विचित्रा यक्षिणी सिद्धि साधना: सर्व मनोरथ पूर्ण करने वाली दिव्य यक्ष कन्या

परिचय

Mythologynath.com पर आज की इस विशेष चर्चा में विषय है — विचित्रा यक्षिणी साधना। विचित्रा यक्षिणी एक अत्यंत प्राचीन और रहस्यमय अप्सरा-यक्षिणी मानी जाती है, जो साधक के समस्त कार्यों को सिद्ध करने और उसकी सभी मनोकामनाओं को होली की तरह पूर्ण करने में सक्षम है।

इस चर्चा में सागरनाथ जी के साथ रुद्रनाथ जी भी जुड़े हुए हैं। रुद्रनाथ जी बताते हैं कि पहले प्रसारित यक्षिणी साधना संबंधी वीडियो को दर्शकों ने बहुत पसंद किया था, जिस कारण उन्हें भारी मात्रा में कॉल और मेल प्राप्त हुए। दर्शकों ने यह जिज्ञासा जताई कि उन्हें ऐसी प्राचीन विद्याओं के विषय में जानकारी दी गई जो कहीं और सुनने को नहीं मिलती और लगभग लुप्त हो चुकी हैं। लोगों ने यह भी पूछा कि इन शक्तियों को कैसे सिद्ध किया जाता है — कोई इसे प्रेमिका रूप में सिद्ध करना चाहता है, तो कोई पत्नी रूप में।

इसी मांग को ध्यान में रखते हुए महायक्षिणियों की एक पूरी शृंखला आरंभ की जा रही है, जिसकी शुरुआत विचित्रा यक्षिणी साधना से हो रही है।


विचित्रा यक्षिणी की उत्पत्ति और स्वरूप

सागरनाथ जी बताते हैं कि यक्षिणियां भगवान शंकर और महाशक्ति द्वारा रचित हैं। ये यक्ष स्वरूप हिमालय पर निवास करती हैं — पांच हिमालयों में इनका वास बताया गया है। इनकी नगरी अलकापुरी है, जो अभी भी विद्यमान है परंतु सामान्य दृष्टि से अदृश्य रहती है।

यह साधना पूर्णतः सौम्य और सात्विक है, इसलिए इसे करने में डरने की कोई आवश्यकता नहीं। इसे घर पर ही किया जा सकता है, चाहे साधक इसे पत्नी रूप में सिद्ध करे या प्रेमिका रूप में — यह पूर्णतः साधक की अपनी इच्छा (ओपिनियन) पर निर्भर है। इसे मां या बहन के रूप में भी सिद्ध किया जा सकता है।

जब विचित्रा यक्षिणी साधक के समक्ष प्रकट होती है, तो वह 20 से 25 वर्ष की आयु की एक सुंदर स्त्री के रूप में दिखाई देती है, पूर्ण शृंगार से युक्त।

सागरनाथ जी स्पष्ट करते हैं कि यक्षिणियां भूत-चुड़ैल नहीं हैं, बल्कि देव कन्याएं हैं — बिल्कुल अप्सराओं जैसी दिखने वाली, सात्विक शक्ति की देव स्वरूप। इनके संबंध में फैली भ्रामक अफवाहों पर विश्वास नहीं करना चाहिए।

साधना से प्राप्त होने वाले लाभ

विचित्रा यक्षिणी साधक की निम्नलिखित समस्याओं का समाधान कर सकती है:

– तंत्र क्षेत्र में शक्तियां प्राप्त करना और आगे बढ़ना।
– शत्रुओं का जड़ से नाश करना।
– नौकरी न मिलने की समस्या का समाधान।
– अत्यधिक गरीबी और धन की कमी को दूर करना।
– संतान प्राप्ति में असमर्थता — जहां डॉक्टरों ने भी जवाब दे दिया हो।
– घर में व्याप्त रोग और क्लेश को दूर करना।

सागरनाथ जी बताते हैं कि यह ज्ञान स्वयं भगवान शंकर ने भगवती को यक्षिणी तंत्र की रचना करते समय बताया था — कि कलयुग में जो व्यक्ति डर और भय को मन से निकालकर यक्षिणी को सिद्ध कर लेगा, वह कलयुग में अमृत के समान जीवन जिएगा, अर्थात उसे कोई चिंता-फिक्र और बीमारियां नहीं सतायेंगी।


