उर्वशी अप्सरा साधना: उर्वशी अप्सरा को प्रेमिका या पत्नी रूप में सिद्ध करने की विधि

परिचय

Mythologynath.com पर आज की इस विशेष चर्चा में विषय है — उर्वशी अप्सरा साधना। तीन प्रमुख अप्सराओं में — मेनका, रंभा और उर्वशी — उर्वशी को प्रथम स्थान प्राप्त है और इन्हें प्रधान अप्सरा कहा गया है। इस चर्चा में सागरनाथ जी के साथ रुद्रनाथ जी भी जुड़े हुए हैं, और आज विषय है कि उर्वशी को प्रेमिका या पत्नी रूप में कैसे सिद्ध किया जाए।

उर्वशी की उत्पत्ति की कथा

उर्वशी भगवान नारायण की जांघों से उत्पन्न हुई हैं, इसीलिए इनका नाम उर्वशी पड़ा। इनकी उत्पत्ति के पीछे एक रोचक कथा है — इंद्र को अपनी सभा की अप्सराओं की सुंदरता पर अहंकार हो गया था, कि उनसे सुंदर कोई नहीं है। जब मेनका अप्सरा भेजी गई, तो वह भी अपनी सुंदरता पर गर्व करने लगी। इस अहंकार को समाप्त करने के लिए नर-नारायण ने अपनी जांघों से उर्वशी को उत्पन्न किया, जिसे देखकर स्वयं इंद्र भी मोहित हो गए।

तमोगुणी स्वभाव

चूंकि उर्वशी जांघों से उत्पन्न हुई हैं, इसलिए इनके भीतर तमोगुणी तत्व पाया जाता है — जिसमें अहंकार, काम और क्रोध प्रमुख हैं। यह अत्यंत गर्म स्वभाव की मानी जाती हैं — यदि रुष्ट हो जाएं तो तुरंत श्राप दे सकती हैं, और यदि प्रसन्न हो जाएं तो अत्यंत शीघ्रता से प्रेम भी करती हैं।

महाभारत काल का उदाहरण

महाभारत काल में जब अर्जुन स्वर्गलोक में राजा इंद्र के पास गए, तब उर्वशी अर्जुन पर मोहित हो गई थीं और उनसे रति-क्रीड़ा की इच्छा प्रकट की। अर्जुन ने यह कहते हुए मना कर दिया कि वह उनकी माता समान हैं। इस अस्वीकृति पर उर्वशी ने क्रोधित होकर अर्जुन को नपुंसक होने का श्राप दे दिया — यह घटना उनके तमोगुणी और कामुक स्वभाव का स्पष्ट उदाहरण है।

एक वास्तविक अनुभव — दिल्ली के रणवीर सिंह की कथा

सागरनाथ जी ने एक वास्तविक घटना साझा की। उनके परिचित रणवीर सिंह, जो दिल्ली से हैं, ने अपने गुरु से उर्वशी अप्सरा साधना की दीक्षा ली थी और इसे प्रेमिका रूप में सिद्ध कर रखा था। परंतु उनकी पहले से एक वास्तविक प्रेमिका भी थी, जिससे वे मिलने जाया करते थे।

अप्सरा ने स्पष्ट रूप से मना किया कि वे उस प्रेमिका से मिलने न जाएं, क्योंकि उन्हें इससे दुख होता है। सागरनाथ जी बताते हैं कि यदि प्रेमी की पहले से कोई अन्य प्रेमिका हो, तो अप्सरा इसे बर्दाश्त नहीं करती — कोई भी सच्ची प्रेमिका अपने प्रेमी को किसी अन्य के साथ बांटना स्वीकार नहीं करेगी, और यह तो देव कन्या के रूप में उत्पन्न अप्सरा है।

जब रणवीर सिंह ने दो-तीन बार चेतावनी के बावजूद अपनी वास्तविक प्रेमिका से मिलना जारी रखा, तो उस प्रेमिका का व्यवहार अचानक बदल गया — फोन पर मीठी बातें करने वाली वह लड़की मिलने जाने पर गालियां देने लगी। अंततः अप्सरा ने उसका एक्सीडेंट करवा दिया, जिसमें वह मृत्यु से बाल-बाल बचा। सागरनाथ जी ने उसे स्पष्ट समझाया कि इस साधना को करते हुए यदि पहले से प्रेमिका हो, तो इस चक्कर में न पड़ें — अन्यथा या तो साधक की जान जाएगी या उसकी प्रेमिका की।

