उर्वशी अप्सरा साधना

उर्वशी अप्सरा साधना: प्रेमिका और पत्नी रूप में सिद्धि की संपूर्ण विधि

प्रस्तावना

अप्सराओं की दुनिया रहस्यमय, दिव्य और अत्यंत आकर्षक है। जब भी अप्सराओं की बात होती है, तीन नाम सबसे पहले लिए जाते हैं — *रंभा, मेनका और उर्वशी*। इनमें उर्वशी को सर्वश्रेष्ठ, प्रधान और 108 अप्सराओं की रानी माना गया है। MYTHOLOGYNATH.COM पर सागरनाथ जी और रुद्रनाथ जी के बीच हुई इस विस्तृत चर्चा में उर्वशी अप्सरा साधना के हर पहलू को उजागर किया गया — उनकी उत्पत्ति से लेकर साधना की विधि, मंत्र, नियम और सावधानियों तक। यह लेख उसी चर्चा पर आधारित है।

उर्वशी कौन हैं? उत्पत्ति और स्वरूप

उर्वशी की उत्पत्ति की कथा अत्यंत रोचक है। एक बार इंद्र को अहंकार हो गया कि उनकी अप्सराओं से सुंदर कोई नहीं है। यहाँ तक कि मेनका अप्सरा भी यही सोचती थी। तब *नर-नारायण ऋषि ने अपनी जांघों से उर्वशी को उत्पन्न किया।* जब उर्वशी प्रकट हुईं, तो स्वयं इंद्र उन पर मोहित हो गए और मेनका भी लज्जित हो गई।

उर्वशी का नाम स्मरण करते ही *16 से 18 वर्ष की यौवन से परिपूर्ण अद्भुत सुंदरी* का चित्र मानस पटल पर उभर आता है। उनका यौवन चिरकालीन है — जब तक स्वर्ग का अस्तित्व है, उनका यौवन वैसा ही बना रहेगा।

उनके शरीर का वर्णन इस प्रकार किया गया है:

*चौड़ा वक्षस्थल और लंबी भुजाएं* आकर्षण से युक्त
*सुनहरे और लंबे बाल*, लंबी कद-काठी
*बेंत की भांति लचकीला शरीर*, जिसके अंग-अंग से यौवन की शक्ति फूटती है
*नेत्रों में गजब का सम्मोहन* जो एक बार इनकी आँखों में आँखें डाले, वह सब भूल जाए शरीर से *अष्टगंध और स्वर्गिक सुगंधित रसायनों की महक* निरंतर आती रहती है
*पैरों में घुंघरू की ध्वनि* सदैव गूंजती रहती है

उर्वशी देवता, यक्ष, गंधर्व, किन्नर और मनुष्य — सभी के प्राणों को डावाडोल कर देने की क्षमता रखती हैं। इंद्र की सभा में 108 अप्सराओं में यह सर्वश्रेष्ठ मानी जाती हैं।

उर्वशी का स्वभाव: तमोगुणी अप्सरा

उर्वशी जांघों से उत्पन्न हुईं, इसीलिए इनके भीतर *तमोगुणी तत्व* पाया जाता है। तमोगुण का अर्थ है — अहंकार, काम और क्रोध से परिपूर्ण स्वभाव।

उनके स्वभाव के दो पहलू हैं:

*क्रोध का पक्ष:* यदि उर्वशी रुष्ट हो जाएं तो वे तुरंत श्राप दे देती हैं। इसका प्रमाण महाभारत काल में मिलता है। जब अर्जुन स्वर्ग में इंद्र के पास गए, तब उर्वशी उन पर मोहित हो गईं और उनसे काम क्रीड़ा का प्रस्ताव रखा। जब अर्जुन ने उन्हें माँ के समान बताकर इनकार किया, तो उर्वशी ने क्रोधवश उन्हें नपुंसक होने का श्राप दे दिया। यह उनके गर्म और तमोगुणी स्वभाव का सटीक उदाहरण है।

