नवरात्रि की शक्ति साधना: महाकाली का प्रमाणिक शाबर मंत्र
परिचय
Mythologynath.com पर आज की इस विशेष चर्चा में गुरु सागरनाथ जी एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय लेकर आए हैं — महाकाली की नवरात्रों में सिद्ध की जाने वाली सिद्धि साधना का शाबर मंत्र। इस मंत्र के द्वारा साधक अपनी समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण कर सकता है — चाहे शत्रु का नाश करना हो, व्यापार में वृद्धि चाहिए हो, संतान सुख की कामना हो, या विद्या का सुख चाहिए हो। जिनकी संतान नहीं हो रही, उनके लिए भी यह साधना सहायक बताई गई है।
इस विशेष चर्चा में आज दर्शकों की ओर से प्रश्न पूछने के लिए उमेश काकड़े जी भी सागरनाथ जी के साथ जुड़े हुए हैं। यह एक प्रश्नोत्तर सत्र के रूप में प्रस्तुत की गई है, जिसमें साधना की संपूर्ण विधि चरण-दर-चरण साझा की गई है।
नवरात्रि में साधना क्यों फलदाई होती है
सागरनाथ जी बताते हैं कि यह साधना नवरात्रों में विशेष रूप से जल्दी फलदाई होती है और इसकी अमोघ सिद्धि प्राप्त होती है। यह मंत्र कार्य सिद्धि, शत्रु नाश, व्यापार में बरकत, घर में सुख-शांति, और कलह के नाश में सहायक है। जब यह मंत्र नवरात्रों में सिद्ध कर लिया जाता है, तो उसके बाद साधक अपनी हर मनोकामना — विधिपूर्वक जाप और भोग के माध्यम से — मां शक्ति, मां काली से पूर्ण करवा सकता है।
यह मंत्र और विधि 10 महाविद्याओं में पहली महाविद्या मानी जाने वाली महाशक्ति से संबंधित है। सागरनाथ जी स्पष्ट करते हैं कि महाविद्याओं के मंत्र सामान्यतः तांत्रिक या वैदिक रूप में उपलब्ध होते हैं, परंतु शाबर मंत्र बहुत कम उपलब्ध होते हैं। हालांकि नाथपंथ के क्षेत्र में शाबर मंत्र बहुत जल्दी उपलब्ध हो जाते हैं।
शाबर मंत्र की विशेषता
उमेश काकड़े जी ने प्रश्न किया कि वैदिक साधना में जो आवाहन, न्यास, करन्यास, शरण्यास आदि होते हैं, क्या वे शाबर मंत्र में नहीं होते? इस पर सागरनाथ जी ने पुष्टि की कि यह बात बिल्कुल सही है — शाबर मंत्र में इस प्रकार के विस्तृत विधि-विधान की आवश्यकता नहीं होती। साधक जैसे भी उठे, गुरु की देखरेख में जाप करना शुरू कर सकता है और सिद्धि प्राप्त हो जाती है।
साधना का प्रारंभिक क्रम
साधना शुरू करने से पहले एक विशेष क्रम बताया गया:
1. सबसे पहले गुरु मंत्र की एक माला करनी होती है।
2. इसके बाद अपने इष्ट देवी/देवता (जैसे हनुमान जी, दुर्गा मां, भैरव जी — जिसे भी साधक मानता हो) की एक माला करनी होती है।
3. इसके बाद ही महाविद्या साधना (मुख्य साधना) की जाती है।
यह क्रम नौ दिनों तक प्रतिदिन दोहराया जाता है — प्रतिदिन एक माला गुरु मंत्र की और एक माला इष्ट देवी की करनी होती है।
नवरात्रि और शक्ति साधना का महत्व
चर्चा में यह भी बताया गया कि साल में चार नवरात्रि आते हैं — दो गुप्त और दो सामने (प्रकट)। हर महीने में भी एकादशी से अष्टमी तक नवरात्रि जैसी अवधि आती है, परंतु साल में चार प्रमुख नवरात्रि होते हैं। वर्तमान में चैत्र मास के नवरात्र आने वाले हैं, जिन पर यह साधना जन-कल्याण की भावना से साझा की जा रही है।