रंग-रूप का कोई महत्व नहीं

सागरनाथ जी स्पष्ट करते हैं कि जो लोग सोचते हैं कि उनका काला रंग या साधारण रूप अप्सरा को आकर्षित नहीं कर पाएगा, वह गलत धारणा है। रंग का कोई महत्व नहीं है — भगवान कृष्ण भी श्याम वर्ण के थे, फिर भी गोपियां उन पर मोहित रहती थीं।

इस साधना में जो चीज़ वास्तव में मायने रखती है, वह है साधक का *तेज, आकर्षण, योग बल और तपोबल*। यहां तक कि 60-70 वर्ष का वृद्ध व्यक्ति भी यदि पूर्ण मन और सच्चे प्रेम भाव से यह साधना करे, तो वह इसे सिद्ध कर सकता है। उर्वशी केवल साधक के मन के भाव और उसकी साधना की निष्ठा को देखती है, बाहरी रूप-रंग को नहीं।

उर्वशी का स्वरूप

उर्वशी का नाम स्मरण करते ही 16 से 18 वर्ष की यौवन से भरपूर, अद्भुत सुंदर अप्सरा की छवि सामने आती है। इन्हें इंद्र की सभा की 108 अप्सराओं में सर्वश्रेष्ठ और रानी कहा गया है। इनका शरीर बेल की तरह लचीला है, आंखों में गजब का आकर्षण और सम्मोहन है, और यह संपूर्ण सृष्टि को अपने वश में करने की क्षमता रखती हैं।

इनके पैरों में सदैव घुंघरुओं की ध्वनि गूंजती रहती है, और शरीर से अष्टगंध व स्वर्गिक सुगंधित रसायनों की महक निरंतर आती रहती है, जिससे कोई भी प्राणी मोहित हो जाता है। यह देवता, यक्ष, गंधर्व, किन्नर और मनुष्य — सभी के मन को डावांडोल कर सकती हैं।

मनुष्यों के लिए विशेष रूप से अनुकूल

यह साधना केवल देवताओं के लिए नहीं, बल्कि मनुष्यों के लिए भी अत्यंत अनुकूल मानी गई है, क्योंकि अप्सराएं सदैव मनुष्य शरीर की ओर आकर्षित रहती हैं — क्योंकि मनुष्य शरीर पंच तत्वों से निर्मित है। जो भी व्यक्ति ऊर्जावान, धैर्यवान, योगवान और तपस्वी होगा, अप्सराएं स्वयं उसकी ओर आकर्षित होती हैं।

एक महत्वपूर्ण बात यह भी बताई गई कि सामान्य विवाह की भांति इसमें कोई औपचारिक प्रक्रिया — जैसे देखरेख, बातचीत, तिथि निर्धारण — नहीं होती। यहां केवल गुरु दीक्षा लेकर, उचित मार्गदर्शन में मंत्रों का जाप करने से ही यह जल्द सिद्ध हो जाती है, चाहे इसे प्रेमिका रूप में रखें या पत्नी रूप में।

चिर यौवन की स्वामिनी

उर्वशी अप्सराओं में सर्वश्रेष्ठ इसलिए भी मानी जाती हैं क्योंकि इनका यौवन कभी समाप्त नहीं होता — यह चिरकाल तक 16-18 वर्ष की आयु में ही बना रहता है, जब तक स्वर्ग का अस्तित्व है।

साधना से प्राप्त होने वाले लाभ

सागरनाथ जी उर्वशी साधना से प्राप्त होने वाले लाभों का विस्तार से वर्णन करते हैं:

– साधक सदैव आनंद और उमंग में रहेगा।
– शरीर की समस्त दुर्बलताएं और कमजोरियां जड़ से समाप्त हो जाएंगी।
– बल, वीर्य और ऊर्जा में वृद्धि होगी।
– साधक की समस्त इच्छाएं पूर्ण होंगी।
– शरीर में अद्भुत यौवन का संचार होगा, आंखों में चमक और चेहरे पर तेज बढ़ जाएगा।
– वाणी में इतना खिंचाव आएगा कि लोग स्वयं आकर्षित होकर खिंचे चले आएंगे।

सागरनाथ जी ने अपनी एक शिष्या का उदाहरण दिया, जिसने उर्वशी अप्सरा साधना सिद्ध की थी — एक पार्टी में उसे इतने प्रस्ताव मिलने लगे कि उसे वहां से बचकर निकलना पड़ा, क्योंकि लोग उसकी ओर मक्खियों की तरह आकर्षित हो रहे थे।