*प्रेम का पक्ष:* जब उर्वशी किसी पर प्रसन्न हो जाएं तो वे बहुत जल्दी और बहुत गहराई से प्रेम करती हैं। रति क्रीड़ा, आनंद विहार और सुख-सौभाग्य देने में वे अत्यंत उदार हैं।

एक महत्वपूर्ण चेतावनी: पहले से प्रेमिका वाले साधक सावधान रहें

इस साधना के विषय में एक अत्यंत महत्वपूर्ण बात बताई गई है। *दिल्ली के रणवीर सिंह नामक एक व्यक्ति का उदाहरण* साझा किया गया, जिसने गुरु से उर्वशी अप्सरा साधना की दीक्षा ली थी। वह प्रेमिका रूप में साधना कर रहा था, परंतु साथ-साथ अपनी पहले से मौजूद प्रेमिका से भी मिलता रहा।

उर्वशी ने उसे साफ मना किया कि उस लड़की से मिलने मत जाओ। परंतु वह नहीं माना। जब वह उससे मिलने जाता, उसकी प्रेमिका उसके साथ बहुत बुरा व्यवहार करती — गालियाँ देती, भगाती। और फोन पर वही लड़की मीठी बातें करती। अंततः उर्वशी ने उसका *एक्सीडेंट करवा दिया* और वह मरते-मरते बचा।

इससे यह स्पष्ट शिक्षा मिलती है — *जिस साधक की पहले से कोई प्रेमिका हो, वह इस साधना को प्रेमिका रूप में न करे।* उर्वशी अप्सरा किसी और के साथ अपने प्रेमी को बांटना बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करतीं। यदि वचन देकर साधना की और दूसरी तरफ भी गए, तो परिणाम अत्यंत कठोर होंगे।

रंग-रूप की चिंता छोड़ें — तपोबल और योगबल मुख्य है

बहुत से लोग यह सोचकर हिचकिचाते हैं कि वे काले हैं, बदसूरत हैं या वृद्ध हैं। इस संदर्भ में स्पष्ट किया गया कि *उर्वशी अप्सरा केवल आपका योगबल, तपोबल और मंत्र उच्चारण देखती हैं।* रंग, रूप, उम्र या शारीरिक अक्षमता — इनमें से कुछ भी मायने नहीं रखता।

उदाहरण के रूप में भगवान कृष्ण का उल्लेख किया गया — वे श्यामवर्ण थे, फिर भी गोपियाँ उन पर मोहित रहती थीं। कारण था उनका अद्भुत आकर्षण और तेज।

यह भी कहा गया कि *60-70 वर्ष का वृद्ध व्यक्ति भी यदि पूर्ण प्रेमभाव के साथ यह साधना करे, तो उर्वशी उसे सिद्ध हो जाती हैं।* वे केवल मन के भाव देखती हैं — कि साधक किस श्रद्धा और प्रेम से उनका ध्यान कर रहा है।

उर्वशी और पुरुरवा की कथा

पूरे विश्व में प्रसिद्ध *उर्वशी और पुरुरवा की प्रेम कथा* इस बात का प्रमाण है कि एक मनुष्य भी इस साधना को सिद्ध कर सकता है। पुरुरवा एक साधारण मनुष्य थे और जब उन्होंने वृद्धावस्था में उर्वशी को सिद्ध किया, तो उर्वशी उनके सामने प्रत्यक्ष हुईं।

जब उर्वशी ने उनके गले में वरमाला डाली, तो पुरुरवा *पूर्णतः देव स्वरूप* हो गए — बुढ़ापा दूर हो गया, यौवन लौट आया। पुरुरवा ने उनसे पत्नी रूप में रहने का वचन माँगा और उर्वशी ने वह वचन दिया। तत्पश्चात पुरुरवा ने इस धरती पर अपना विशाल राज्य स्थापित किया, जिसमें धन-धान्य और समृद्धि की कोई कमी न थी।

