किया जा रहा है, जो सिद्ध भी होगा, कार्य भी करेगा और मेनका अप्सरा को प्रत्यक्ष भी करेगा।

ग्रंथ का स्रोत

यह मंत्र और साधना हिमालय के एक सिद्ध योगी के शिष्य के माध्यम से प्राप्त हुई है, जो एक पौराणिक ग्रंथ के रूप में हस्तलिखित थी — *अष्टगंध स्याही* से *भोजपत्र* पर लिखी गई। अष्टगंध एक अत्यंत कीमती स्याही मानी जाती है, जिसमें आठ प्रकार की सामग्रियां मिलाई जाती हैं। आज के समय में यह सामग्री शुद्ध रूप में प्राप्त करना बहुत बड़ी बात मानी जाती है, और इस प्रकार भोजपत्र पर ग्रंथ लिखना प्राचीन ऋषि-मुनियों की अद्भुत कलाकारी का प्रमाण है।

यह ग्रंथ हिमालय के योगी के शिष्य से आदान-प्रदान के रूप में प्राप्त हुआ — उन्हें कुछ शाबर मंत्र दिए गए, और बदले में यह साधना प्राप्त हुई। इस ग्रंथ में बताया गया है कि योगी दो प्रकार के होते हैं — एक हठ योगी, जो हठ करते-करते भी परमात्मा को नहीं पा सकते, और दूसरे वे योगी जिन्होंने परमात्मा को भी पाया और साथ ही अप्सरा भी सिद्ध की। इस ग्रंथ के रचयिता योगी ने एक को छोड़कर चार-चार अप्सराओं को एक साथ सिद्ध किया हुआ था।

साधना का प्रभाव: एक शिष्या का अनुभव

चर्चा में नागपुर की एक शिष्या का अनुभव साझा किया गया, जिसने रुद्रनाथ जी से दीक्षा लेकर अप्सरा साधना की थी। मात्र सात-आठ दिन साधना करने के बाद ही उसमें अद्भुत आकर्षण उत्पन्न हो गया। एक पार्टी में जाने पर बहुत सारे लोग उसकी ओर आकर्षित हो गए, और एक लड़के ने उसे प्रपोज भी कर दिया और काफी समय तक उसके पीछे पड़ा रहा। यह देखकर वह स्वयं हैरान थी, क्योंकि उसके साथ पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था। यह स्पष्ट किया गया कि यह अप्सरा साधना के सौंदर्य-प्रभाव का परिणाम था।

यह भी बताया गया कि इस साधना में *16 उपचार पूजा* होती है, जिसमें 16 प्रकार की सामग्रियां प्रयोग की जाती हैं, और मंत्रों के माध्यम से आवाहन करने पर ही अप्सरा स्थापित होती है। इस पर टिप्पणी की गई कि आजकल कई तथाकथित गुरु बिना उचित विधि जाने ही मंत्र बांट देते हैं, जिनका कोई वास्तविक आधार नहीं होता।

शारीरिक और आध्यात्मिक प्रभाव

बताया गया कि साधना के इक्कीस दिनों के भीतर ही शरीर के सारे रोग समाप्त होने लगते हैं और त्वचा 17-18 वर्ष की युवती जैसी हो जाती है। जितना अधिक साधक इसके साथ क्रिया करता जाता है, उतना ही सौंदर्य और निखार बढ़ता है। यह विशेष रूप से रेखांकित किया गया कि सामान्य मानव संबंध में तेज (ऊर्जा) की क्षति होती है, जबकि अप्सरा के साथ रति क्रिया करने से साधक का तेज उल्टा बढ़ता जाता है।

सिद्धि प्राप्त होने के बाद साधक के शरीर से गुलाब के इत्र जैसी सुगंध स्वतः आने लगती है। एक साधक का उदाहरण दिया गया, जो जब बस में यात्रा करता था, तो बस कंडक्टर तक उससे पूछ बैठता था कि उसने कौन सा परफ्यूम लगाया है, क्योंकि पूरी बस उसकी खुशबू से महक उठती थी।

धन, ऐश्वर्य और आनंदमय जीवन

चर्चा में बताया गया कि यह साधना केवल सौंदर्य ही नहीं, बल्कि धन, ऐश्वर्य और वैभव भी प्रदान करती है। साधक का जीवन राजा की भांति व्यतीत होता है। इस संदर्भ में *महाकवि कालिदास* का उदाहरण दिया गया, जो एक राज पुरुष की भांति जीवन जीते थे, और *राजा भोज* का भी उल्लेख हुआ, जिन्हें यह आभास था कि कालिदास के पास कोई विशेष रहस्य है। राजा भोज ने जिद करके यह रहस्य जानने का प्रयास किया, जिसके बाद उन्हें अप्सरा के दर्शन कराए गए थे।