उर्वशी का भौतिक स्वरूप

उर्वशी का वक्षस्थल चौड़ा, भुजाएं लंबी और आकर्षक, बाल सुनहरे और कद-काठी लंबी बताई गई है। यह अन्य सभी अप्सराओं में सर्वोपरि मानी जाती हैं।

पुरुरवा और उर्वशी की कथा

इस साधना के महत्व को समझाने के लिए सागरनाथ जी पुरुरवा और उर्वशी की प्रसिद्ध कथा का उल्लेख करते हैं। पुरुरवा एक साधारण मनुष्य थे, जिन्होंने वृद्धावस्था में उर्वशी को सिद्ध किया था। जब उर्वशी प्रत्यक्ष हुईं और पुरुरवा ने उनके गले में माला डाली, तो वे पूर्ण रूप से देव स्वरूप में परिवर्तित हो गए — अर्थात वृद्ध पुरुरवा युवा हो गए।

उर्वशी ने पुरुरवा से वचन लिया कि वे उनकी पत्नी रूप में साथ रहेंगी, और इसके बाद पुरुरवा ने धरती पर अपना संपूर्ण राज्य स्थापित किया, जिसमें धन-धान्य की अपार बरकत थी।

अन्य महापुरुषों के उदाहरण

सागरनाथ जी बताते हैं कि आदि गुरु शंकराचार्य के शिष्य पद्मपाद को भी उर्वशी अप्सरा से इतना अधिक धन-वैभव प्राप्त हुआ कि वे समृद्ध व्यक्तियों में गिने जाने लगे। इसके अतिरिक्त विश्वामित्र जी के शिष्यों — भूरी श्रवा गंधर्व, चित्रसेन गंधर्व, देव मिश्र और रत्न प्रभा — ने भी इस साधना को सिद्ध किया था।

मंत्र की उत्पत्ति

सागरनाथ जी बताते हैं कि यह मंत्र उन्हें एक योगी के शिष्य से प्राप्त हुआ था, जो अष्टगंध से रचित एक हस्तलिखित ग्रंथ के रूप में था। इस ग्रंथ में उर्वशी, मेनका और रंभा — तीनों को एक साथ सिद्ध करने की विधि दी गई थी। यह अत्यंत प्राचीन मंत्र है, जो सामान्यतः कहीं और उपलब्ध नहीं है।

साधना विधि

साधना का आरंभ

यह साधना शुक्ल पक्ष के शुक्रवार से आरंभ करनी है और 49 दिनों (एक कम पचास) तक चलनी है।

आवश्यक सामग्री

– घी का दीपक
– उर्वशी यंत्र की स्थापना
– आसन — पीला या लाल रंग
– वस्त्र — लाल या पीले रंग के
– गुलाब या गेंदे के फूलों का हार, जिसे सदैव पास रखना है
– कपड़ों और यंत्र पर गुलाब का इत्र छिड़कना है

माला

माला स्फटिक की होनी चाहिए — यदि उपलब्ध न हो तो प्रदान करवाई जाती है। प्रतिदिन कम से कम 100 या 101 माला, अधिमानतः 108 माला, जप करनी है।

प्रथम चरण — भगवान विष्णु की आज्ञा

साधना आरंभ करने से एक दिन पहले भगवान विष्णु से आज्ञा लेनी आवश्यक है, अन्यथा यह साधना सिद्ध नहीं होगी। इसके लिए 51 माला जप करनी है।

शाबर मंत्र (भगवान विष्णु)

० ओम ** सतनाम

वैदिक मंत्र (वैकल्पिक)

० ओम ** वासुदेवाय

इनमें से कोई भी एक मंत्र चुनकर घी का दीपक जलाकर, सामने उर्वशी यंत्र रखकर, 51 माला जप करनी है। इसके लिए मंडप की स्थापना विधि दीक्षा लेने वाले शिष्य को अलग से बताई जाती है।

द्वितीय चरण — गुरु मंत्र और भैरव मंत्र

भगवान विष्णु से आज्ञा प्राप्त होने के बाद, इसमें गुरु मंत्र और भैरव मंत्र भी जोड़ने आवश्यक हैं।

भैरव मंत्र

० भैरव **** महाकाल

इसका उद्देश्य यह है कि यदि उर्वशी उग्र स्वभाव में साधक को परेशान करने का प्रयास करे, तो भैरव उसे शांत कर देंगे, जिससे वह सौम्य स्वभाव में साधक के पास आएगी और उसकी बात मानेगी।