साधना की पूर्व-आवश्यकताएं

कुबेर की आज्ञा आवश्यक

सागरनाथ जी स्पष्ट करते हैं कि यक्षराज कुबेर की आज्ञा के बिना साधक यक्षिणी की सुगंध तक प्राप्त नहीं कर सकता, दर्शन तो दूर की बात है। इसलिए सबसे पहले कुबेर पूजा करनी आवश्यक है, क्योंकि यक्ष इनके राजा हैं और उनकी आज्ञा के बिना यक्षिणी साधक के पास नहीं भेजी जाएगी।

भैरव और त्र्यंबकम शिव को प्रसन्न करना

इसके साथ-साथ भैरव और त्र्यंबकम शिव को भी प्रसन्न करना आवश्यक है। यह पूरी प्रक्रिया मात्र दो दिनों की है, इसमें घबराने की कोई आवश्यकता नहीं।


मंडप निर्माण और सामग्री

साधना के लिए घर में एक मंडप या मंडल बिछाना होता है, जिसकी विधि दीक्षा लेने वाले साधक को अलग से बताई जाती है — इसमें दुर्गा या लक्ष्मी का चित्र कैसे स्थापित किया जाए और यंत्र कैसे लगाया जाए, यह भी बताया जाता है।

भोग सामग्री

– मीठा पान अर्पित किया जाता है।
– दो लड्डू चढ़ाए जाते हैं।
– एक नारियल चढ़ता है।
– जल में पांच पताशे, पांच लौंग और पांच इलायची मिलाई जाती है।

साधना का दिन

सभी यक्षिणियों की साधना का दिन रविवार या सोमवार होता है, जो शुक्ल पक्ष में पड़ता हो — क्योंकि यह इनके इष्ट देव के वार पर आधारित है।

आवश्यक मंत्र

साधक के पास गुरु मंत्र, रक्षा मंत्र, आसन मंत्र और बांधने वाला मंत्र (कीलन मंत्र) होना आवश्यक है, ताकि यदि यक्षिणी आनाकानी करे तो उसे नियंत्रित किया जा सके। यह मंत्र भी गुरु द्वारा ही प्रदान किया जाता है।


पहला चरण — कुबेर और शिव-भैरव की आराधना

प्रारंभिक विधि

साधना के पहले दो दिनों में साधक को कुबेर और त्र्यंबकम की आज्ञा प्राप्त करनी होती है। पहले दो दिनों में एक मंत्र की 51 माला जप करनी है।

प्रथम दिन का मंत्र

० ओम कुबेराय नमः

० ओम त्रंबकाय नमः

यह यक्षराज कुबेर का मंत्र है। इसकी 51 माला एक ही समय पर, दिन में एक बार करनी है। यदि 51 माला संभव न हो, तो कम से कम 31 माला अवश्य करनी चाहिए, ताकि कुबेर और त्र्यंबकम से आज्ञा मांगी जा सके।

माला का प्रकार

इस साधना में रुद्राक्ष की माला प्रयोग होती है — कोई विशेष माला आवश्यक नहीं। जो साधक चाहें, उन्हें प्राण-प्रतिष्ठित पूरी किट उपलब्ध कराई जाती है।

दूसरे दिन का मंत्र

दूसरे दिन निम्न मंत्र का जाप किया जाता है:

० ओम शिव शक्ति स्वाहा

० ओम भैरवाय स्वाहा

इस दिन भी 51 माला की आवश्यकता नहीं — 31 माला पर्याप्त है।

इस चरण का महत्व

सागरनाथ जी समझाते हैं कि जब साधक कुबेर से आज्ञा मांगता है, तो कुबेर विचित्रा यक्षिणी को भेजते हैं। शिव-शक्ति से उत्पन्न इस यक्षिणी को भैरव बांधकर लाते हैं और उसे सूचित करते हैं कि एक साधक उसकी साधना करने बैठ रहा है, इसलिए उसे हाजिर होकर वचन देने होंगे।