यह साधना जीवन को पूर्ण रूप से बदल देने वाली बताई गई — “जो सोचोगे वही पाओगे, जो खर्चोगे उससे दोगुना पाओगे, जो भोगोगे उससे दोगुना और भोगोगे।” रति क्रिया से न केवल आनंद प्राप्त होता है, बल्कि चेहरे पर तेज और ओरा भी बढ़ता है, और पूर्व की गई साधनाएं खंडित नहीं होतीं। इन्हें *देव कन्या* कहा जाता है क्योंकि ये स्वर्ग में निवास करती हैं।

पत्नी या प्रेमिका — कैसे सिद्ध करें

यह स्पष्ट किया गया कि इस साधना में केवल दो विकल्प होते हैं — या तो अप्सरा को पत्नी रूप में सिद्ध किया जाए या प्रेमिका रूप में। इसे मां-बहन के रूप में सिद्ध नहीं किया जा सकता। जिनका पहले से विवाह हो चुका है, वे इसे प्रेमिका रूप में करें, और जो युवा अवस्था में अविवाहित हैं, वे इसे सीधे पत्नी रूप में सिद्ध कर सकते हैं।

विश्वामित्र जी का उदाहरण

विश्वामित्र जी, जो ब्रह्म ऋषि कहलाए और अभी भी ब्रह्मलोक में निवास कर रहे हैं, उन्होंने अपने तंत्र बल से मेनका को वश में किया था। तपस्या भंग होने के बाद उन्होंने विचार किया कि वे इसे सदा के लिए अपने पास रखेंगे, और उन्होंने ऐसा किया भी। मेनका पूर्ण यौवन और श्रृंगार के साथ सदैव उनके आश्रम में उनकी सेवा में रहती थी, पत्नी रूप में, जिससे उन्हें पुत्री शकुंतला की प्राप्ति हुई।

यह स्पष्ट किया गया कि इससे विश्वामित्र जी की तपस्या भंग नहीं हुई थी, बल्कि उनकी अर्जित ऊर्जा स्थिर बनी रही और समय के साथ बढ़ती गई। जो लोग यह भ्रम फैलाते हैं कि अप्सरा सिद्धि से तपोबल नष्ट हो जाता है, उन्हें अज्ञानी और बिना गुरु के फ्री का ज्ञान बांटने वाला बताया गया।

यह भी बताया गया कि सिद्ध साधक के लिए वचन लेना आवश्यक है — साधक जो भी इच्छा करे, अप्सरा उसे उसी समय पूरा कर देती है, चाहे वह भोजन हो, आभूषण हो, वस्त्र हो, बल हो या ज्ञान — जो भी साधक मांगेगा, उसकी क्षमता से दोगुना प्रदान करेगी।

साधना की विधि

समय और अवधि

– यह साधना *शुक्ल पक्ष* में, *शुक्रवार* के दिन आरंभ की जाती है।
– साधना की अवधि *49 दिन* (जिसे “उन्नचास” या हिंदी में “50” भी कहा जाता है) होती है।
– प्रतिदिन रात्रि में *100 माला* का जाप करना है।

वस्त्र और आसन

– साधक को *पीले या लाल वस्त्र* धारण करने हैं।
– आसन भी *पीला या लाल* होना चाहिए।
– गुलाब का इत्र स्वयं पर लगाना और पास में भी रखना है।
– प्रतिदिन गले में फूलों की माला धारण करनी है — गुलाब या गेंदे की फूल की माला चलेगी।

दीपक और सामग्री

– *देसी घी और गाय के घी* का दीपक जलाना है, कुल *दो दीपक* — एक अप्सरा मेनका के नाम पर, दूसरा विश्वामित्र ऋषि के नाम पर।
– गुलाब की अगरबत्ती जलानी है।
– भोजन दिन में दो बार सात्विक ही करना है।
– यदि संभव हो तो एक अलग कमरे में साधना करनी चाहिए।

कमरे की शुद्धि

साधना से एक दिन पहले कमरे को सर्फ से अच्छी तरह धोना अनिवार्य बताया गया, और गंगाजल में फूल का इत्र मिलाकर पोंछा लगाना है। इसके साथ ही कमरे के चारों कोनों में इत्र छिड़कना भी आवश्यक है।

