सुलेमान की लाल परी साधना: धन, शक्ति और जीवन की तरक्की का गुप्त मार्ग

परिचय

गुरु सागरनाथ जी की इस चर्चा में आज विषय है — लाल परी। यह वह मंत्र और साधना है जो सागरनाथ जी को हरियाणा के एक मंत्री के माध्यम से प्राप्त हुई थी, जो वर्ष 2014 में उनके पास आए थे। उस मंत्री ने अपने जीवन में सात परियां सिद्ध कर रखी थीं। इनमें से एक मंत्र पहले भी प्रमाणिक रूप से साझा किया जा चुका है, जिसकी दीक्षा लेकर और साधना करके कई लोगों का जीवन अब अच्छी तरह से चल रहा है।

इस लेख में हम उसी शृंखला को आगे बढ़ाते हुए सुलेमान की लाल परी साधना के विषय में विस्तार से जानेंगे — इसका स्वरूप, इसकी साधना विधि, इससे जुड़ी शर्तें और सावधानियां।

सुलेमान की लाल परी का स्वरूप

सुलेमान की लाल परी अपने आप में बहुत ही बलवान मानी जाती है — विशेष रूप से इल्म (ज्ञान/विद्या), धन-दौलत और प्रतिस्पर्धा (टक्कर) के मामलों में। इनका स्वभाव अप्सरा की तरह अत्यंत शांत बताया गया है।

इनके हाथ में एक लाल छड़ी होती है, जिसके ऊपर एक सितारा बना होता है। यह छड़ी तकरीबन एक करामाती छड़ी है, जिसके द्वारा साधक कोई भी कार्य इस शक्ति से करवा सकता है। परंतु यह कार्य तभी संभव है जब साधक के पास एक योग्य गुरु और एक प्रमाणिक मंत्र हो। इसके बिना साधक बिना दिशा के दौड़ में शामिल एक-दूसरे को देखकर ही आगे बढ़ने की कोशिश करते रहते हैं।

रूप-स्वरूप का वर्णन

परी स्वयं अपने रूप के विषय में बताती है:

– रूप बिल्कुल सुंदर, अप्सरा जैसा।
– लाल रंग के वस्त्र धारण किए हुए।
– पीछे दो पर (पंख) निकले हुए होते हैं, जो लाल रंग के होते हैं।
– हाथ में करामाती छड़ी।
– हाथों पर सिंदूर लगा होता है, जैसे दुर्गा माँ के हाथों पर लगाया जाता है।
– हथेलियों पर तिलक/टीका लगा होता है।
– गले में फूलों की माला डाली होती है।
– बाल खुले होते हैं — कभी काले रंग के, कभी गोल्डन रंग के।
– पांवों में एक पंजाबी जूती जैसी पादुका पहनी होती है।
– इनके पास एक सुराही भी होती है, जो मदिरा डालने के काम नहीं आती। यह सुराही उस समय साधक को मोहित करने के काम आती है, ताकि साधक साधना बीच में ही छोड़कर भाग जाए और वचन न ले — यह वस्तुतः एक प्रकार की परीक्षा है।

मंत्र की अपूर्णता और उसे पूर्ण करने की कथा

जब सागरनाथ जी ने उस मंत्री से मंत्र की चर्चा की, तो उन्होंने बताया कि यह मंत्र अधूरा है — इसमें “जान फूंकनी” पड़ेगी और इसके ऊपर कुछ क्रिया करनी होगी। उन्होंने कहा कि मंत्र में लगभग 70% जान (शक्ति) है और यह कार्य करेगा, परंतु शेष 30% हिस्से को सेट करना पड़ेगा।

मंत्री जी ने यह ज़िम्मेदारी स्वयं उठाई, ताकि यह मंत्र लुप्त न हो जाए। जब उन्होंने परियों को हाजिरी के समय बुलाया — यह सर्दियों का समय था और वे टेरेस पर धूप में बैठे थे — तो परियों को बुलाने पर आसपास एक अच्छी सुगंध फैलने लगती थी, जैसे किसी ने इत्र छिड़का हो। यह सुगंध इतनी सुंदर होती थी कि देखने वाला सोचता था कि इस व्यक्ति ने कोई सिद्धि कर रखी है, हालांकि यह किसकी सिद्धि है यह पता नहीं चलता था। इसी अनुभव के माध्यम से मंत्री जी ने मंत्र को पूर्ण किया।