दूसरा चरण — विचित्रा यक्षिणी की मुख्य साधना

मूल मंत्र

० ओम विचित्रे *** कुरु कुरु स्वाहा

सागरनाथ जी बताते हैं कि “कुरु कुरु स्वाहा” वाले मंत्र अत्यंत प्रचंड होते हैं — इनका अर्थ है कि यह मंत्र सीधे कार्य करने वाला मंत्र है, जो सीधे शक्ति को आदेश देता है कि वह तुरंत कार्य करे। यह सतयुग के शाबर मंत्रों में गिना जाता है, जिन्हें आज के समय में सरल भाषा में प्रस्तुत किया जाता है।

साधना की अवधि और विधि

– यह साधना 31 या 41 दिनों की होती है।
– प्रतिदिन 51 माला रुद्राक्ष की माला से जप करनी है।
– यह साधना घर पर बैठकर की जा सकती है।

सामग्री

– शहद, घृत और दूध — इन तीनों को मिलाकर प्रयोग किया जाता है।
– गुलाब के फूल मिलाए जाते हैं।
– एक योनि कुंड बनाना होता है, जिसकी निर्माण विधि दीक्षा लेने वाले साधक को अलग से बताई जाती है — यह ईंटों से भी सामान्य रूप से बनाया जा सकता है।

अंतिम दिन का हवन

जब साधक 51 माला का जाप पूर्ण दिनों तक कर लेता है, तो अंतिम दिन इस योनि कुंड में हवन किया जाता है — इसमें शहद, घृत, दूध और गुलाब के फूलों को मिलाकर आहुतियां दी जाती हैं।


प्रत्यक्षीकरण की प्रक्रिया

सागरनाथ जी बताते हैं कि जब यह साधना सिद्ध हो जाती है, तो यक्षिणी हवन में से प्रकट होती है। यदि हवन में से प्रकट न भी हो, तो साधना के 14 दिनों के भीतर वह साधक के समक्ष प्रत्यक्ष हो जाती है।

धैर्य और अनुशासन का महत्व

यहां एक महत्वपूर्ण चेतावनी दी गई है — भले ही यक्षिणी 14 या 21 दिनों के भीतर प्रकट हो जाए और अपने हाव-भाव व रंग दिखाकर यह जताने का प्रयास करे कि वह सिद्ध हो चुकी है, साधक को साधना बीच में नहीं छोड़नी चाहिए। जब तक यक्षिणी स्वयं अपने मुख से स्पष्ट वचन न दे, तब तक साधना जारी रखनी चाहिए। यदि वह जल्दी वचन देने का प्रयास करे, तो भी साधक को यह कहना चाहिए कि उसके गुरु ने जितने दिन बैठने के लिए कहा है, वह उतने दिन साधना पूर्ण करेगा, और तब तक यक्षिणी को उसके पास ही उपस्थित रहना होगा।

विचित्रा नाम का अर्थ

सागरनाथ जी बताते हैं कि इसे “विचित्रा” इसलिए कहा गया है क्योंकि यह विचित्र-विचित्र रूप धारण करती है। यह साधक के सामने अलग-अलग सुंदर रूपों में प्रकट होती है — भयावह नहीं, बल्कि सौंदर्यपूर्ण रूपों में। यह एक रूप छोड़कर दूसरा, फिर तीसरा रूप धारण करती है, जिससे साधक का मन मोहित होता रहता है।


दांपत्य जीवन में सहायता

सागरनाथ जी विशेष रूप से बताते हैं कि जो लोग अपनी पत्नियों से दुखी हैं, उन्हें यह साधना अवश्य करनी चाहिए — इससे पत्नियों का स्वभाव सुधरता है। जिनके तलाक की स्थिति बन रही है, उनके लिए भी यह साधना सहायक है — यह तलाक रुकवा सकती है और आपसी गलतफहमियों को समाप्त कर सकती है। जिनकी शादी नहीं हो रही, उनके लिए भी यह साधना उपयोगी बताई गई है।

एक विशेष बात यह भी बताई गई कि यह यक्षिणी साधक से खर्चा नहीं मांगती, बल्कि स्वयं साधक की आर्थिक आवश्यकताओं को पूर्ण करती है — जो सामान्य संबंधों से अलग है, जहां आमतौर पर खर्चे की मांग होती है।


आचरण संबंधी नियम

साधना सिद्ध होने के बाद साधक के लिए कुछ महत्वपूर्ण आचरण संबंधी नियम भी बताए गए:

– मांस-मदिरा का सेवन नहीं करना चाहिए।
– गलत रास्तों पर नहीं चलना चाहिए।

सागरनाथ जी सचेत करते हैं कि यदि साधक इन नियमों का उल्लंघन करता है, तो भगवान शंकर द्वारा दिए गए वचनों के अनुसार उसकी सारी सिद्धि समाप्त (जीरो) हो सकती है। जब यक्षिणी साधक को सिद्धि के बाद स्वर्ग के सिंहासन जैसा जीवन प्रदान कर रही हो, तब साधक को उसी अनुशासन में रहना चाहिए, जो गुरुओं ने सिखाया है।


दिशा और अतिरिक्त विधि

साधना की दिशा

सागरनाथ जी बताते हैं कि साधना उत्तर दिशा की ओर मुख करके करनी चाहिए, क्योंकि हिमालय और अलकापुरी दोनों उत्तर दिशा में स्थित हैं।

विशेष ज्योत का महत्व

जो साधक सागरनाथ जी से दीक्षा लेते हैं, उन्हें एक विशेष ज्योत जलाने की सलाह दी जाती है, जिससे साधना शीघ्र सिद्ध होती है। यह ज्योत महाशक्ति की मानी जाती है, जिसमें महाकाल, भगवान शंकर, महाकाली, भैरव, हनुमान जी और सागरनाथ जी की संपूर्ण शक्तियां सम्मिलित रहती हैं। इस ज्योत के प्रभाव से पितृ दोष और कुल देवता संबंधी अशांति भी शांत हो जाती है और पुराने बंधन टूट जाते हैं।

वस्त्र संबंधी नियम

साधना के दौरान लाल, सफेद, पीले या मल्टी-कलर वस्त्र पहने जा सकते हैं। परंतु काले वस्त्र वर्जित हैं, क्योंकि यह साधना शांत और सौम्य प्रकृति की है। सफेद कुर्ता-पजामा भी उपयुक्त माना गया है।

इत्र का प्रयोग

साधना के दौरान इत्र का प्रयोग भी करना चाहिए।


दीक्षा का उद्देश्य

सागरनाथ जी स्पष्ट करते हैं कि दीक्षा की प्रक्रिया केवल जन-कल्याण के उद्देश्य से रखी गई है, न कि किसी व्यावसायिक लाभ के लिए। उनका उद्देश्य है कि घर-घर में उनके शिष्य हों और वे अपने जीवन को संवार सकें। उन्होंने बताया कि आने वाले समय में उनके शिष्यों द्वारा प्राप्त यक्षिणी साधना के अनुभव भी साझा किए जाएंगे।


निष्कर्ष

विचित्रा यक्षिणी साधना नाथपंथ की एक अत्यंत गूढ़ और सात्विक विद्या है, जो साधक की समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण करने में सक्षम मानी जाती है। इस चर्चा से हमें निम्न महत्वपूर्ण बातें ज्ञात होती हैं:

– साधना से पूर्व कुबेर, त्र्यंबकम शिव और भैरव की आराधना आवश्यक है, तभी यक्षिणी की आज्ञा प्राप्त होती है।
– मुख्य साधना 31 या 41 दिनों की होती है, जिसमें प्रतिदिन 51 माला जप और निर्धारित सामग्री का प्रयोग आवश्यक है।
– साधना उत्तर दिशा की ओर मुख करके, रुद्राक्ष माला से, और सफेद/लाल/पीले वस्त्रों में की जानी चाहिए।
– सिद्धि प्राप्त होने पर साधक को अनुशासन और पवित्र आचरण का पालन करना अनिवार्य है, अन्यथा सिद्धि नष्ट हो सकती है।
– यह साधना दांपत्य जीवन की समस्याओं, धन संकट, संतान प्राप्ति और शत्रु-निवारण में विशेष रूप से सहायक मानी गई है।

अंततः यह संदेश स्पष्ट है — सच्ची निष्ठा, धैर्य और गुरु के मार्गदर्शन के साथ की गई यह साधना साधक के जीवन को समृद्ध और सुखमय बना सकती है।

जय श्री महाकाल। राम राम और जय माता की।

Ready to elevate your sadhana? Lets connect!