आज्ञा लेने की प्रक्रिया

साधना आरंभ करने से *एक दिन पहले, ब्रह्म ऋषि विश्वामित्र जी से अनुमति लेनी आवश्यक है, क्योंकि वे स्वयं मेनका तंत्र की रचना करने वाले जनक हैं। इसके लिए उनके मंत्र की कम से कम **51 माला* (या 100 माला) करनी होती है:

० ॐ विश्वामित्र ऋषि स्वाहा।

इसके बिना यह साधना सिद्ध नहीं होगी। साथ ही, गुरु मंत्र, भैरव मंत्र और शिव मंत्र भी अनिवार्य रूप से करने होंगे — भैरव मंत्र इसलिए क्योंकि उनके क्रोध से सुरक्षा आवश्यक है, और शिव मंत्र इसलिए क्योंकि वे महागुरु माने जाते हैं। शिव जी का एक विशेष शाबर मंत्र भी बताया गया, जो पहले कभी सार्वजनिक नहीं किया गया।

मेनका अप्सरा का मंत्र

साधना का मुख्य मंत्र, जो ब्रह्म ऋषि विश्वामित्र के मुख से उच्चारित हुआ और पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्राप्त हुआ, इस प्रकार है:

० ॐ सौंदर्यमयी ** फट्।

इस मंत्र की प्रतिदिन कम से कम *100 माला* जपनी है, बिना टालमटोल किए। बताया गया कि जब यह मंत्र पढ़ा जाता है, तब आसपास एक विशेष शक्ति और सकारात्मक ऊर्जा (पॉजिटिव वाइब) महसूस होने लगती है।

अप्सरा का प्रत्यक्ष होना

साधना के *21 दिनों के भीतर* मेनका अप्सरा पूर्ण यौवन और श्रृंगार के साथ साधक के समक्ष प्रत्यक्ष प्रकट होती है। वह साधक से पूछती है कि उसे किस उद्देश्य से बुलाया गया है और वह क्या चाहता है, और वचन लेने के लिए कहती है। इस समय साधक को उससे वचन लेना होता है — पत्नी या प्रेमिका रूप में साथ रहने का, अपने जीवन के कष्टों को समाप्त करने का, धन और ऐश्वर्य प्रदान करने का। जिसकी युवावस्था समाप्त हो चुकी है, उसकी वह भरपाई कर देती है और दिव्य रसायन भी प्रदान करती है।

प्रशिक्षण और दीक्षा की आवश्यकता

चर्चा में स्पष्ट रूप से बताया गया कि बिना उचित प्रशिक्षण और दीक्षा के यह साधना सिद्ध नहीं हो सकती। इसके लिए यंत्र की प्राण-प्रतिष्ठा, माला जपने की विधि और आसन लगाने की सही प्रक्रिया आवश्यक है, जो केवल दीक्षा के माध्यम से ही सिखाई जाती है। इच्छुक साधक संपर्क करके ट्रेनिंग और दीक्षा प्राप्त कर सकते हैं, उसके बाद ही इस साधना को आरंभ करना चाहिए।

निष्कर्ष

मेनका अप्सरा साधना एक अत्यंत प्राचीन, उच्च स्तर की और शक्तिशाली साधना है, जिसे स्वयं ब्रह्म ऋषि विश्वामित्र जी ने सिद्ध किया था और अपने शिष्यों को आगे प्रदान किया। यह साधना सौंदर्य, आकर्षण, रोगनाश, धन-ऐश्वर्य और आनंदमय जीवन प्रदान करने में सक्षम मानी गई है। इस चर्चा में इसका इतिहास, हस्तलिखित ग्रंथ का स्रोत, एक शिष्या का व्यक्तिगत अनुभव, विश्वामित्र-मेनका की पौराणिक कथा, तथा साधना की संपूर्ण विधि — मंत्र, दिशा, अवधि, वस्त्र, दीपक, भोग सामग्री और आज्ञा-प्रक्रिया — विस्तार से बताई गई।

साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि यह साधना हर वर्ग के व्यक्ति के लिए उपयुक्त है — लड़का, लड़की, वृद्ध व्यक्ति, विवाहित या अविवाहित — सभी इसे अपनी परिस्थिति के अनुसार पत्नी या प्रेमिका रूप में सिद्ध कर सकते हैं। परंतु इसकी सफलता के लिए उचित गुरु दीक्षा, प्रशिक्षण और विधिवत प्रक्रिया का पालन आवश्यक बताया गया, जिसके बिना यह साधना सिद्ध नहीं हो सकती।

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