यह मंत्र कईयों ने सुना होगा, परंतु इसमें जान किसी ने नहीं डाली थी। इस चर्चा का उद्देश्य यही है कि जो मंत्र लुप्त हो रहे हैं, वे जन-कल्याण के लिए सामने रखे जाएं ताकि लोग दीक्षित होकर अपने जीवन को संवार सकें।

साधना विधि

मंत्री जी ने साधना की विधि इस प्रकार बताई:

सामग्री और अर्पण

– पताशे, लौंग, इलायची, दूध से बनी मिठाई अर्पित की जाती है।
– माला उल्टी फेरनी है — सीधी नहीं।
– हकीक की माला आवश्यक नहीं; रुद्राक्ष की माला से भी यह साधना की जा सकती है।

गुरु की भूमिका

साधक में इतना दमखम होना आवश्यक है कि उसके पीछे गुरु खड़ा हो, क्योंकि यह ऐसी शक्तियां हैं कि यदि साधक के पीछे गुरु की सपोर्ट नहीं है — चाहे उसके इष्ट की सपोर्ट भी हो — तो इष्ट साधक को एक हद तक ही बचा सकता है। इस तंत्र में साधक को पूरे तरीके से केवल गुरु ही बचा सकता है।

यंत्र और दीपक

इस साधना में एक स्टार का यंत्र बनता है। इसके भीतर तेल रखा जाता है और चमेली का दीपक जलाया जाता है। इसके ऊपर इत्र का छिड़काव भी किया जाता है — चमेली का इत्र या हिना का इत्र प्रयोग में लाया जा सकता है। इत्र को कान पर लगाया जाता है या एक ओर रख लिया जाता है।

समय-सीमा और नियम

यह साधना 11 दिन की बताई गई है। इन 11 दिनों में साधक को पूर्ण रूप से ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए, डंके की चोट पर (खुले रूप से) यह साधना करनी है। इसे एकांत में, घर के बाहर, या नदी के किनारे भी किया जा सकता है।

परी से संवाद और सिद्धि का अनुभव

मौलवी जी ने बताया कि जब मंत्र पूर्ण हो जाता है, तो उसके बाद परी से कनेक्टिविटी होती है। परी को बुलाकर उससे पूछा जाता है कि आगे मंत्र क्या कार्य करेगा। इस दौरान परी स्वयं उत्तर देती है, और साधक के शरीर में वाइब्रेशन होने लगते हैं — यह सामान्य हल्की वाइब्रेशन नहीं, बल्कि तीव्र वाइब्रेशन होती है, जो कनेक्टिविटी और संवाद का संकेत है।

मंत्र

मंत्री जी द्वारा बताया गया मूल मंत्र इस प्रकार है:

> बिस्मिल्लाह सुलेमान लाल बारी हाथ पे धरी खावे चूरी नीलावे कुंजा हारी

यह मंत्र 70% ठीक बताया गया, परंतु 100% नहीं — अर्थात इससे प्रत्यक्षीकरण नहीं होगा। परी ने स्वयं बताया कि इस मंत्र में क्या जोड़ा जाना आवश्यक है — मंत्र के अंत में “सुलेमान तख्त की दुहाई” बोलना आवश्यक है।

जब सुलेमान तख्त की दुहाई दी जाती है, तो ब्रह्मांड और पृथ्वी पर जितने भी जिन्न, जिनात या परियां हैं, वे सुलेमान के तख्त की कसम उठाकर ही कार्य करती हैं — यानी उसके तख्त की दुहाई देने पर ही ये शक्तियां सक्रिय होती हैं।

परी ने यह भी बताया कि इसे करने से पहले साधक के पास अपने गुरु का पूजन-अनुष्ठान होना चाहिए, क्योंकि कभी-कभी वह ऐसी परीक्षा देती है कि साधक बीच में ही साधना छोड़कर भाग जाते हैं।

मंत्र की उत्पत्ति — 2014 की कड़ी

यह मंत्र किसका मूल था, इस विषय में सागरनाथ जी 2014 तक पीछे जाते हैं। उस समय उन्होंने विष्णु की महा मोहिनी साधना पर एक वीडियो बनाई थी। यह मंत्र हरिद्वार के एक व्यक्ति का था, जिसने यह साधना की हुई थी।