इसके अतिरिक्त अनेक महान विभूतियों ने यह साधना की है:

*आदि गुरु शंकराचार्य के शिष्य पद्मपाद* ने उर्वशी साधना से इतना धन-ऐश्वर्य प्राप्त किया कि वे सर्वाधिक समृद्ध लोगों में गिने जाने लगे
*विश्वामित्र जी के शिष्य* — बोरी श्रवा, देवगंध, देवसत गंधर्व और रत्नप्रभा  इन सभी ने यह साधना की और जीवन में आनंद-उल्लास प्राप्त किया
*स्वयं गुरु गोरखनाथ जी* ने यह साधना की और अपने शिष्यों को भी कराई

उर्वशी साधना से प्राप्त होने वाले लाभ

यदि उर्वशी अप्सरा प्रेमिका या पत्नी रूप में सिद्ध हो जाएं, तो साधक को निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:

शरीर की सभी *कमज़ोरियाँ और दुर्बलताएं* समाप्त हो जाती हैं
*बल, वीर्य और ऊर्जा* में वृद्धि होती है
*24 घंटे आनंद और उमंग* बना रहता है
*चेहरे का ओज और आकर्षण* अभूतपूर्व रूप से बढ़ जाता है
*वाणी में चुंबकीय आकर्षण* आ जाता है  लोग स्वयं खिंचे चले आते हैं
*धन, ऐश्वर्य और समृद्धि* का आगमन होता है
*दिव्य रसायन* प्राप्त होते हैं
रति क्रीड़ा सहित जीवन का संपूर्ण आनंद मिलता है

एक शिष्या का उदाहरण दिया गया जिसने उर्वशी साधना की थी  जब वह किसी पार्टी में गई तो लोग उसकी ओर इतने आकर्षित हो गए, कई लोगों ने प्रपोज़ किया और वह वहाँ से निकलने में कठिनाई महसूस करने लगी। यही उर्वशी के प्रभाव का परिणाम था।

उर्वशी साधना की विधि

आवश्यक सामग्री और तैयारी

*आसन:* पीला या लाल
*वस्त्र:* लाल या पीले
*दीपक:* घी का
*माला:* स्फटिक की
*उर्वशी यंत्र* की स्थापना
गले में *गुलाब या गेंदे का हार* धारण करें
वस्त्र और यंत्र पर *गुलाब का इत्र* छिड़कें
*49 दिन* तक प्रतिदिन साधना करनी है
*शुक्ल पक्ष के शुक्रवार* से आरंभ करें
माला कम से कम *100 से 108 माला* प्रतिदिन फेरें
साधना *एकांत* में करें

साधना की क्रमबद्ध प्रक्रिया

*पहला चरण — भगवान विष्णु से आज्ञा लेना:*
साधना आरंभ करने से एक दिन पहले भगवान विष्णु से आज्ञा लेनी अनिवार्य है। बिना उनकी अनुमति के यह साधना सिद्ध नहीं होगी।

शाबर मंत्र इस प्रकार है:
ओ अंग सो अंग हरि अंग सतनाम

अथवा वैदिक मंत्र:
ओम नमो भगवते वासुदेवाय

घी का दीपक जलाकर सामने उर्वशी यंत्र रखकर इसकी *51 माला* करनी है।

*दूसरा चरण — गुरु मंत्र:*
गुरु मंत्र इस साधना की नींव है। यह मंत्र सार्वजनिक नहीं बताया जाता — केवल दीक्षा में गुरु से प्राप्त किया जाता है। गुरु मंत्र की चोट जब किसी देवी-देवता पर पड़ती है तो उन्हें आना ही पड़ता है।

*तीसरा चरण — भैरव मंत्र:*
उर्वशी तमोगुणी हैं और कभी-कभी उग्र रूप में आ सकती हैं। भैरव मंत्र उन्हें शांत रखता है ताकि वे शांत भाव में साधक के पास आएं और उसकी बात मानें।