शक्ति साधना क्यों आवश्यक है
सागरनाथ जी इस प्रश्न पर एक गहन दार्शनिक बिंदु साझा करते हैं — शिव ने स्वयं कहा है कि शक्ति के बिना वे “शव” हैं। शिव शब्द में से यदि एक मात्रा हटा दी जाए, तो वह “शव” बन जाता है — अर्थात एक निष्प्राण मुर्दा, जिसमें कोई जान या प्राण नहीं होते और वह कोई कार्य नहीं कर सकता। परंतु जब उसमें शक्ति (एक मात्रा) जुड़ती है, तो वह शिव बन जाता है। इसीलिए नवरात्रों में शक्ति की साधना करनी चाहिए — शक्ति के बिना कोई भी अपनी इच्छाओं को जीवन में प्राप्त नहीं कर सकता।
उमेश काकड़े जी ने आगे यह बात जोड़ी कि चार नवरात्रों में मां अपने बच्चों को वरदान देने के लिए उतावली रहती हैं, इसलिए सामान्यतः 40 या 41 दिन की साधना को यदि नौ दिनों (नवरात्रि) में किया जाए, तो सफलता के अवसर बहुत बढ़ जाते हैं। सागरनाथ जी ने इस बात की पुष्टि करते हुए कहा कि जो साधक 41 दिन का अनुष्ठान तन-मन से गुरु द्वारा बताई गई विधि के अनुसार पूर्ण कर लेता है, वह अपने जीवन में कोई भी मनोकामना प्राप्त कर सकता है। धरती पर कोई भी शक्ति या देवी-देवता इतना समर्थ नहीं है जो शक्ति के कार्य को रोक सके, क्योंकि सभी देवी-देवता स्वयं शक्ति के अधीन कार्य करते हैं और उसे नमन करते हैं।
साधना विधि — चरण दर चरण
दिशा का चयन
सागरनाथ जी सभी साधनाओं में पूर्व दिशा को प्राथमिकता देते हैं — जहां से सूर्य उदय होता है, नाथपंथ में उसी दिशा को नमन किया जाता है। शक्ति की स्थापना जहां भी की जाए, मंत्र जाप करते समय साधक का मुख पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए। इसके लिए सुबह सूर्योदय देखकर दिशा तय की जा सकती है, या आधुनिक मोबाइल में उपलब्ध मैग्नेटिक कंपास का भी प्रयोग किया जा सकता है।
माला का चयन
इस साधना में रुद्राक्ष की माला प्रयोग होती है। सागरनाथ जी स्पष्ट करते हैं कि माला मूल (ओरिजिनल) हो या डुप्लीकेट, इससे विशेष अंतर नहीं पड़ता — समर्थ गुरु किसी भी माला को सिद्ध कर सकता है। माला 108 मनकों की होनी चाहिए।
माला की लंबाई दो प्रकार से तय की जा सकती है:
– गले में डालने पर छाती तक आने वाली माला, या
– नाभि तक आने वाली माला।
इनमें से कोई भी माप उचित माना गया है।
माला में गांठ लगाना
माला में सुमेरू (मेरु मनका) से नीचे तीन मनकों पर मौली की गांठ लगानी होती है। इसका उद्देश्य दिशा-सूचक के रूप में कार्य करना है — जिससे साधक को यह पता चल सके कि माला किस दिशा से जपनी शुरू की गई थी और वह उल्टी घूम रही है या सीधी। यह जानकारी सामान्यतः उच्च स्तर का गुरु ही ठीक से बता पाता है।
वस्त्र
पूजा के दौरान पहने जाने वाले वस्त्र किसी भी प्रकार के हो सकते हैं, परंतु शर्त यह है कि वे विशेष रूप से पूजा के समय ही पहने जाएं — उन्हें पहनकर बाहर घूमना उचित नहीं। साधना के पहले दिन धुले हुए वस्त्र पहनने चाहिए, और उन्हीं वस्त्रों को कुछ दिनों बाद धोकर पुनः प्रयोग में लाया जा सकता है।