जब उस व्यक्ति ने यह मंत्र सागरनाथ जी को दिया, तो उसी समय सागरनाथ जी ने उनसे कहा था कि इस मंत्र में कुछ खोट (कमी) है — यह मंत्र पूर्ण नहीं है। परंतु उस व्यक्ति ने कहा कि मंत्र पूर्ण है और सागरनाथ जी को इसे चलाने के लिए कहा। सागरनाथ जी ने उस समय यह मंत्र नहीं चलाया — उन्होंने इसे बाद में तभी चलाया जब उनका अपना संस्करण पूर्ण हो चुका था।

परी की मांग और परीक्षा

मौलवी जी (मंत्री) ने आगे बताया कि परी कभी-कभी साधक से कुछ ऐसी चीज़ मांगती है जो वह उस समय तुरंत नहीं दे सकता — जैसे चमेली, गुलाब या गेंदे के फूलों का हार। यह साधक की परीक्षा होती है, जिसे साधक को समझकर पूरा करना होता है। यह पहले से बताया नहीं जाता, ताकि साधक की सच्ची निष्ठा और धैर्य की परख हो सके।

साधना के नियम और शर्तें

इस साधना से जुड़े कुछ आवश्यक नियम इस प्रकार हैं:

1. *माला*: फूलों की माला इसमें अनिवार्य है, और माला उल्टी फेरनी है।
2. *दिन*: यह साधना शुक्रवार से आरंभ करनी है। इसे शुक्ल पक्ष के शुक्रवार से, अमावस्या के शुक्रवार से, या पूर्णमासी के शुक्रवार से शुरू किया जा सकता है — परंतु आरंभ शुक्रवार से ही होना चाहिए।

स्वयं सागरनाथ जी का अनुभव

जब सागरनाथ जी ने स्वयं यह साधना पूर्ण जान के साथ आगे बढ़ाई, तो मौलवी जी ने उनसे कहा कि वे स्वयं भी यह साधना करके देखें — इससे उन्हें स्वयं पता चल जाएगा और परी उनके सामने भी आएगी।

सागरनाथ जी ने साधना आरंभ की। पांच माला के भीतर ही सारे संकेत मिलने शुरू हो गए। परी ने बताया कि यदि साधक इस विधि को तन-मन से पूरी तरह करता रहे, तो वह स्वयं उसके पास आ जाएगी। सागरनाथ जी ने उत्तर दिया कि उन्हें अपने पास आने की आवश्यकता नहीं है — वे स्वयं पूर्ण रूप से सेट हैं और उन्हें व्यक्तिगत रूप से कुछ नहीं चाहिए, क्योंकि जो उन्हें प्राप्त करना था, वह वे पहले ही कर चुके हैं।

हालांकि उन्होंने यह भी पूछा कि यदि वे इसे आगे किसी और को देना चाहें, किसी को इसमें सिद्ध करवाना चाहें, या इससे कोई कार्य लेना चाहें, तो क्या यह संभव है — परी ने इसका सकारात्मक उत्तर दिया।

परी किन कार्यों में सहायक है

परी ने बताया कि वह विशेष रूप से निम्न कार्यों में सहायता कर सकती है:

– आजकल पति-पत्नी में होने वाले झगड़ों को पूरी तरह शांत कर सकती है और उनके जीवन को सुधार सकती है।
– समाज-कल्याण के कार्यों में भी यह आगे बढ़ने में सहायक होती है।
– आसपास के शत्रु, जो बिन बुलाए सांपों की तरह डसना शुरू कर देते हैं, उनके प्रभाव को दबा सकती है, जिससे वे शांत हो जाएं या घर छोड़कर चले जाएं।
– जीवन में इतनी तरक्की दे सकती है जो साधक ने कभी सोची भी न हो — परंतु इसके लिए पहले बताई गई सभी शर्तें पूर्ण रूप से पूरी होनी चाहिए।

सिद्धि ट्रांसफर की प्रक्रिया

जब सागरनाथ जी ने पूछा कि यदि सिद्धि किसी और को ट्रांसफर करनी हो, या किसी और को इसमें सिद्ध करवाना हो, तो इसकी प्रक्रिया क्या है — तो परी ने बताया:

1. पहले उस व्यक्ति को गुरु मंत्र करवाया जाए।
2. इसके बाद उससे परी की साधना करवाई जाए।
3. फिर परी स्वयं जाकर उसे सिद्ध कर देगी — यह भी संभव है कि वह नंगी आंखों से भी दिखाई दे जाए।