भैरव मंत्र:
भैरो जति शति तपि भैरो महाकाल

*चौथा चरण — मुख्य उर्वशी मंत्र:*
यह मंत्र एक प्राचीन हस्तलिखित ग्रंथ से लिया गया है जो अष्टगंध से रचित था। इस मंत्र का सही उच्चारण अत्यंत आवश्यक है। गलत उच्चारण से साधना सिद्ध नहीं होती।

सही उच्चारण:
ओम श्रीं उर्वशी अगच्छ… गच्छ स्वाहा
Om shreem urvashi aggachha gachha swaha
(ध्यान रहे: “अगच्छ” और “गच्छ” के बीच उचित विराम के साथ उच्चारण करें। कई साधक इन दोनों को एक साथ बोलते हैं जो गलत है।)

*पाँचवाँ चरण — भगवान शंकर का शाबर मंत्र:*
इसे भी साधना में सम्मिलित करना है।

साधना के नियम और सावधानियाँ

एक बार साधना आरंभ करने के बाद *49 दिन पूर्ण करके ही छोड़ें* बीच में नहीं, चाहे उर्वशी स्वयं कहें
यदि वे दो सप्ताह के भीतर प्रत्यक्ष होने लगें, तब भी 49 दिन की साधना पूर्ण करें
जब वे प्रत्यक्ष हों तो *वचनों में लेने की विधि* गुरु से सीखें
*यंत्र की प्राण प्रतिष्ठा* प्रशिक्षित गुरु के मार्गदर्शन में करें
*मंडप सजाने की विधि* भी गुरु से सीखें

क्या अनुभव होता है साधना के दौरान?

लगभग *दो सप्ताह के भीतर* उर्वशी साधक के सामने प्रत्यक्ष होने लगती हैं। वे:

साधक से बातें करने लगती हैं
कभी-कभी नृत्य करती हैं
कभी गायन करती हैं
भाँति-भाँति के मनोभाव प्रकट करती हैं

उर्वशी को सिद्ध करने के बाद का जीवन

जब उर्वशी पूर्ण रूप से सिद्ध हो जाती हैं, तो साधक का जीवन बदल जाता है। जैसे पुरुरवा ने उनके साथ वचन लेकर अपना समृद्ध राज्य स्थापित किया, वैसे ही साधक का जीवन *धन-धान्य, ऐश्वर्य और आनंद* से परिपूर्ण हो जाता है।

निष्कर्ष

उर्वशी अप्सरा साधना एक अत्यंत प्राचीन, शक्तिशाली और फलदायिनी साधना है। यह साधना केवल विशेष लोगों के लिए नहीं है — युवा हो या वृद्ध, सुंदर हो या साधारण, यह साधना सबके लिए समान रूप से फलदायक है। आवश्यकता केवल इस बात की है कि *योगबल, तपोबल, शुद्ध भाव और सही गुरु का मार्गदर्शन* हो।

जब हमारे महान ऋषि-मुनि, गुरु गोरखनाथ, आदि गुरु शंकराचार्य के शिष्य और विश्वामित्र के शिष्य इस साधना को कर चुके हैं, तो हम भी इसे सही मार्गदर्शन में कर सकते हैं। ध्यान रहे — *बिना गुरु के, बिना सही उच्चारण के और बिना सही विधि के* यह साधना फलित नहीं होती। इसलिए जो भी इस साधना में प्रवेश करना चाहे, वह पहले एक योग्य गुरु की शरण में जाए और फिर विधिवत साधना करे।

 MYTHOLOGYNATH.COM पर सागरनाथ जी की चर्चा पर आधारित

*नोट:* इस लेख में उल्लिखित कुछ मंत्र एवं विधियाँ पूर्ण नहीं हैं — विशेषकर गुरु मंत्र और भगवान शंकर का शाबर मंत्र — क्योंकि वार्तालाप में वे अधूरे रह गए। ऐसे स्थानों पर मूल transcript के अनुसार ही प्रस्तुति की गई है।

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