गुरु मंत्र इस चर्चा में साझा नहीं किया गया है, क्योंकि सागरनाथ जी बताते हैं कि इसे सार्वजनिक करने से अन्य लोग बिना अनुभव के इसकी नकल करना शुरू कर देंगे। यह केवल दीक्षा लेने वाले शिष्यों को ही प्रदान किया जाता है।

मुख्य मंत्र — उर्वशी को आवाहन

सागरनाथ जी विशेष रूप से इस बात पर ज़ोर देते हैं कि मंत्र का सही उच्चारण अत्यंत महत्वपूर्ण है — गलत उच्चारण से यह साधना सिद्ध नहीं होती। सही मंत्र इस प्रकार है:

० ओम **** स्वाहा

सागरनाथ जी स्पष्ट करते हैं कि कई साधक इसे केवल “ओम श्री उर्वशी अगच्छ स्वाहा” के रूप में गलत उच्चारित करते हैं, जिस कारण उनकी साधना असफल हो जाती है। सही मंत्र में “अगच्छ” के बाद “गच्छ स्वाहा” भी जोड़ना आवश्यक है।

बांधने की विधि

यदि उर्वशी साधक के समक्ष प्रकट हो जाए, तो उसे नियंत्रित करने और वचनों में बांधने के लिए भैरव मंत्र का प्रयोग किया जाता है। यह विधि केवल एक योग्य गुरु ही बता सकता है — बिना उचित मार्गदर्शन के यह जानकारी न होने पर साधक इसे सही तरीके से नहीं कर पाएगा, ठीक वैसे ही जैसे बिना सही चाबी के कोई ताला नहीं खोला जा सकता।

प्रत्यक्षीकरण की अवधि

सागरनाथ जी बताते हैं कि यह साधना कम से कम दो सप्ताह के भीतर प्रत्यक्ष हो जाती है। साधक जहां भी बैठा हो — एकांत में या कमरे में — उर्वशी वहां प्रकट होकर संवाद करना शुरू कर देगी। वह कभी नृत्य करेगी, कभी गायन करेगी, और विभिन्न प्रकार के भावों का प्रदर्शन करेगी।

साधना पूर्ण करने का महत्व

एक महत्वपूर्ण नियम यह है कि भले ही उर्वशी से वचन प्राप्त हो जाएं और वह स्वयं भी साधना बीच में छोड़ने को कहे, फिर भी साधक को यह साधना 49 दिनों तक पूर्ण करनी है। जब यह पूर्ण रूप से सिद्ध हो जाएगी, तो साधक की समस्त मनोकामनाएं चुटकियों में पूर्ण होंगी — ठीक वैसे ही जैसे पुरुरवा ने अपना जीवन तसल्ली और समृद्धि के साथ जिया।

निष्कर्ष

उर्वशी अप्सरा साधना नाथपंथ की एक अत्यंत प्राचीन और प्रभावशाली विद्या है, जो साधक को धन, ऐश्वर्य, यौवन और आनंदमय जीवन प्रदान करने में सक्षम मानी जाती है। इस चर्चा से हमें निम्न महत्वपूर्ण बातें ज्ञात होती हैं:

– उर्वशी तमोगुणी स्वभाव की देव कन्या हैं, इसलिए साधक को पहले से किसी अन्य प्रेम संबंध से बचना चाहिए।
– रंग-रूप का कोई महत्व नहीं — केवल तपोबल, योग बल और सच्ची निष्ठा ही मायने रखती है।
– साधना 49 दिनों तक, शुक्ल पक्ष के शुक्रवार से आरंभ करके, निर्धारित सामग्री और मंत्रों के साथ करनी होती है।
– साधना से पहले भगवान विष्णु की आज्ञा और साथ में गुरु मंत्र व भैरव मंत्र का प्रयोग अनिवार्य है।
– मंत्र का सही उच्चारण अत्यंत महत्वपूर्ण है, अन्यथा साधना असफल हो सकती है।
– पुरुरवा, पद्मपाद और विश्वामित्र के शिष्यों जैसे महापुरुषों ने इस साधना को सिद्ध कर धन-वैभव प्राप्त किया था।

अंततः सागरनाथ जी का यह स्पष्ट संदेश है कि जब हमारे महान ऋषि-मुनियों ने यह साधना की है, तो सच्ची निष्ठा और उचित गुरु मार्गदर्शन के साथ आज का साधक भी इसे सिद्ध कर अपने जीवन को समृद्ध और आनंदमय बना सकता है।

राम राम। जय माता की।

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