परी कभी-कभी साधक के सामने कुछ लिखती भी है, जिससे साधक डरकर भाग न जाए, यह ध्यान रखना आवश्यक होता है। वह जो कुछ लिखती है, उससे यह संकेत मिलता है कि मंत्र सही है — कभी-कभी इसमें सट्टे का नंबर या रोटरी (लॉटरी) का नंबर भी निकल आता है। परंतु यह पूरी तरह साधक के मनोभाव पर निर्भर करता है — साधक किस इच्छा से यह साधना कर रहा है।

सागरनाथ जी का अपना मनोभाव यह था कि उन्होंने जो करना था वह कर लिया और उन्हें अब कोई अन्य इच्छा नहीं है। परंतु जो अगला व्यक्ति इस साधना को करेगा, उसके मन में क्या भाव है, वह किस रिश्ते या उद्देश्य के लिए यह साधना करना चाहता है — पत्नी के लिए, मित्र के लिए, बहन के लिए, या अपने लिए — यह उस व्यक्ति के भाव पर निर्भर करेगा।

यह भी बताया गया कि परियों के भी अपने परिवार होते हैं, जैसे मनुष्य का शरीर एक परिवार के रूप में धरती पर जीवन जीता है, वैसे ही परियों का भी अपना परिवार होता है।

साधना का स्वभाव

यह साधना बड़े ध्यान से करने वाली है। यह कोई जल्दबाजी में की जाने वाली साधना नहीं है, बल्कि इसे शांत चित्त और स्थिर स्वभाव के साथ करना आवश्यक है। जो साधक इसे आगे करेगा, उसे स्वयं इसका अनुभव प्राप्त होगा।

जिम्मेदारी और मार्गदर्शन

सागरनाथ जी ने स्पष्ट किया कि यह पूर्ण मंत्र इस लेख में पहली बार पूरी तरह साझा किया गया है — पहले की चर्चा में यह पूर्ण मंत्र नहीं बताया गया था। जो भी साधक इसे आगे बढ़ाना चाहते हैं, उन्हें इसे जिम्मेदारी से और गुरु की देखरेख में करना चाहिए।

जो साधक सीधे इसकी दीक्षा या ट्रांसफर लेना चाहते हैं, उन्हें यह अवश्य दी जाएगी — परंतु शर्त यह है कि साधक को बताए गए रास्तों पर पूरी तरह चलना होगा। यदि साधक इन बताए गए रास्तों से एक बार भी इधर-उधर होता है, तो उसकी जिम्मेदारी स्वयं साधक की होगी, गुरु की नहीं। गुरु का कार्य साधक को मंजिल तक पहुंचाना है; उस मंजिल को आगे कैसे संभालना है, यह पूर्ण रूप से साधक की अपनी जिम्मेदारी है।

निष्कर्ष

सुलेमान की लाल परी साधना एक अत्यंत गूढ़ और शक्तिशाली साधना है, जो धन, तरक्की, पारिवारिक शांति और शत्रु-निवारण में सहायक मानी जाती है। परंतु इस साधना की सफलता कुछ आवश्यक बातों पर निर्भर करती है:

– एक योग्य और प्रमाणिक गुरु का होना अनिवार्य है, क्योंकि इस तंत्र में गुरु ही साधक की पूर्ण रक्षा कर सकता है।
– मंत्र का पूर्ण और सही रूप में होना आवश्यक है — अधूरा मंत्र प्रत्यक्षीकरण तक साधक को नहीं पहुंचा सकता।
– साधना 11 दिन तक ब्रह्मचर्य पालन के साथ, शुक्रवार से आरंभ करके, निर्धारित विधि और सामग्री के साथ करनी होती है।
– साधक का मनोभाव और उद्देश्य साधना के परिणाम को प्रभावित करता है।
– यह साधना धैर्य, शांत स्वभाव और पूर्ण निष्ठा मांगती है — जल्दबाजी में यह सिद्ध नहीं होती।

अंततः यह उद्देश्य स्पष्ट है — जो मंत्र और साधनाएं लुप्त हो रही हैं, उन्हें जन-कल्याण की भावना से लोगों के सामने रखा जाए, ताकि सच्चे साधक दीक्षित होकर अपने जीवन को संवार सकें और आगे बढ़ सकें।

राम राम। जय माता की। आपका सदा कल्याण हो।

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