मंत्र
सागरनाथ जी द्वारा बताया गया मंत्र इस प्रकार है:
० ओम काली काली महाकाली ***
****शब्द सांचा पिंड कांचा फुरो मंत्र ईश्वर वाचा
सागरनाथ जी के अनुसार यह मंत्र अपने आप में इतना प्रभावशाली है कि इसे सिद्ध करने के बाद साधक जो भी कार्य मां से मांगेगा, मां उसके बोलने से पहले ही वह कार्य पूर्ण कर देंगी। चाहे साधक सात्विक विधि अपनाए या राजसी, दोनों ही स्थितियों में मां कार्य पूर्ण करती हैं।
साधना की सामग्री — सात्विक विधि
सात्विक विधि के अनुसार निम्न सामग्री की आवश्यकता होती है:
– *5 पानी वाले नारियल* (जिनके ऊपर जूट/छिलका लगा हो, भूरे रंग के)
– *2 मीठे पान*
– *5 जायफल* (बिना छिलके/कवर वाले)
– *11 नींबू*
– *2 लड्डू* (भोग स्वरूप)
पहले दिन यह सारी सामग्री मां शक्ति या दुर्गा के आसन/मंदिर के सामने रख देनी है। नारियलों पर मौली भी बांधनी है।
दैनिक क्रिया
– साधना में 11 माला जाप प्रतिदिन करनी है — पहली नवरात्रि से लेकर आखिरी नवरात्रि तक।
– पांचों नारियल पूरे नवरात्रों के दौरान वहीं आसन के सामने पड़े रहते हैं — इन्हें प्रतिदिन बदलने की आवश्यकता नहीं।
– परंतु पान, जायफल और लड्डू प्रतिदिन बदलने होते हैं। पुरानी सामग्री को उठाकर एक लिफाफे में रख लिया जाता है, और अगले दिन नई सामग्री (दो पान, पांच जायफल, दो लड्डू) रखी जाती है। पुरानी सामग्री को तुरंत विसर्जित नहीं करना — इसे एकत्र करके रखा जाता है।
विसर्जन
सभी दिनों की एकत्रित सामग्री का विसर्जन एक साथ किया जाता है — यह अधिमानतः बहते हुए जल में किया जाए, यदि उपलब्ध न हो तो पीपल के पेड़ के नीचे रखा जा सकता है, या माता के मंदिर/शिवलिंग पर अर्पित किया जा सकता है। नारियल भी इसी के साथ विसर्जित किए जाते हैं।
ज्योत की दिशा
एक स्पष्टीकरण यह भी दिया गया कि दीपक की जो बत्ती (सीधी) होती है, वह देवता की तरफ नहीं, बल्कि साधक की अपनी तरफ होनी चाहिए।
आसन
आसन के विषय में सागरनाथ जी बताते हैं कि इसमें कोई विशेष प्रतिबंध नहीं है — कंबल का आसन भी लगाया जा सकता है, या पूजा स्थल/दुकानों में मिलने वाला सामान्य आसन भी प्रयोग किया जा सकता है। वैदिक परंपरा के पंडित सामान्यतः कुश के आसन को प्राथमिकता देते हैं, परंतु यदि कुश उपलब्ध न हो तो कंबल या सामान्य आसन भी चल सकता है। आसन के रंग का भी कोई विशेष महत्व नहीं है — लाल, पीला, सफेद, कोई भी रंग चल सकता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि साधक कितनी माला जप कर रहा है।
दीपक (ज्योत) की विधि
दीपक घी का हो या तेल का, यह साधक की अपनी श्रद्धा पर निर्भर करता है — इसमें कोई विशेष अंतर नहीं पड़ता। सागरनाथ जी बताते हैं कि वे स्वयं अपने अधिकतर शिष्यों को खप्पर की ज्योत लगाने का सुझाव देते हैं।
खप्पर की ज्योत बनाने की विधि
खप्पर तैयार करने के लिए पूरे नारियल को छीलकर बीच से काटा जाता है, गरी (गिरी) निकाली जाती है, और नारियल के जिस हिस्से में नोक/तीखापन होता है उस भाग से खप्पर तैयार किया जाता है। इसके भीतर कच्ची मिट्टी का दीया रखा जाता है। जो आधा भाग “भिंडी वाला” (सपाट) होता है, उसे उपयोग में नहीं लाया जाता। इस खप्पर के भीतर ही ज्योत जलाई जाती है, चाहे तेल की हो या घी की।
साधना की अवधि — साधक की ऊर्जा पर निर्भर
सागरनाथ जी बताते हैं कि यह साधना नवरात्रों में जल्दी सिद्ध हो जाती है, परंतु यह हर साधक की ऊर्जा पर निर्भर करता है:
– कई साधक 9 दिनों (नवरात्रि) में ही सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं।
– कुछ नए साधकों को 21 दिनों तक साधना करनी पड़ती है।
– कुछ मामलों में साधकों को 41 दिनों तक जाना पड़ा है।
41 दिन को अधिकतम सीमा बताया गया है — इससे आगे जाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। एक बार मंत्र सिद्ध हो जाने के बाद, साधक इससे जितनी बार चाहे कार्य ले सकता है और मां को भोग अर्पित करते हुए अपनी इच्छाएं पूर्ण करवा सकता है।
साधना की सफलता का संकेत — एक अधूरा प्रश्न
चर्चा के अंत में उमेश काकड़े जी ने एक महत्वपूर्ण प्रश्न पूछा — साधक को यह कैसे पता चले कि उसकी साधना सफल हो गई है? क्या मां साधक से कोई वचन मांगती हैं, जैसे तीन वचन? क्या यह स्वप्न में होता है, या ध्यान में इसका आभास होता है? मां किस प्रकार साधक से संवाद (कम्युनिकेट) करती हैं, और साधक को कैसे समझ आए कि मां स्वप्न में आकर आशीर्वाद दे रही हैं?
सागरनाथ जी ने इस प्रश्न को महत्वपूर्ण बताते हुए उत्तर देना आरंभ किया — “बिल्कुल बिल्कुल जो आपने बोला बिल्कुल बेटा सही बोला है, वचन ऐसे होता है बेटा…” — परंतु यहां प्राप्त हो जाता है। वचन की पूर्ण विधि और मां के संवाद करने के तरीकों के विषय में आगे की जानकारी उपलब्ध सामग्री में शामिल नहीं है।
निष्कर्ष
महाकाली की यह नवरात्रि शाबर मंत्र साधना एक अत्यंत प्रमाणिक और नाथपंथ की गूढ़ विद्या है, जिसे विस्तृत विधि-विधान के साथ इस चर्चा में साझा किया गया है। इस साधना से जुड़ी प्रमुख बातें इस प्रकार हैं:
– यह साधना नवरात्रों में शीघ्र फलदाई होती है और सभी मनोकामनाओं की पूर्ति में सहायक मानी जाती है।
– साधना पूर्व दिशा में, रुद्राक्ष की माला से, गुरु और इष्ट देव के मंत्र के बाद ही आरंभ की जाती है।
– निर्धारित सामग्री — नारियल, पान, जायफल, नींबू और लड्डू — के साथ प्रतिदिन 11 माला जाप आवश्यक है।
– साधना की अवधि साधक की ऊर्जा अनुसार 9, 21 या अधिकतम 41 दिन तक हो सकती है।
– शाबर मंत्र में जटिल वैदिक विधि-विधान की आवश्यकता नहीं होती, परंतु गुरु का मार्गदर्शन अनिवार्य है।
अंततः यह चर्चा यह संदेश देती है कि शक्ति के बिना जीवन में कुछ भी संभव नहीं है, और सच्ची श्रद्धा तथा सही विधि के साथ की गई साधना निश्चित रूप से फलदायी होती है।
राम राम। जय माता की।
